समलैंगिक जोड़ों को गिफ्ट पर टैक्स छूट की मांग, आयकर विभाग ने बॉम्बे हाई कोर्ट में किया कड़ा विरोध

बॉम्बे हाई कोर्ट में आयकर विभाग ने स्पष्ट किया कि समलैंगिक जोड़ों को गिफ्ट टैक्स में छूट नहीं मिल सकती, क्योंकि भारतीय कानून के तहत उनके रिश्ते को 'विवाह' की कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है।
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सांकेतिक तस्वीर
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नई दिल्ली: आयकर विभाग ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक समलैंगिक जोड़े की उस याचिका का कड़ा विरोध किया है, जिसमें उन्होंने उपहारों पर लगने वाले टैक्स से राहत की गुहार लगाई है। इनकम टैक्स एक्ट की धारा 56(2)(x) के तहत कानूनी रूप से विवाहित पति-पत्नी के बीच दिए गए गिफ्ट्स पर टैक्स छूट का प्रावधान है। याचिकाकर्ता इसी नियम का लाभ अपने रिश्ते में भी लागू करने की मांग कर रहे हैं।

इस मामले में आयकर विभाग के प्रधान आयुक्त (न्यायिक) संदीप दहिया ने 14 अक्टूबर 2025 को अपना आधिकारिक हलफनामा दायर किया। यह हलफनामा जस्टिस बर्जेस कोलाबावाला और जस्टिस फिरदोश पूनावाला की खंडपीठ के समक्ष पेश किया गया है। विभाग ने अदालत से इस याचिका को 'भ्रामक' करार देते हुए इसे सिरे से खारिज करने की अपील की है।

हलफनामे में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि याचिकाकर्ता आयकर अधिनियम का सहारा लेकर 'जीवनसाथी' (स्पाउस) शब्द का अर्थ बदलने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के किसी भी विवाह कानून में फिलहाल समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। विभाग का तर्क है कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कोई कानूनी आधार पेश नहीं किया है जो उनके रिश्ते को विवाह के रूप में मान्यता देता हो।

अधिकारियों के अनुसार, यह याचिका पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है क्योंकि मांगी गई राहत का आयकर अधिनियम के मूल प्रावधानों से कोई सीधा संबंध नहीं है। आयकर अधिनियम का काम वैवाहिक कानूनों के विपरीत जाकर विवाह या जीवनसाथी की कोई नई परिभाषा गढ़ना नहीं है। अधिनियम के तहत इस शब्द की व्याख्या मौजूदा भारतीय विवाह कानूनों के दायरे में ही होनी चाहिए।

विभाग ने अपने रुख पर मजबूती से कायम रहते हुए अदालत के सामने दोहराया कि पति-पत्नी के बीच उपहारों पर मिलने वाली टैक्स छूट केवल उन्हीं रिश्तों पर लागू की जा सकती है, जिन्हें भारतीय कानून के तहत विवाह की मान्यता मिली हो। फिलहाल, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने इस मामले पर अपना अंतिम आदेश नहीं सुनाया है।

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