दिल्ली: बिल्डिंग से गिरकर मजदूर की मौत, कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों में बढ़ती ढ़ील

देशभर में तमाम जोखिम भरे कार्य स्थलों पर मजदुर काम करते हैं, लेक्किन उनकी सुरक्षा को लेकर कोई प्रबंध नहीं होता है.
दिल्ली: बिल्डिंग से गिरकर मजदूर की मौत, कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों में बढ़ती ढ़ील

नई दिल्ली: आनंद विहार के सूर्य निकेतन में एक निर्माणाधीन बिल्डिंग से गिरने के कारण एक मजदूर की मौत हो गई। मृतक की शिनाख्त निज़ाकत (40) के तौर पर हुई जो यूपी के शाहजहांपुर जिले के सीमापुरी के जवाहर पार्क वाले इलाके में रहते थे। आनंद विहार थाना पुलिस ने लापरवाही से मौत की कई धाराओं में केस दर्ज कर लिया है। पुलिस के मुताबिक नजाकत की मौत की खबर रविवार रात करीब 10:30 बजे सीमापुरी थाना पुलिस को जीडीपी अस्पताल में मिली। पुलिस अफसर ने पूछताछ की तो परिजनों ने बताया कि आनंद विहार इलाके के सूर्य निकेतन स्थित एक मकान बन रहा है। निज़ाकत वहां पर बेलदारी का काम कर रहे थे। वह दोपहर करीब 1:00 बजे बिल्डिंग की छत से नीचे गिर गए। जख्मी हालत में ज़ी टीवी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान मौत हो गई। सीमापुरी पुलिस ने आनंद विहार थाना पुलिस को मामले की सूचना दी। देर रात परिजनों से पूछताछ कर पुलिस ने मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया।

द मूकनायक ने संबंधित थाने में बात करने की कोशिश की लेकिन पुलिस अधिकारी से बात नहीं हो पाई।

मजदूरों का शहर की तरफ पलायन

हमारे देश का मजदूर वर्ग आज भी अत्यंत ही दयनीय स्थिति में रह रहा है। उनको न तो मालिकों द्वारा किए गए कार्य की पूरी मजदूरी दी जाती है और ना ही अन्य वांछित सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है। गांव में खेती के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। इस कारण बड़ी संख्या में लोग मजदूरी करने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर जाते हैं। जहां ना उनके रहने की कोई सही व्यवस्था होती है ही उनको कोई ढ़ग का काम मिल पाता है। मगर आर्थिक कमजोरी के चलते शहरों में रहने वाले मजदूर वर्ग जैसे तैसे कर वहां अपना गुजर-बसर करते हैं।

ना पीने को साफ पानी मिलता है और ना ही स्वच्छ

शहर के किसी गंदे नाले के आसपास बसने वाली झोपड़ पट्टियों में रहने वाले गरीब तबके के मजदूर कैसा नारकीय जीवन गुजारते हैं। उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। मगर इसको अपनी नियति मान कर पूरी मेहनत से अपने मालिकों के यहां काम करने वाले मजदूरों के प्रति मालिकों के मन में जरा भी सहानुभूति के भाव नहीं रहते हैं। उनसे 12-12 घंटे लगातार काम करवाया जाता है। घंटो धूप में खडे रहकर बड़ी-बड़ी कोठियां बनाने वाले मजदूरों को एक छप्पर तक नसीब नही हो पाता है।

मजदूरों को नहीं मिल रही सुविधाएं

कई कारखानों में तो मजदूरों से खतरनाक काम करवाया जाता है जिससे उनको कई प्रकार की बिमारियां लग जाती हैं। कारखानों में मजदूरों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, पीने का साफ पानी, विश्राम की सुविधा तक उपलब्ध नहीं करवायी जाती है। मालिकों द्वारा निरंतर मजदूरों का शोषण किया जाता है मगर मजदूरों के हितों की रक्षा के लिये बनी मजदूर यूनियनों को मजदूरों के बजाय मालिकों की ज्यादा चिंता रहती है।

हालांकि, कुछ मजदूर यूनियन अपना फर्ज भी निभाती हैं मगर उनकी संख्या कम है। हमारे देश में मजदूरों की स्थिति सबसे भयावह होती जा रही है। देश का मजदूर दिन प्रतिदिन और अधिक गरीब होता जा रहा है। दिन रात रोजी-रोटी के जुगाड़ में जद्दोजहद करने वाले मजदूर को तो दो जून की रोटी मिल जाए तो मानों सब कुछ मिल गया। आजादी के इतने सालों में भले ही देश में बहुत कुछ बदल गया होगा। लेकिन मजदूरों के हालात तो आज भी नहीं बदले हैं।

कितनी मिलती है दिहाड़ी

आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक 2021-22 में खेतीहर मजदूरों की दिहाड़ी का राष्ट्रीय औसत 323.2 रुपये था। मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में खेतीहर मजदूरों की दिहाड़ी 217.8 रुपये मिली जबकि, गुजरात में ये 220.3 रुपये रही। दूसरी ओर, केरल में ग्रामीण खेतीहर मजदूरों को 726.8 रुपये की दिहाड़ी मिली। बाकी राज्यों की बात करें तो ओडिशा में 269.5 रुपये, त्रिपुरा में 270 रुपये, महाराष्ट्र में 284.2 रुपये और यूपी में 288.0 रुपये की दिहाड़ी रही।

वहीं, केरल के बाद सबसे ज्यादा दिहाड़ी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु ने दी। जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में खेतीहर मजदूरों को 524.6 रुपये, हिमाचल में 457.6 रुपये और तमिलनाडु में 445.6 रुपये दिहाड़ी मिली।

भारत में स्थिति इतनी खराब क्यों है?

भारत में कार्यबल काफी आसानी से एवं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। देश का 90 प्रतिशत से अधिक श्रमबल असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है और उसमें उचित कौशल की कमी भी है। साथ ही देश में बेरोज़गारी की दर भी काफी उच्च है, जो श्रमिकों को शोषण के प्रति अतिसंवेदनशील बनाती है।

जरूरत से ज्यादा काम, और कोई ट्रेनिंग नहीं

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2022 में अहमदाबाद की एक पावर प्रेस में अमन शुक्ला का हाथ मशीन में आकर कुचल गया था। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का 21 वर्षीय अमन कुछ महीने पहले ही शहर आया था और उसने दुर्घटना से कुछ दिन पहले ही कारखाने में पावर प्रेस ऑपरेटर के रूप में काम करना शुरू किया था।

ऑटोमोबाइल कर्मचारियों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने वाले मानेसर के एक संगठन 'सेफ इन इंडिया फाउंडेशन' (SII) की क्रश्ड 2022 रिपोर्ट में कहा गया कि हर साल होने वाली दुर्घटनाओं में हजारों श्रमिकों के हाथ और उंगलियां कट जाती हैं। इस वजह से यह इंसान के दुख का कारण तो बनता ही है, साथ ही उद्योग व देश को श्रम-उत्पादकता का नुकसान भी होता है। दिसंबर 2022 में प्रकाशित एसआईआई की इस रिपोर्ट में छह राज्यों में ऑटो सेक्टर में लगी चोटों और दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑटो-हब में कई कर्मचारी प्रवासी हैं जो पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं। उनसे जरूरत से ज्यादा काम लिया जाता है और बदले में कम भुगतान किया जाता है।

मुआवज़ा देना अनिवार्य, क्या कहते हैं क़ानून?

  • भारत में श्रमिकों के लिए मुआवजा कंपनी के आकार के आधार पर तय होता है।

  • यदि किसी कम्पनी में 20 से अधिक श्रमिक काम करते हैं तो उस कम्पनी पर कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 लागू होता है।

  • इस अधिनियम के तहत कार्यस्थल पर किसी कर्मचारी को चोट लगने व घायल होने की स्थिति में कम्पनी उसे बीमा (क्षतिपूर्ति बीमा) लाभ का भुगतान करता है।

  • साथ ही उसे चिकित्सा खर्च व आर्थिक सहायता देना भी कम्पनी की जिम्मेदारी है ।

  • यदि किसी कम्पनी में 20 से कम कर्मचारी काम करते हैं तो उस कंपनी को कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (पूर्व में, कामगार मुआवजा अधिनियम, 1923) का उल्लेख करना चाहिए।

  • यह अधिनियम नौकरी पर घायल कर्मचारियों को मुआवजा प्रदान करने के तरीकों की रूपरेखा तैयार करता है।

  • अधिनियम विशेष रूप से छोटे कार्यालय स्थानों और छोटे पैमाने पर विनिर्माण कार्यों के लिए उपयुक्त है।

  • कर्मचारी मुआवजा अधिनियम में 2017 संशोधन

  • कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 में 2017 का संशोधन कहता है कि नियोक्ताओं / कंपनियों के लिए अनिवार्य है कि वे अपने कर्मचारियों को अपने अधिकारों के बारे में सूचित करें

  • जो कर्मचारी द्वारा समझी जाने वाली भाषा में, या तो लिखित रूप में या इलेक्ट्रॉनिक रूप से अधिनियम के तहत मुआवजे के लिए अपने कर्मचारियों को सूचित करेंगे।

  • ऐसा करने में विफल, नियोक्ता 50,000 रुपए यानि (715 अमेरिकी डॉलर ) के दंड के लिए उत्तरदायी है, जिसे 100,000 (1,431अमेरिकी डॉलर) तक बढ़ाया जा सकता है।

नियोक्ता को एक घायल कर्मचारी को क्षतिपूर्ति करने की आवश्यकता कब होती है?

  • कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत कार्यस्थल पर कार्य करते हुए यदि कोई कर्मचारी किसी दुर्घटना में गंभीर चोट लगने के कारण पूर्ण रूप से विकलांग हो जाता है।

  • स्थायी आंशिक विकलांगता हो जाए अथवा उसकी मौत हो जाती है तब नियोक्ता / मालिक को इस धारा के तहत कर्मचारी को मुआवज़ा देना होता है।

पूर्ण या कुल विकलांगता क्या है?

  • जब कोई कर्मचारी ऑन-द-जॉब (काम करते समय ) किसी चोट के कारण अपने पिछले कर्तव्यों में से कोई भी प्रदर्शन नहीं कर सकता है।

  • इस चोट का आंकलन किया जाना चाहिए कि वे अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए कर्मचारी की क्षमता को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

  • ऐसे मामले में, कर्मचारी 140,000 रुपये के न्यूनतम मुआवजे का हकदार है।

  • कर्मचारी के संभावित भविष्य की कमाई के आधार पर उसके मासिक वेतन का 60 प्रतिशत गुणा किया जाता है।

  • घायल कर्मचारी की उम्र के आधार पर कुल भुगतान काफी बड़ा हो सकता है।

अस्थायी आंशिक विकलांगता क्या है ?

•“आंशिक विकलांगता”, इसका मतलब है, वह चोट निरंतर था उस समय लगी, और विकलांगता एक स्थायी प्रकृति का है।

•स्थायी आंशिक विकलांगता हर चोट, या विकलांगता का प्रतिशत, या कुल प्रतिशत, ऐसी चोट जो उन्हें कर्मचारी को अपने कैरियर के बाकी हिस्सों के लिए एक ही क्षमता में अपनी भूमिका निभाने में असमर्थ बनाता है।तो कर्मचारी स्थायी आंशिक विकलांगता मुआवजे का हकदार है।

•आंशिक स्थायी विकलांगता के लिए, क्षति या चोट की प्रकृति और कर्मचारी की कमाई क्षमता के नुकसान पर निर्भर करता है।

•अधिनियम में संभावित स्थायी विकलांगता चोटों का एक शेड्यूल शामिल है और कमाई की क्षमता के नुकसान को सूचीबद्ध करता है।

•उदाहरण के लिए, कंधे पर विराजित एक हाथ को कमाई की क्षमता के 90 प्रतिशत नुकसान के रूप में मूल्यांकन किया जाता है।जबकि संपूर्ण तर्जनी के नुकसान को कमाई क्षमता का 14 प्रतिशत नुकसान माना जाता है। ऐसे मामलों में जब श्रमिक की चोट को दिए गए शेड्यूल में शामिल नहीं किया जाता है।

•नियोक्ताओं को घायल कर्मचारी का मूल्यांकन करने और कमाई की क्षमता के नुकसान की गणना करने के लिए एक चिकित्सा चिकित्सक उपलब्ध कराना चाहिए।

•घायल कर्मचारी के मुआवजे को तब कर्मचारी की संभावित भविष्य की कमाई के आधार पर एक कारक द्वारा मासिक वेतन से गुणा की गई खोई हुई क्षमता के प्रतिशत के आधार पर स्थापित किया जाता है।

अस्थायी विकलांगता

  • एक अस्थायी अवधि के लिए स्थायी रूप से या आंशिक रूप से विकलांगों को प्रस्तुत करने वाली चोटों को बनाए रखने वाले कर्मचारियों को अस्थायी विकलांगता के माध्यम से मुआवजा दिया जाता है।

  • अस्थायी विकलांगता के मामलों में, एक घायल कर्मचारी को हर दो सप्ताह में उनके वेतन का 25 प्रतिशत भुगतान किया जाएगा।

  • जिससे मासिक मुआवजा कुल अर्जित मजदूरी का पचास प्रतिशत होगा।

  • अस्थायी चोट के मामलों में, घायल कर्मचारी की जांच करने और आवश्यक छुट्टी निर्धारित करने के लिए एक चिकित्सा चिकित्सक की आवश्यकता होती है।

  • अस्थायी विकलांगता छुट्टी पर एक कार्यकर्ता को चोट लगने के बाद महीने में दो बार शारीरिक परीक्षा से गुजरना चाहिए और अगले महीने के दौरान एक बार अगर वे अभी भी विकलांगता का दावा कर रहे हैं तो।

मृत्यु होने पर

  • मृत्यु के दुर्भाग्यपूर्ण मामले में, श्रमिक के आश्रित मुआवजे के हकदार हैं।

  • मृत्यु पर देय मुआवजा 120,000 रुपए है, या कर्मचारी की संभावित भविष्य की कमाई के आधार पर श्रमिक का आधा वेतन जो अधिक हो।

  • मृत्यु के सभी मामलों में, यह सुनिश्चित करना नियोक्ता का कर्तव्य है कि कर्मचारी व्यक्तिगत खर्चों के बिना मृत्यु से पहले चिकित्सा खर्च को प्राप्त करें।

सुरक्षा संबंधी प्रावधान

  • सभी प्रकार की मशीनों के खतरनाक हिस्से को सही ढंग से ढका जाना चाहिये और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सभी मशीनों का उचित रखरखाव होना चाहिये।

  • किसी भी व्यक्ति को किसी भी मशीन पर कार्य करने की अनुमति तब तक नहीं दी जानी चाहिये, जब तक उसे मशीन के संदर्भ में सभी जानकारियाँ सही ढंग से उपलब्ध न करा दी जाएँ।

  • कारखाने में किसी भी व्यक्ति को इतना बोझ उठाने के लिये विवश नहीं किया जाएगा, जिससे उसे क्षति पहुँचने की संभावना हो।

  • यदि कारखाने में कोई ऐसा कार्य हो रहा है जिससे श्रमिकों की आँखों को कोई खतरा है तो यह अनिवार्य है कि नियोक्ता इससे बचाव हेतु उचित उपकरणों (जैसे-गॉगल) की व्यवस्था करे।

  • किसी व्यक्ति को कारखाने के ऐसे स्थानों, जहाँ रासायनिकों गैसों के प्रभाव में आने का खतरा है, पर तब तक जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी जब तक कि उसे बचाव हेतु उचित उपकरण न दिये जाएँ।

  • सभी कारखानों पर इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिये कि आग लगने जैसी किसी भी आपातकाल की स्थिति में सभी श्रमिक आसानी से बच सकें।

मजदूर साल भर मरते रहते हैं। मजदूरों की जिंदगी भी जिंदगी होती है। उनके साथ भी उनका परिवार भी जुड़ा होता है। वह परिवार के कमा्ऊ इंसान होता है। इसलिए उनके लिए सरकार को और भी अच्छे कदम उठाने चाहिए। उनके परिवार के लिए सोचना चाहिए। जिससे उनके जीवन में कुछ सुधार आए। लेकिन यह कब तक होगा यह कहना मुश्किल होगा। देश में कई मजदूर संघ मजदूरों के हकों की लड़ाई अभी भी लड़ रहे हैं।

द मूकनायक ने मजदूरों के हित के लिए कार्य कर रहे पंकज से बात की, वह दिल्ली में रहकर लेबर लाईन चलाते हैं। मजदूरों की जितनी भी परेशानियां होती है। उनको दूर करने में सहायता करते हैं। पंकज मजदूरों को मुआवजा दिलाने से लेकर उनके हित के लिए कार्य करते हैं और वह मजदूरों के कई संघों से भी जुड़े हैं।

उन्होंने द मूकनायक को बताया कि "इस केस में मजदूर की मौत हो गई है। यह वह मजदूर है जो अपना श्रमिक कार्ड नहीं बनवाएं हैं। और ऐसे में उनको मुआवजा दिलवाना या और कोई कार्य जो उनके मरने के बाद किया जा सके, वह मिलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर यह वह मजदूर होते हैं जो अपना श्रमिक कार्ड नहीं बनवाते। ऐसे में वह किस कॉलोनी में काम कर रहे हैं, कहां काम कर रहे हैं इसकी जानकारी किसी को नहीं होती। उत्तर प्रदेश में ऐसा प्रावधान है, कि अगर कहीं भी कोई भी घर बनता है या कोई निर्माण कार्य होता है, तो उसकी सूचना आपको जिला पटल में देनी होती है। क्योंकि कल अगर काम करते वक्त किसी मजदूर की मौत या वह अपाहिज हो जाता है। तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा‌! इसलिए हमने यह सोचा है कि छोटे-मोटे जितने भी ठेकेदार आदि होते हैं। सबको नाम लेकर हम सरकार के पास जाएंगे। उनका रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य हो, इसके लिए नियम बनाने के लिए कहेंगे। जिससे वह लोग भी अपने मजदूरों का रजिस्ट्रेशन करवाएंगे। जिससे उनकी देखभाल और उनकी पहचान हो सके।"

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