
“सच तो यह है कि जहाँ समाचारपत्रों को स्वतंत्रता प्राप्त है, ऐसे किसी देश की तुलना में भारत के समाचार पत्र अधिक जिम्मेदार, तर्कसंगत और न्यायपरायण रहे हैं।” — जयप्रकाश नारायण (आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को लिखे पत्र में)
जयप्रकाश नारायण ने यह 1975 में लिखा था। प्रश्न यह है कि क्या उस समय भी यह बात सच थी? शायद नहीं। अगर भारतीय प्रेस सचमुच इतना न्यायपरायण और जनोन्मुख होता, तो जेपी आंदोलन के कार्यकर्ताओं द्वारा पटना में प्रदीप और सर्चलाइट कार्यालय में आग क्यों लगाई जाती?
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर चर्चा अक्सर इस तरह होती है, मानो कभी यहाँ एक आदर्श, निर्भीक और जनपक्षधर प्रेस हुआ करता था, जिसका आज पतन हो गया है। लेकिन भारतीय प्रेस का इतिहास इतना सरल नहीं है। औपनिवेशिक काल से ही भारत का मुख्यधारा प्रेस बड़े पैमाने पर बनिया–ब्राह्मण हितों का वाहक रहा है—आज की भाषा में कहें तो पूँजी और उच्च जातीय वर्चस्व का।
यह मान लेना सुविधाजनक है कि पहले प्रेस अधिक नैतिक था और आज केवल कॉरपोरेट नियंत्रण ने उसे बिगाड़ दिया है। जबकि सामाजिक प्रश्नों पर देखें, तो पुराने प्रेस में कई बार आज की तुलना में अधिक नंगापन था। दलितों, पिछड़ों, स्त्रियों और श्रमिक आंदोलनों को लेकर उसके दृष्टिकोण में “तटस्थता” कम, सामाजिक पूर्वग्रह अधिक दिखाई देते हैं।
हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में प्रेस राजनीतिक रूप से आज की तुलना में कुछ अधिक संतुलित था। लेकिन सामाजिक संरचना के स्तर पर वह तब भी अभिजनवादी था।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नार्वे में पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। भारत में तो स्थिति यह है कि प्रेस का एक बड़ा हिस्सा उनसे प्रश्न पूछने की स्थिति में ही नहीं रह गया है। इसी संदर्भ में बार-बार यह सवाल उठता है कि प्रेस स्वतंत्रता के वैश्विक सूचकांकों में भारत इतना नीचे क्यों है।
नार्वे, अमरीका, फ्रांस, जर्मनी, जापान और दक्षिण अफ्रीका में संविधान के द्वारा प्रेस को स्वतंत्रता दी गई है।
कुछ देशों में यह स्वतंत्रता एक संस्थान के रूप में भी प्रेस को उपलब्ध है और जबकि कुछ देशों में एक व्यक्तिगत पत्रकार के रूप में भी।
मसलन, संस्थान के रूप में नार्वे, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में मीडिया संस्थानों को सरकार की सेंसरशिप से सुरक्षा प्राप्त है। संस्थान अपनी संपादकीय नीति तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।
जबकि जर्मनी और नार्वे में व्यक्तिगत पत्रकार के रूप में भी पत्रकारों को अपने स्रोतों की रक्षा (Protection of Sources) करने का अधिकार है। इन दोनों देशों में किसी पत्रकार को अदालत में अपने गोपनीय स्रोत बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
इसलिए, यहाँ एक और प्रश्न भी है—भारत के संविधान निर्माताओं ने इन देशों की तरह प्रेस को अलग से संवैधानिक स्वतंत्रता क्यों नहीं दी?
जिस भारतीय प्रेस को स्वतंत्रता आंदोलन का अगुआ माना जाता, जिसमें भारतेंदु से लेकर गांधी, आंबेडकर, तिलक आदि सबके अखबार शामिल थे, उसे इस तरह उपेक्षित क्यों किया गया?
यह प्रश्न भारतीय समाज की संरचना से जुड़ा प्रश्न है। भारत में प्रेस को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्था मानने की धारणा जितनी प्रबल है, उतनी ही कम चर्चा इस बात पर होती है कि उस प्रेस का सामाजिक चरित्र क्या है।
भारतीय प्रेस स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय अवश्य था, लेकिन वह सामाजिक रूप से समानतामूलक नहीं था। भारतेंदु से गांधी और तिलक तक—अलग-अलग वैचारिक धाराओं के अखबार थे, लेकिन प्रेस का स्वामित्व और उसका सामाजिक आधार मुख्यतः अभिजन तबकों के हाथ में था।
संभव है कि संविधान निर्माताओं को यह भय रहा हो कि यदि प्रेस को संस्थागत स्वतंत्रता दी गई, तो वह सामाजिक रूप से वर्चस्वशाली समूहों की अभिव्यक्ति को स्थायी सुरक्षा दे देगा।
क्योंकि भारत में “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का प्रश्न हमेशा समान सामाजिक स्थितियों में नहीं उठता। एक ओर वह गरीबों, दलितों और असहमति रखने वालों की आवाज़ की रक्षा का प्रश्न है; दूसरी ओर वही स्वतंत्रता जातीय और आर्थिक प्रभुत्व को भी वैधता दे सकती है।
यही कारण है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता का प्रश्न केवल राज्य बनाम मीडिया का प्रश्न नहीं है। यह मीडिया के सामाजिक स्वामित्व, उसकी जातीय संरचना और न्यूज़रूम की सामाजिक विविधता का प्रश्न भी है।
भारत में मीडिया की सामाजिक संरचना पर हुए अध्ययन इस असमानता को स्पष्ट रूप से सामने लाते हैं। 2006 में अनिल चमड़िया और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक चर्चित अध्ययन में पाया गया था कि राष्ट्रीय मीडिया के शीर्ष निर्णयकारी पदों पर दलित और आदिवासी लगभग अनुपस्थित थे, जबकि ओबीसी की उपस्थिति भी अत्यंत सीमित थी। आज भी राष्ट्रीय मीडिया की कथित “राष्ट्रीय आवाज़” वस्तुतः कुछ उच्च जातीय समूहों की आवाज़ भर है।
इसके कुछ वर्षों बाद 2009 में मैंने और साथियों ने बिहार के हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू मीडिया संस्थानों पर एक सर्वे किया, जो “मीडिया में हिस्सेदारी" शीर्षक से एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था। उस सर्वे में पाया गया कि बिहार के मीडिया का पूरा संपादकीय नियंत्रण सवर्ण जातियों के हाथ में है। दलित पत्रकार लगभग अनुपस्थित थे और पिछड़े समुदायों की उपस्थिति भी बेहद सीमित थी। बिहार के उर्दू अखबारों में भी पसमांदा समुदाय के लोग नदारत थे।
यह केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है; यह इस बात का प्रश्न भी है कि समाचारों का चयन कौन कर रहा है, “जनहित” की परिभाषा कौन तय कर रहा है, और किन सामाजिक अनुभवों को “सामान्य” माना जा रहा है।
2019 में ऑक्सफैम इंडिया और न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट Who Tells Our Stories Matters ने लगभग उसी संरचना की राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्पुष्टि की। रिपोर्ट ने दिखाया कि टीवी एंकरों, संपादकों, बहस संचालकों और प्रमुख लेखकों में ऊँची जातियों का भारी वर्चस्व कायम है, जबकि दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय अब भी गंभीर रूप से अल्पप्रतिनिधित्व का शिकार हैं।
इन तीनों अध्ययनों को साथ रखकर देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय मीडिया की समस्या केवल कॉरपोरेट नियंत्रण या सरकारी दबाव की समस्या नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना की समस्या भी है, जिसमें अभिव्यक्ति के सबसे शक्तिशाली मंचों तक पहुँच समाज के कुछ ही समूहों को प्राप्त है। ऐसे में “प्रेस की स्वतंत्रता” कई बार पूरे समाज की स्वतंत्रता न होकर सामाजिक रूप से वर्चस्वशाली तबकों की स्वतंत्रता में बदल जाती है।
इसे दक्षिण अफ्रीका के उदाहरण से अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
1994 तक दक्षिण अफ्रीका रंगभेदी शासन के अधीन था। वहाँ प्रेस पर कठोर नियंत्रण था। 1996 के लोकतांत्रिक संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया। इसका उद्देश्य रंगभेद काल की सेंसरशिप को समाप्त करना और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था।
लेकिन राजनीतिक सत्ता बदलने के बावजूद मीडिया संस्थानों का मालिकाना हक बड़े पैमाने पर श्वेत कॉरपोरेट समूहों के हाथ में बना रहा। परिणाम यह हुआ कि मुख्यधारा मीडिया में अश्वेत समुदायों को अक्सर अपराध, गरीबी और हिंसा के फ्रेम में प्रस्तुत किया जाता रहा, जबकि श्वेत अभिजात वर्ग “पेशेवर”, “तटस्थ” और “जिम्मेदार” के रूप में दिखाई देता रहा।
भूमि सुधार, आर्थिक पुनर्वितरण और अश्वेत आंदोलनों को मीडिया के एक हिस्से ने “खतरनाक”, “अस्थिर” और “लोकलुभावन” राजनीति के रूप में चित्रित किया। दूसरी ओर कॉरपोरेट-समर्थक उदारवादी राजनीति को “व्यावहारिक” और “जिम्मेदार” बताया गया।
यानी प्रेस स्वतंत्र था, लेकिन उसमें सामाजिक विविधता नहीं थी।
भारत में स्थिति बहुत अलग नहीं है। यहाँ प्रेस को अलग संवैधानिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है, फिर भी मुख्यधारा मीडिया निरंतर वही करता है, जो दक्षिण अफ्रीका का कॉरपोरेट मीडिया करता रहा—वर्चस्वशाली सामाजिक समूहों के हितों को “राष्ट्रहित”, “तटस्थता” और “व्यावसायिकता” के रूप में प्रस्तुत करना।
इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता में कुछ लोग राजनीतिक और सामाजिक जोखिम उठाकर काम कर रहे हैं—रवीश कुमार, उर्मिलेश, अजीत अंजुम, आरफ़ा खानम शेरवानी, श्याम मीरा सिंह जैसे नाम सामने आते हैं। इसी तरह दलित दस्तक के अशोक दास, नेशनल दस्तक के शंभू कुमार सिंह और मूकनायक की मीना कोटवाल जैसे पत्रकार भी हैं, जिनका काम सामाजिक प्रश्नों पर महत्त्वपूर्ण है, भले वे मुख्यधारा की दृश्यता में कम हों।
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि इनका काम उनकी संस्थाओं से अधिक उनका व्यक्तिगत नैतिक और वैचारिक साहस है।
यही कारण है कि भारत में प्रेस को संवैधानिक रूप से और अधिक संस्थागत सुरक्षा देने का प्रश्न सीधा नहीं है। इसका अर्थ केवल साहसी पत्रकारों की रक्षा करना नहीं होगा; इसका अर्थ उन मीडिया संस्थानों को भी स्थायी सुरक्षा देना होगा, जो कई बार लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के सबसे बड़े विरोधियों की तरह काम करते हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि प्रेस स्वतंत्र होना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि एक गहरे असमान समाज में प्रेस की स्वतंत्रता आखिर किसकी स्वतंत्रता बन जाती है।
(प्रमोद रंजन लेखक, पत्रकार और हिंदी के प्रध्यापक हैं। वे मीडिया, जाति, सामाजिक न्याय, हिंदी समाज और संस्कृति से जुड़े प्रश्नों पर लगातार लिखते रहे हैं। हिंदी मीडिया की सामाजिक संरचना और उसमें प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर उनकी पुस्तिका “मीडिया में हिस्सेदारी” चर्चित रही है।)
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