नई दिल्ली: कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित मेगा-प्रोजेक्ट से जुड़ी एक अहम जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करने का फैसला किया है। यह मामला मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि क्या इस विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना के लिए वन मंजूरी हासिल करते समय आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की अनदेखी की गई है।
आठ मई को अदालत ने पूर्व केंद्रीय सचिव मीना गुप्ता द्वारा दायर इस याचिका को स्वीकार कर लिया। इस याचिका में ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए आदिवासियों की सहमति लेने की प्रक्रिया में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006 के व्यापक उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
केंद्र सरकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह प्रशासन ने शुरुआत में इस पीआईएल की स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई थी। इसके साथ ही गलाथिया नेशनल पार्क और कैंपबेल बे नेशनल पार्क के बफर जोन को कम करने से जुड़े दो अन्य मामलों पर भी प्रशासन ने सवाल उठाए थे।
हालांकि, अदालत ने इन सभी आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया। आपको बता दें कि 81,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार आइलैंड (जीएनआई) परियोजना के तहत सरकार कई बड़े निर्माण करने जा रही है। इनमें एक एकीकृत टाउनशिप, एक ट्रांसशिपमेंट कंटेनर पोर्ट, एक सौर और गैस आधारित बिजली संयंत्र और एक ग्रीनफील्ड डुअल-यूज सैन्य और नागरिक हवाई अड्डा शामिल है।
साल 2024 में दायर इस जनहित याचिका में मीना गुप्ता ने वन अधिकार अधिनियम के तहत अपनाई गई प्रक्रियाओं और जारी किए गए आदेशों को गैरकानूनी बताते हुए चुनौती दी है। इसमें विशेष रूप से कैंपबेल बे तहसील के लिए उप-मंडलीय स्तर की समिति (एसडीएलसी) का गठन शामिल है।
इसके अलावा 12 अगस्त 2022 को कैंपबेल बे, लक्ष्मी नगर और गोविंद नगर में बुलाई गई ग्राम सभाओं और वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी देने वाले प्रस्तावों की वैधता पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में 18 अगस्त 2022 को निकोबार जिले के उपायुक्त द्वारा जारी उस वन अधिकार मान्यता (आरओएफआर) प्रमाण पत्र को भी चुनौती दी गई है, जिसमें दावा किया गया था कि सभी वन अधिकारों का निपटारा कर दिया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि प्रशासन ने पर्यावरण मंत्रालय से वन मंजूरी प्राप्त करने के लिए अवैध ग्राम सभा प्रस्तावों और एसडीएलसी बैठक के दौरान दी गई कथित सहमति का अनुचित इस्तेमाल किया।
हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले मीना गुप्ता ने एफआरए के कथित उल्लंघनों को लेकर भारत की राष्ट्रपति को भी एक ज्ञापन सौंपा था। हालांकि, उस ज्ञापन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी।
इस मामले में मुख्य तर्क यह है कि परियोजना के लिए वन भूमि डायवर्जन हेतु आदिवासियों की सहमति का दावा करने वाली पूरी प्रक्रिया दूषित और अवैध है। आरोप है कि ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक भी वन अधिकार के दावे का विधिवत रूप से निपटारा नहीं किया गया है।
एफआरए, 2006 और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के 2009 के एक आदेश के अनुसार, किसी भी परियोजना के लिए वन भूमि का डायवर्जन करने से पहले वन अधिकार दावों का निपटारा करना अनिवार्य होता है। यह कानून उन अनुसूचित जनजातियों और अन्य वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देता है जो कम से कम तीन पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं।
याचिका में कुछ विशिष्ट अवैधताओं की ओर इशारा किया गया है। ग्राम सभा के प्रस्तावों की जांच करने वाली उप-मंडलीय समिति (एसडीएलसी) ने एफआरए के नियमों का पालन नहीं किया। नियम के मुताबिक एसडीएलसी के तीन में से कम से कम दो सदस्य अनुसूचित जनजाति के होने चाहिए, जिनमें एक महिला सदस्य का होना भी अनिवार्य है।
लेकिन द्वीप प्रशासन द्वारा गठित एसडीएलसी में केवल एक निकोबारी सदस्य को ही शामिल किया गया था। दूसरी बड़ी खामी यह बताई गई है कि जिन ग्राम सभाओं (कैंपबेल बे, गोविंद नगर और लक्ष्मी नगर) ने कथित तौर पर सहमति दी थी, वे गैर-आदिवासी निवासियों के लिए अंडमान और निकोबार पंचायत विनियमन के तहत गठित पंचायतें थीं।
इन गैर-आदिवासी प्रस्तावों के तहत 166.10 वर्ग किलोमीटर जमीन के डायवर्जन की बात कही गई थी। इस कुल जमीन में से 121.87 वर्ग किलोमीटर संरक्षित वन क्षेत्र है और 8.88 वर्ग किलोमीटर डीम्ड फॉरेस्ट है।
याचिका के अनुसार, इन निकायों द्वारा पारित प्रस्तावों का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि वे कानून द्वारा निर्धारित अनुसूचित जनजातियों या वनवासियों की ग्राम सभाएं बिल्कुल नहीं थीं। कानून के तहत वन भूमि के डायवर्जन के लिए सहमति केवल उन लोगों द्वारा दी जानी चाहिए जिनके पास एफआरए के तहत अधिकार हैं।
याचिका में यह भी बताया गया है कि वन अधिकार समिति से संबंधित कोई भी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जो कि ग्राम सभा बुलाए जाने से पहले अधिकारों के दावे की प्रक्रिया को शुरू करती है। जनजातीय परिषद के अध्यक्ष के माध्यम से निकोबारी समुदाय की जिस सहमति का दावा किया गया है, उसका भी कड़ा विरोध किया गया है।
तर्क यह है कि अध्यक्ष पूरे समुदाय की ओर से अकेले सहमति नहीं दे सकता। इसके अलावा नवंबर 2022 में परिषद के अध्यक्ष ने अपने कप्तानों के साथ मिलकर इस सहमति को वापस भी ले लिया था।
वहीं, शोम्पेन जनजाति, जो काफी हद तक बाहरी दुनिया से कटी हुई है, उनकी सहमति सीधे शोम्पेन से लेने के बजाय एक सरकारी संगठन, अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति (AAJVS) के एक अधिकारी के माध्यम से प्राप्त की गई थी।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रस्तावित विकास क्षेत्र में शोम्पेन जनजाति की तीन बस्तियां स्थित हैं। इस प्रोजेक्ट से उनके भोजन खोजने और शिकार करने वाले क्षेत्र पूरी तरह से नष्ट हो जाएंगे। इससे उनके पूजा स्थलों, बागवानी के लिए इस्तेमाल होने वाले वनों और साफ पीने के पानी के स्रोतों को भारी नुकसान पहुंचेगा।
याचिका में 1972 की एक घटना का भी हवाला दिया गया है जब द्वीप के पूर्वी तट पर 330 पूर्व सैनिकों को बसाया गया था। इस गतिविधि ने शोम्पेन बस्तियों को काफी परेशान किया था, जिसके बाद वे जंगलों के भीतरी हिस्सों में जाने को मजबूर हो गए थे।
इस बात पर भी सवाल उठाया गया है कि क्या मौजूदा वन अधिकार अधिनियम अर्ध-घुमंतू शिकारी-संग्राहक शोम्पेन जैसी जनजातियों के लिए पर्याप्त है। याचिका में तर्क दिया गया है कि शोम्पेन को आत्मनिर्णय का अधिकार है और सरकार उनसे उनका प्राकृतिक आवास नहीं छीन सकती।
शोम्पेन लोग प्रशासन द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली हिंदी, अंग्रेजी, निकोबारी या कोई अन्य भाषा नहीं पढ़-लिख सकते हैं। वे प्रशासन के प्रस्ताव को समझ ही नहीं सकते हैं, ऐसे में वन अधिकारों के दावों के निपटारे और वन डायवर्जन के लिए सहमति देने की प्रक्रिया उनके लिए पूरी तरह से अकल्पनीय है।
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