
भोपाल। मध्यप्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव का परिणाम केवल सत्ता और विपक्ष की जीत-हार का मामला नहीं रहा, बल्कि इस चुनाव ने भारतीय जनता पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष, जातीय समीकरणों और स्थानीय संगठन की सक्रियता पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को 6016 वोटों से हराकर सीट अपने नाम कर ली। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह हार केवल कांग्रेस की मजबूत रणनीति का परिणाम नहीं थी, बल्कि भाजपा के भीतर हुए कथित भीतरघात और बदलते सामाजिक समीकरणों ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई।
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद शुरू हुआ असंतोष, सड़कों पर उतरे समर्थक
दतिया विधानसभा सीट लंबे समय तक पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक गढ़ रही है। वर्ष 2008 से लेकर 2023 तक वे लगातार इसी सीट से चुनाव लड़ते रहे और तीन बार विधायक भी चुने गए। हालांकि 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी हार के बाद भाजपा ने उपचुनाव में उम्मीदवार बदलते हुए आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा।
टिकट बदलने के फैसले के तुरंत बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने खुलकर नाराजगी जताई। कई स्थानीय पदाधिकारी, मंडल अध्यक्ष, पार्षद और कार्यकर्ता विरोध में सड़कों पर उतर आए। पार्टी के सामने सामूहिक इस्तीफे भी सौंपे गए। बाद में संगठन ने स्थिति संभालने की कोशिश की और विरोध शांत कराया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा बनी रही कि बड़ी संख्या में नाराज कार्यकर्ताओं ने चुनाव प्रचार में पूरी सक्रियता नहीं दिखाई। चुनाव परिणाम आने के बाद इस आशंका को और बल मिला।
हार के बाद भाजपा प्रत्याशी ने भी स्वीकारा- जिन्होंने पार्टी को माँ कहा, उन्होंने धोखा दिया
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जिन लोगों ने पार्टी के प्रति निष्ठा जताई थी, उन्हीं में से कुछ ने चुनाव के दौरान अपेक्षित सहयोग नहीं किया। दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी आरोप लगाया कि जिन नेताओं के टिकट कटे या जो नाराज थे, उन्होंने भीतरघात किया, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला।
इन बयानों के बाद भाजपा के भीतर चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि संगठन पूरी तरह एकजुट होता तो मुकाबला कहीं अधिक कड़ा हो सकता था।
2023 की जीत के बाद उपचुनाव तक कैसे पहुंची सीट
दतिया सीट पर 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने भाजपा के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा को लगभग साढ़े सात हजार वोटों से हराया था। बाद में एक कानूनी मामले में सजा होने के कारण उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई। इसी कारण सीट रिक्त हुई और उपचुनाव कराना पड़ा। कांग्रेस ने इस बार कुंवर घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाया, जिन्होंने पार्टी की जीत बरकरार रखी।
जातीय समीकरण बने निर्णायक, कुशवाहा समाज का रुझान बदला
दतिया उपचुनाव में सबसे अधिक चर्चा जातीय समीकरणों की रही। स्थानीय राजनीतिक जानकारों के अनुसार पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के मतदाताओं ने चुनाव परिणाम पर निर्णायक प्रभाव डाला। विशेष रूप से कुशवाहा समाज का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पक्ष में जाता दिखाई दिया।
मतदान से ठीक एक दिन पहले पूर्व पार्षद मृतक कल्लू कुशवाहा की पत्नी का एक वीडियो सामने आया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पति के कथित हत्यारों के साथ भाजपा प्रत्याशी और समर्थक दिखाई दे रहे हैं। यह वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना का मनोवैज्ञानिक असर कुशवाहा समाज पर पड़ा और भाजपा को नुकसान हुआ। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर कुशवाहा समाज से जुड़े कुछ भाजपा पदाधिकारियों की निष्क्रियता और भीतरघात की भी चर्चा रही।
अनुसूचित जाति, मुस्लिम और यादव मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की ओर
चुनावी विश्लेषण में यह भी सामने आ रहा है कि अहिरवार, जाटव, मुस्लिम और यादव समुदाय के मतदाताओं का बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ दिखाई दिया। इन सामाजिक समूहों के एकजुट मतदान ने कांग्रेस की बढ़त को मजबूत किया। दूसरी ओर भाजपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह एकजुट रखने में सफल नहीं दिखी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि भाजपा के भीतर कथित असंतोष नहीं होता और सामाजिक समीकरण उसके पक्ष में बने रहते, तो चुनाव परिणाम अलग हो सकते थे।
आजाद समाज पार्टी ने केवल कांग्रेस ही नहीं, भाजपा के वोट भी काटे
उपचुनाव में आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को करीब 21 हजार वोट मिले। चुनाव से पहले माना जा रहा था कि आजाद समाज पार्टी के मैदान में उतरने से कांग्रेस को अधिक नुकसान होगा, क्योंकि उसका प्रभाव दलित और पिछड़े वर्ग के वोटों पर पड़ सकता है।
हालांकि चुनाव परिणाम और मतदान के रुझानों का विश्लेषण करने वाले राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आजाद समाज पार्टी ने केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा के वोटों में भी सेंध लगाई। यानी तीसरे मोर्चे को मिले वोट दोनों प्रमुख दलों के संभावित वोट बैंक से आए। इसी कारण कांग्रेस की जीत का अंतर कम नहीं हुआ और कुंवर घनश्याम सिंह आरामदायक बढ़त के साथ चुनाव जीतने में सफल रहे।
बसई मंडल का चुनावी परिणाम दतिया उपचुनाव के सबसे दिलचस्प पहलुओं में से एक रहा। जहां 2023 के विधानसभा चुनाव में बसई मंडल की 11 पंचायतों में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा था, वहीं इस बार लगभग सभी पोलिंग बूथों पर भाजपा बढ़त बनाने में सफल रही। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, पूर्व मंत्री के कुछ समर्थकों द्वारा कांग्रेस के पक्ष में किए गए कथित प्रचार का अपेक्षित लाभ कांग्रेस को नहीं मिला, बल्कि इसका उल्टा असर देखने को मिला। दूसरी ओर भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर सक्रिय प्रचार किया, जिससे पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक एकजुट रहा। चूंकि बसई मंडल में ओबीसी, विशेषकर लोधी समाज के मतदाताओं की संख्या अधिक है, इसलिए इस वर्ग में सेंध लगाने की कोशिश भी सफल नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप बसई मंडल में भाजपा को मजबूत बढ़त मिली, हालांकि यह बढ़त दतिया विधानसभा के अन्य क्षेत्रों में हुई वोटों की कमी की भरपाई नहीं कर सकी और पार्टी को समग्र रूप से चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
भाजपा के सामने संगठन और सामाजिक संतुलन की चुनौती
दतिया उपचुनाव ने भाजपा के सामने कई राजनीतिक संकेत छोड़े हैं। पहला, संगठन के भीतर असंतोष यदि समय रहते दूर नहीं किया गया तो उसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। दूसरा, बदलते जातीय समीकरणों को साधना भविष्य की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। वहीं कांग्रेस के लिए यह जीत संगठनात्मक मजबूती और सामाजिक गठजोड़ की सफलता के रूप में देखी जा रही है।
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