नोएडा मजदूर आंदोलन: कानूनी जाल में उलझी 25 वर्षीय मनीषा, 11 FIR को एक साथ जोड़ने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में गुहार

नोएडा मजदूर आंदोलन में गिरफ्तार 25 वर्षीय मनीषा चौहान ने एक ही घटना से जुड़ी 11 FIR को एक साथ जोड़ने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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उत्तर प्रदेश: नोएडा मजदूर आंदोलन के सिलसिले में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई 25 वर्षीय फैक्ट्री मजदूर मनीषा चौहान ने न्याय के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मनीषा ने अदालत से गुहार लगाई है कि उनके खिलाफ दर्ज 11 अलग-अलग प्राथमिकियों (एफआईआर) को एक साथ जोड़ दिया जाए।

द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये सभी मामले 10 से 13 अप्रैल के बीच हुई एक ही घटना से जुड़े हुए हैं। पुलिस द्वारा कुछ मामलों में दाखिल की गई चार्जशीट में भी सबूत और गवाह लगभग एक जैसे ही हैं, इसलिए इन सभी मुकदमों को क्लब किया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि नोएडा औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों ने अप्रैल महीने में वेतन वृद्धि, काम के घंटे और बेहतर ओवरटाइम भुगतान जैसे अहम मुद्दों को लेकर कई विरोध प्रदर्शन किए थे। इसी दौरान 13 अप्रैल को एक प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया था।

इस घटना के बाद पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया और ढेरों एफआईआर दर्ज कीं। प्रशासन का आरोप था कि कुछ बाहरी तत्वों और भ्रामक जानकारी फैलाने वाले नेटवर्क ने इस मजदूर आंदोलन को हाईजैक कर लिया था।

मनीषा के वकील माणिक गुप्ता का कहना है कि एफआईआर को एक साथ जोड़ने से इस मामले में फंसे सभी मजदूरों और कार्यकर्ताओं को सामूहिक रूप से मुकदमे का सामना करने में मदद मिलेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक सभी आरोपी एक साथ मौजूद नहीं होंगे, तब तक कानूनी सुनवाई ठीक से आगे नहीं बढ़ पाएगी।

वकील ने बताया कि चूंकि सभी मामले एक ही लगातार चले आ रहे विरोध प्रदर्शन से संबंधित हैं, इसलिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की है। इसके माध्यम से एक ही घटनाक्रम से उपजी इतनी सारी एफआईआर दर्ज करने और उन्हें जारी रखने को चुनौती दी गई है।

माणिक गुप्ता ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि मनीषा जैसे गरीब मजदूरों के लिए कानूनी प्रक्रिया को ही एक सजा बना दिया गया है। जैसे ही उन्हें एक मामले में जमानत मिलती है, उन्हीं आरोपों और समान घटनाओं का हवाला देते हुए उन पर तुरंत दूसरी एफआईआर थोप दी जाती है।

इस अंतहीन चक्रव्यूह के कारण उनकी जमानत का कोई मतलब नहीं रह जाता। वह लगातार जेल में ही रहने को मजबूर हैं और सिर्फ एक के बाद एक अन्य मामलों में जमानत मिलने का इंतजार कर रही हैं।

याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि इतनी सारी एफआईआर दर्ज करने का अब कोई वैध जांच उद्देश्य नहीं बचा है। यह केवल लगातार जेल में बंद रखने का एक सुनियोजित जरिया बन गया है, जबकि सभी मुकदमों के आरोप बिल्कुल एक समान हैं।

इस पूरे मामले में पुलिस की एक और कार्रवाई विवादों में है। वकील के अनुसार, यूपी पुलिस ने एक 16 वर्षीय नाबालिग को भी गिरफ्तार किया था, जिसे दो महीने से अधिक समय तक वयस्कों के साथ कासना जेल में रखा गया।

नाबालिग होने के बावजूद, उस लड़के से 50,000 रुपये की दो जमानत राशि (श्योरिटी) भरने को कहा गया। हालांकि, बाद में इस भारी-भरकम राशि को घटाकर 30,000 रुपये कर दिया गया और दो अन्य मामलों में उसे निजी मुचलके पर जमानत मिल गई।

वर्तमान में इन मजदूरों की स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है। उन्हें जमानत बांड भरने, सत्यापन कराने और अदालती सुनवाई के लिए अपने पैतृक गांवों से लंबी यात्राएं करनी पड़ रही हैं।

दूसरी ओर, कंपनियों ने प्रदर्शनकारी मजदूरों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है, जिससे अब नोएडा में उनके पास रोजगार का कोई भी साधन नहीं बचा है। ऐसे में मुकदमों को एक साथ क्लब करने से इन मजदूरों का भारी खर्च और कानूनी परेशानी काफी हद तक कम हो सकती है।

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