
नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने पुलिस द्वारा उन्हें जारी किए गए उस नोटिस के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उनसे 'शांति बनाए रखने' के लिए एक बांड भरने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर रिट याचिका को खारिज कर रहे हैं। हालांकि, न्यायाधीश ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) को यह निर्देश भी दिया कि छात्र नेता को इस पूरी कार्यवाही से जुड़ी सभी प्रासंगिक सामग्रियां अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाएं।
नेहा बोरा ने सोमवार को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अपनी याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया था कि पुलिस का नोटिस पूरी तरह से अस्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से गलत है। उनका कहना था कि इस बात का कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है कि उनके किसी भी कदम से शांति भंग होने की कोई आशंका थी।
छात्र नेता का आरोप था कि यह कानूनी कार्यवाही शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के लिए की गई है, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए), 19(1)(बी) और 21 का गंभीर उल्लंघन है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान बोरा के वकील ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। पुलिस के इस आरोप पर कि बोरा ने बिना अनुमति के झंडा फहराया था, वकील ने कहा कि किसी भी नागरिक को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है।
पुलिस द्वारा जारी किया गया यह नोटिस 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126 के तहत भेजा गया था। इसमें बोरा को 19 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने के लिए कहा गया था। नोटिस में उनसे जवाब मांगा गया था कि जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उन्हें 10,000 रुपये का निजी बांड और एक जमानती क्यों नहीं पेश करना चाहिए।
गौरतलब है कि नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को उस समय एहतियातन हिरासत में लिया गया था, जब वह कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में हिस्सा लेने के लिए कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क की ओर जा रही थीं। हालांकि, पुलिस ने उन्हें अगले ही दिन रिहा कर दिया था।
पुलिस का दावा है कि यह पूरी कार्यवाही 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में हुई कथित नारेबाजी के आधार पर शुरू की गई है। इसके अलावा, बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा के बावजूद जंतर-मंतर पर बार-बार हुए विरोध प्रदर्शन और कनॉट प्लेस में लोगों को भड़काने के आरोप भी इस नोटिस का आधार बनाए गए हैं।
वहीं, बोरा की याचिका में पुलिस के इन दावों को सिरे से खारिज किया गया है। याचिका के अनुसार, पुलिस का यह दावा बिल्कुल गलत है कि उन्होंने 16 अक्टूबर को सेंट्रल पार्क के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाया था। बोरा ने अपनी याचिका में स्पष्ट किया है कि उन्होंने उसी दिन शाम 5 बजे मंडी हाउस में एक शांतिपूर्ण सभा बुलाई थी, और रिकॉर्ड भी यही बताते हैं कि उन्हें मंडी हाउस से ही पुलिस ने हिरासत में लिया था।
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