
उत्तर प्रदेश: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी (SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच एक बार फिर तीखी सियासी बयानबाजी शुरू हो गई है। यह ताजा विवाद बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती (15 मार्च) को समाजवादी पार्टी द्वारा 'पीडीए (PDA) दिवस' के रूप में मनाने की योजना को लेकर खड़ा हुआ है। गुरुवार को मायावती ने सपा के इस कदम को पूरी तरह से 'राजनीतिक नाटक' करार दिया।
गुरुवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर हिंदी में अपनी बात रखते हुए बसपा सुप्रीमो ने समाजवादी पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सपा का इतिहास हमेशा से दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) और बहुजन समाज का विरोध करने का रहा है। उनका मानना है कि यह नया कदम केवल वंचित वर्गों के वोट बटोरने की एक चाल है।
मायावती ने यह भी कहा कि समाजवादी पार्टी का "आचरण, चरित्र और चेहरा" हमेशा से बहुजन समाज के महापुरुषों और प्रतीकों का अपमान करने वाला रहा है।
मायावती के इन बयानों के बाद अखिलेश यादव ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि 'पीडीए दिवस' एक नई शुरुआत का प्रतीक है और पूरा 'पीडीए समाज' इस फैसले से बेहद उत्साहित है।
क्या है PDA?
अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (PDA) शब्द गढ़ा है, जिसका अर्थ है:
P (पिछड़े): बैकवर्ड क्लासेस
D (दलित): अनुसूचित जातियां
A (अल्पसंख्यक): माइनॉरिटी
अखिलेश ने अपनी पार्टी के नेताओं को निर्देश दिया है कि 15 मार्च को उत्तर प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर कांशीराम की जयंती को 'बहुजन समाज दिवस' या 'पीडीए दिवस' के तौर पर मनाया जाए। उन्होंने एक बयान में कहा कि कांशीराम जैसे महान नेताओं के मिशन को आगे बढ़ाने के संकल्प से सब खुश हैं। बिना नाम लिए उन्होंने कहा, "सच तो ये है कि वो सब भी अंदर-ही-अंदर बेहद खुश हैं, जो किसी मजबूरीवश अपना पक्ष स्पष्ट रूप से नहीं रख पा रहे हैं या वो कहने पर मजबूर हैं जो वो कभी भी कहना नहीं चाहते हैं।"
सियासी तल्खी के बीच अखिलेश यादव ने पुराने दिनों को याद करते हुए स्पष्ट किया कि वह मुंहबोले रिश्तों का पूरा सम्मान करते हैं। यह उनका मायावती को "बुआ" कहकर बुलाने वाले दिनों की ओर इशारा था। उन्होंने जोर देकर कहा, "हम हमेशा मुंहबोले रिश्तों को दिल से निभाते हैं।"
इसके जवाब में मायावती ने सपा की पिछली सरकारों पर कांशीराम का अपमान करने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि सपा शासनकाल में कांशीराम नगर जिले का नाम बदला गया। इसके अलावा लखनऊ और सहारनपुर में बसपा संस्थापक के नाम पर बने संस्थानों के नाम भी परिवर्तित कर दिए गए थे।
मायावती ने सपा और भाजपा को एक-दूसरे के लिए 'सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी' बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों पार्टियां जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति के जरिए एक-दूसरे को पोषित करती हैं। इसी का नतीजा है कि यूपी में भाजपा सत्ता में आई, जिससे मुसलमानों और बहुजन समाज को भारी नुकसान हुआ है।
बसपा अध्यक्ष ने सवाल किया कि जब कांशीराम जीवित थे, तब उन्हें उचित सम्मान क्यों नहीं दिया गया और उनके निधन के बाद सपा सरकार ने राजकीय शोक घोषित क्यों नहीं किया?
मायावती ने 1993 के बसपा-सपा गठबंधन का जिक्र करते हुए सपा के 'दलित विरोधी' रवैये से सावधान रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि दलितों और कमजोर वर्गों पर अत्याचार रोकने की शर्तों के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपनी कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं किया।
इसी वजह से 1 जून 1995 को बसपा को अपना समर्थन वापस लेना पड़ा। मायावती ने 2 जून 1995 को लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में हुई घटना का विशेष रूप से उल्लेख किया, जहां उन पर हमला हुआ था। उन्होंने इसे "क्रूरता का दर्ज उदाहरण" बताया।
इन गंभीर आरोपों और पुराने इतिहास के जिक्र पर अखिलेश यादव ने इशारों-इशारों में बाहरी प्रभाव की बात कही। उन्होंने कहा, "ज़रूरी नहीं क़लम जिसकी हो लफ़्ज़ भी उसीके हों। ये सदैव नहीं होता कि जो लिख रहा है, शब्द उसी के हों, न ही हमेशा ये होता है कि बात से जो अर्थ निकले, वही उसका भाव भी हो। कभी-कभी लिखनेवाले और लिखवानेवाले अलग भी होते हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि समाज को बांटने और अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए नकारात्मक ताकतें अक्सर ऐसी साजिशें रचती हैं और लोगों को ऐसा करने के लिए मजबूर कर देती हैं।
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