
भोपाल। मध्यप्रदेश के रीवा जिले में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सिरमौर क्षेत्र के रोझौही और सरई कला गांवों में ग्रामीण जल, जंगल, जमीन और अपने भविष्य की सुरक्षा का सवाल उठाते हुए परियोजना का विरोध कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान जल सत्याग्रह में शामिल आदिवासी महिला विमला कोल की मौत के बाद मामला और गंभीर हो गया है। अब यह विवाद केवल बिजली परियोजना की स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामसभा की सहमति, प्रशासनिक अनुमति, पर्यावरणीय सुरक्षा और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े सवाल भी इसके केंद्र में आ गए हैं।
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 25 अक्टूबर को आंदोलनकारी ग्रामीणों और विमला कोल के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने परियोजना का विरोध करते हुए कहा कि रीवा में किसी भी कीमत पर न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं लगने दिया जाएगा। उन्होंने पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने और इस मुद्दे को विधानसभा में उठाने की बात भी कही।
इसके अगले दिन, 26 अक्टूबर को भोपाल में प्रेस वार्ता के दौरान सिंघार ने परियोजना से संबंधित अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी), कथित सहमति पत्र और सुरक्षा मानकों पर सवाल उठाए। उन्होंने पर्यावरणीय अध्ययन, संभावित विस्थापन और स्थानीय लोगों की सुरक्षा से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की।
क्या है रीवा का न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट?
रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र के रोझौही और सरई कला के आसपास प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध चल रहा है। परियोजना के नाम और स्वरूप को लेकर सार्वजनिक चर्चा के बीच इसकी वास्तविक तकनीकी स्थिति, प्रस्तावित क्षमता और आवश्यक मंजूरियों का स्पष्ट विवरण सामने आना जरूरी है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परियोजना अभी प्रस्तावित अवस्था में है और प्रारंभिक तकनीकी जांच तथा ड्रिलिंग से जुड़ी गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आया है।
परमाणु बिजलीघर में परमाणु विखंडन से निकलने वाली ऊष्मा का उपयोग पानी को गर्म करके भाप बनाने में किया जाता है। भाप टरबाइन को घुमाती है और इससे बिजली पैदा होती है। परमाणु ऊर्जा का एक प्रमुख लाभ यह है कि संयंत्र के संचालन के दौरान बिजली उत्पादन से होने वाला प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम होता है।
हालांकि, परमाणु बिजलीघर की स्थापना और संचालन के लिए कड़े सुरक्षा मानकों, रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित प्रबंधन, पर्याप्त जल संसाधनों, आपातकालीन तैयारी और स्वतंत्र नियामकीय निगरानी की जरूरत होती है।
रीवा की प्रस्तावित परियोजना को लेकर कुछ बुनियादी सवालों के जवाब अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। इसमें कितनी उत्पादन क्षमता के रिएक्टर लगाए जाने हैं? परियोजना के लिए कितनी जमीन की जरूरत होगी? किन गांवों और परिवारों पर इसका असर पड़ सकता है? पानी की जरूरत कितनी होगी? परियोजना के लिए कौन-कौन सी तकनीकी और पर्यावरणीय मंजूरियां आवश्यक हैं?
इन सवालों के जवाब आधिकारिक दस्तावेजों के माध्यम से सामने आने चाहिए, ताकि परियोजना के संभावित प्रभावों का तथ्यात्मक आकलन किया जा सके। लेकिन अभी तक स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं है।
ग्रामीणों को जमीन, पानी और पर्यावरण की चिंता
रोझौही और सरई कला क्षेत्र के ग्रामीणों को आशंका है कि परमाणु बिजलीघर की स्थापना से उनकी जमीन, जलस्रोत, खेती, पर्यावरण और स्वास्थ्य प्रभावित हो सकते हैं। ग्रामीणों के लिए यह केवल बिजली उत्पादन की परियोजना नहीं, बल्कि उनके गांवों में रहने, खेती करने और आजीविका चलाने के अधिकार से जुड़ा मामला है।
क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के साथ अनुसूचित जाति के परिवार, छोटे किसान और खेतिहर मजदूर भी रहते हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने दावा किया है कि रोझौही और सरई कला में 1,500 से अधिक परिवार और 5,000 से ज्यादा लोग रहते हैं। उन्होंने सरकार से स्पष्ट करने की मांग की है कि परियोजना से कितने गांव, परिवार, कृषि भूमि और वनाधिकार पट्टे प्रभावित हो सकते हैं।
ग्रामीणों की चिंता यह भी है कि यदि भविष्य में जमीन अधिग्रहण या विस्थापन की स्थिति बनती है, तो उनके पुनर्वास और आजीविका की क्या व्यवस्था होगी। खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर परिवारों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि जीवनयापन का प्रमुख साधन होती है।
हालांकि, परियोजना के कारण पर्यावरण या स्वास्थ्य पर कितना प्रभाव पड़ेगा, इसका निष्कर्ष वैज्ञानिक अध्ययन और तकनीकी आकलन के आधार पर ही निकाला जा सकता है। ग्रामीणों की आशंकाओं को गंभीरता से सुनने के साथ-साथ परियोजना से संबंधित तथ्यों को भी सार्वजनिक करना जरूरी है।
ग्रामसभा के फैसले के बावजूद एनओसी कैसे जारी हुई?
इस पूरे विवाद का एक अहम पहलू ग्रामसभा की सहमति और ड्रिलिंग की अनुमति से जुड़ा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के अनुसार, 3 सितंबर 2026 को ग्रामसभा ने ड्रिलिंग के लिए सहमति देने से सर्वसम्मति से इनकार कर दिया था। इसके बाद ग्राम पंचायत ने 5 सितंबर को पत्र क्रमांक 48 के माध्यम से जिला प्रशासन को इस फैसले की जानकारी दी।
सिंघार ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद 23 सितंबर को एनओसी क्रमांक 147/2026 जारी कर दी गई। उनके मुताबिक, इस एनओसी में 4 सितंबर के एक कथित सहमति पत्र का उल्लेख किया गया है।
सिंघार ने यह भी बताया कि सरपंच कोमल संजय सिंह ने 8 अक्टूबर को संभागायुक्त और कलेक्टर से शिकायत कर कथित सहमति पत्र की जांच कराने तथा एनओसी निरस्त करने की मांग की थी।
इस घटनाक्रम को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि ग्रामसभा ने ड्रिलिंग के लिए सहमति नहीं दी थी, तो प्रशासन ने किस आधार पर एनओसी जारी की? कथित सहमति पत्र की सत्यता की जांच हुई या नहीं? संबंधित अधिकारियों ने ग्रामसभा के फैसले को किस तरह लिया? शिकायत मिलने के बाद प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
जल सत्याग्रह के दौरान विमला कोल की मौत से बढ़ा आक्रोश
परियोजना के विरोध के बीच आदिवासी महिला विमला कोल की मौत ने आंदोलन को भावनात्मक और राजनीतिक रूप से अधिक गंभीर बना दिया है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, रोझौही गांव की रहने वाली आदिवासी महिला विमला कोल करीब चार दिनों से ग्रामीणों के साथ जल सत्याग्रह में शामिल थीं। 21 अक्टूबर की रात उनकी तबीयत बिगड़ने की जानकारी सामने आई। उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां 22 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई।
उनकी मौत के बाद क्षेत्र में शोक और आक्रोश का माहौल बना। विमला कोल के पति जमुना कोल ने पत्नी को खोने के बाद गहरा दुख जताया और प्रशासन से सवाल किया कि क्या वह उनकी पत्नी को वापस ला सकता है।
उमंग सिंघार का ऐलान- "रीवा में नहीं लगने देंगे प्लांट"
विमला कोल की मौत के बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य सरकार पर निशाना साधा। 25 अक्टूबर को ग्रामीणों से मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर लोगों के जीवन, जमीन और पर्यावरण को खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए।
उन्होंने घोषणा की कि कांग्रेस इस परियोजना का विरोध करेगी और मामला विधानसभा में उठाया जाएगा। सिंघार ने विमला कोल के परिवार को एक लाख रुपये की सहायता देने की बात भी कही। उन्होंने ग्रामीणों की चिंताओं को गंभीरता से लेने और परियोजना को किसी दूसरी जगह स्थानांतरित करने पर विचार करने की मांग की।
26 अक्टूबर को भोपाल में प्रेस वार्ता के दौरान सिंघार ने परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक अनुमतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि प्रस्तावित रिएक्टर कहां स्थापित किए जाएंगे? संयंत्र के आसपास सुरक्षा और निगरानी क्षेत्र में कितने गांव आएंगे? कितने परिवारों, कृषि भूमि और वनाधिकार पट्टों पर असर पड़ सकता है?
उन्होंने पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, भूकंपीय जोखिम, जल उपलब्धता, विकिरण के संभावित प्रभाव और आपदा प्रबंधन योजना से संबंधित अध्ययन सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि स्थानीय आबादी को संभावित जोखिमों और सुरक्षा उपायों की जानकारी किस तरह दी जाएगी।
सिंघार ने चेरनोबिल और फुकुशिमा की परमाणु दुर्घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार को परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के संभावित जोखिमों को गंभीरता से लेना चाहिए।
हालांकि, इन दुर्घटनाओं का उल्लेख अपने आप में रीवा परियोजना में दुर्घटना की आशंका का प्रमाण नहीं है। किसी भी परमाणु संयंत्र की सुरक्षा का आकलन उसके डिजाइन, स्थल, नियामकीय जांच और सुरक्षा उपायों के आधार पर किया जाना चाहिए।
विकास बनाम अधिकार?
रीवा की प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर विवाद अब तीन स्तरों पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। पहला, ग्रामीणों का आंदोलन और जल, जंगल, जमीन की सुरक्षा से जुड़ी उनकी मांगें। दूसरा, ग्रामसभा के फैसले और ड्रिलिंग के लिए जारी एनओसी को लेकर उठे प्रशासनिक सवाल। तीसरा, कांग्रेस और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा परियोजना का विरोध तथा इसे विधानसभा में उठाने की घोषणा।
फिलहाल परियोजना की सभी आवश्यक तकनीकी और नियामकीय मंजूरियों की स्थिति स्पष्ट नहीं है। प्रशासन की ओर से ग्रामसभा की असहमति और कथित सहमति पत्र से जुड़े आरोपों पर विस्तृत जवाब भी सामने आना बाकी है।
राज्य सरकार और संबंधित परियोजना पक्ष के सामने चुनौती है कि वे केवल बिजली उत्पादन और विकास की जरूरत का हवाला देने के बजाय परियोजना से जुड़े तथ्य सार्वजनिक करें। ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि उनके गांव के आसपास किस तरह की परियोजना प्रस्तावित है, उससे क्या बदलाव हो सकते हैं और उनकी सुरक्षा तथा आजीविका के लिए क्या इंतजाम किए जाएंगे।
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