बिहारः मंडल कमीशन के गढ़ मधेपुरा में दलितों के लिए सामाजिक न्याय की बातें महज 'कागजी'!

बी पी मंडल ने नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे कई समाजवादी नेताओं को तैयार किया, इसके बाद भी उनके पैतृक गांव में रहने वाले दलितों को विकास का कोई लाभ नहीं मिला.
बिहारः मंडल कमीशन के गढ़ मधेपुरा में दलितों के लिए सामाजिक न्याय की बातें महज 'कागजी'!

बिहार। मंडल राजनीति का गढ़ माने जाने वाला मधेपुरा क्षेत्र के मुरहो गांव में कच्चे घर और टिन की छत वाली झोपड़ियाँ सामान्य तौर पर देखी जा सकती हैं। बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार पिछले साल हुई जातिगत जनगणना रिपोर्ट पर भरोसा करते हैं और राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के मुद्दे के रूप में देशव्यापी जाति जनगणना का वादा करते हैं, लेकिन इस क्षेत्र को देखकर-जानकर पता चलता है कि यहां विकास कहीं पीछे छूट गया है। उल्लेखनीय है कि यह गांव सामाजिक न्याय के पुरोधा मंडल आयोग के अध्यक्ष रहे पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल का है।

मंडल आयोग की रिपोर्ट के जरिये अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का एक वर्ग जो भारतीय राजनीति में हाशिए पर था वह राजनितिक चर्चा में आया। रिपोर्ट के कारण ही समूहों से संबंधित नीतियों पर चर्चा शुरू हुई। मंडल देश में सामाजिक न्याय की राजनीति के अग्रणी प्रस्तावक थे और उनके विचारों ने लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और दिवंगत मुलायम सिंह यादव जैसे कई समाजवादी राजनेताओं को जन्म दिया। इसी के बाद ही समाजवादी पार्टी (एसपी) की स्थापना हुई। अब मुरहो गांव में समाजवादी नेता का स्मारक और उनका पैतृक घर बचा हुआ है।

इसी स्मारक से 100 मीटर से भी कम दूरी पर मुसहर टोला है, जहां प्रसिद्ध समाजवादी और क्षेत्र के पहले सांसद किराई मुसहर के वंशज एक झोपड़ी में रहते हैं, जिसकी दीवारें मिट्टी से सनी हुई हैं। अपने घर के सामने बैठे किराई मुसहर के पोते उमेश ऋषिदेव ने कहा कि नीतीश और लालू दोनों ने अपनी-अपनी जातियों का तुष्टिकरण करके सामाजिक न्याय आंदोलन को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। उन्होंने द मूकनायक को बताया- "दोनों नेताओं में से किसी ने भी दलितों को लाभ नहीं पहुंचाया।"

“इस गांव में महादलितों की हालत आप खुद देखिए। उनके बारे में तमाम चर्चाओं के बावजूद उनमें से किसी के पास भी कोई पक्का मकान नहीं है। हमारे घर को देखो। क्या आपने कभी किसी सांसद का ऐसा घर देखा है?” ऋषि देव कहते हैं।

महादलित समुदाय के किराई मुसहर 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर भागलपुर लोकसभा सीट, जिसमें उस समय मधेपुरा भी शामिल था, सांसद चुने गए थे।

मंडल ने 1967 का चुनाव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के उम्मीदवार के रूप में मधेपुरा संसदीय क्षेत्र से जीता, जो भागलपुर से अलग होकर बना था। उन्होंने 1968 में बिहार के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया, लेकिन 30 दिनों के बाद इस्तीफा दे दिया।

मंडल यादव जाति से संबंध रखते थे और उन्होंने पिछड़ा वर्ग आयोग (जिसे मंडल आयोग के नाम से जाना जाता है) की अध्यक्षता भी की है। इसके साथ ही मंडल कमीशन जैसी महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट (1978-1980) भी लिखी। इस रिपोर्ट ने ही सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग के लिए कोटे (आरक्षण) का सुझाव दिया था। जब वीपी सिंह सरकार ने 1990 में मंडल पैनल की सिफारिश लागू की तो बिहार और उत्तर प्रदेश में शक्तिशाली क्षेत्रीय दल उभरे।

मुरहो गांव स्थानीय लोगों के लिए, सामाजिक न्याय की मिसाल रहा है, लेकिन अब इसका महत्व बहुत कम हो गया है। यादव बाहुल्य माने जाने वाले मधेपुरा में 7 मई को तीसरे चरण में मतदान हुआ है। सत्तारूढ़ जद (यू) के दिनेश चंद्र यादव राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कुमार चंद्रदीप के खिलाफ चुनाव लड़ा है। सभी प्रत्याशी एक ही जाति (यादव) से हैं।

राजद प्रमुख लालू यादव कहते हैं - "रोम पोप का, मधेपुरा गोप का" [रोम पोप का है, मधेपुरा गोप (यादवों) का है]" -यह शब्द अब तक हुए चुनावों में सटीक साबित हुए हैं। दिनेश ने राजद के शरद यादव को 3 लाख से अधिक वोटों से हराया था। 1967 में मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र के निर्माण के बाद से हुए सोलह चुनावों और उप-चुनावों में केवल यादव उम्मीदवारों ने ही सीट जीती है।

गांव की बहुसंख्यक आबादी यादवों की है। अन्य समुदायों में महादलित और पचपनिया और कुर्मी जैसे कुछ अन्य ओबीसी समूह शामिल हैं। दिगंबर की उम्र लगभग 20 साल के आस-पास है और वह अपने पहले नाम से ही पहचाने जाना पसंद करते हैं, हालांकि वह जाति से यादव हैं। वह सभी राजनीतिक दलों से नाखुश हैं क्योंकि उनके अनुसार लोगों के मुद्दे कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बनते। दिगंबर रेलवे की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन भर्तियां कम हैं। वह जीविकोपार्जन के लिए छोटे-मोटे काम करते हैं।

“हालांकि हर पार्टी सामाजिक न्याय की बात करती है, केवल आर्थिक सशक्तिकरण ही वास्तविक सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेगा। शिक्षा और आर्थिक उत्थान के बिना कोई भी सामाजिक न्याय हासिल नहीं किया जा सकता। जब परिवार में एक आदमी को नौकरी मिलती है तो पूरा परिवार समृद्ध होता है। ” दिगंबर कहते हैं। दुर्भाग्य से, चुनाव जातिगत समीकरणों को सही करके और धर्म के नाम पर लड़े जाते हैं। कट्टर राजद समर्थक और मंडल के पोते आनंद मंडल चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश करते हैं।

“सामाजिक न्याय सिर्फ एक दर्शन से कहीं अधिक है। यह एक आंदोलन है. अफसोस की बात है कि जो लोग इस आंदोलन से निकले, उन्होंने खुद को सत्ता संघर्ष या परिवार को समृद्ध करने में शामिल कर लिया। हालाँकि, समाजवाद तब तक कायम रहेगा जब तक सामाजिक आर्थिक असमानता है।” दिगंबर दावा करते हुए कहते हैं क्षेत्रीय निवासी दावा करते हैं कि उन्होंने वर्षों से गांव में विकास नहीं देखा है और कोई भी राजनेता कभी भी इस क्षेत्र का दौरा नहीं करता है।

“आपको लगभग हर घर में पानी का नल मिलेगा। जल नल योजना के तहत पानी की पाइपलाइन लगायी गयी है। लेकिन पानी पीने लायक नहीं है। प्रधान मंत्री आवास योजना (पीएमएवाई - केंद्र की एक आवास योजना) यहां तक नहीं पहुंची है,'' दिगंबर शिकायत करते हुए कहते हैं।

दिनेश मौजूदा सांसद हैं और उनके पास जमीन पर एक मजबूत टीम है तो चंद्रदीप कोई सामान्य उम्मीदवार नहीं हैं। मशहूर शिक्षाविद् और पूर्व सांसद रमेंद्र कुमार रवि के बेटे होने के अलावा उनका अपना राजनीतिक दबदबा भी है, दोनों के बीच कड़ा मुकाबला हुआ है, देखते है चार जून को मतदाताओं का फैसला किसके पक्ष में होता है।

अनुवाद-सत्यप्रकाश भारती

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