
भोपाल। मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के थांदला क्षेत्र में पद्मावती नदी किनारे स्थित वॉटर फिल्टर प्लांट में क्लोरीन गैस रिसाव की घटना ने प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर परतें खोल दी हैं। शुक्रवार शाम हुए इस हादसे में नगर परिषद के कर्मचारियों सहित कुल 49 लोग गैस की चपेट में आकर बीमार हो गए। सभी को तत्काल थांदला के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कई लोगों को अगले दिन तक ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया। राहत की बात यह रही कि फिलहाल सभी प्रभावितों की स्थिति खतरे से बाहर बताई जा रही है, लेकिन इस घटना ने नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय समाचार पत्रों के मुताबिक सामने आया कि यह हादसा अचानक नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही का परिणाम था। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017-18 में नल-जल योजना के तहत इस प्लांट की स्थापना की गई थी, जिसमें जल शुद्धिकरण के लिए लगभग 600 किलो क्षमता वाला क्लोरीन गैस टैंक लगाया गया था। शुरुआती कुछ महीनों तक इसका उपयोग किया गया, लेकिन बाद में ठेकेदार ने क्लोरीन की जगह ब्लीचिंग पाउडर का इस्तेमाल शुरू कर दिया। इसके बावजूद टैंक में करीब 50 किलो से अधिक क्लोरीन गैस वर्षों तक पड़ी रही, जिस पर न तो ठेकेदार ने ध्यान दिया और न ही नगर परिषद ने प्लांट का हैंडओवर लेने के बाद इसकी जांच की।
घटना के दिन प्लांट की सफाई के दौरान टैंक के बॉल्व में लीकेज हुआ, जिससे क्लोरीन गैस का रिसाव शुरू हो गया। मौके पर मौजूद कर्मचारियों और आसपास के लोगों को अचानक घबराहट, सांस लेने में दिक्कत और उल्टी की शिकायत होने लगी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गैस तेजी से फैलती गई और हवा का रुख पास के रिहायशी इलाके की ओर होने के कारण स्थिति और गंभीर हो गई। करीब 400 घरों वाले इस क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई और लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर जाने के लिए कहा गया।
फायर ब्रिगेड की टीम सूचना मिलते ही मौके पर पहुंची, लेकिन बचाव कार्य के दौरान एक और बड़ी लापरवाही सामने आई। टीम के पास सुरक्षा उपकरणों का अभाव था। फायर ब्रिगेड ड्राइवर मेहबूब छिपा ने बताया कि उनके पास केवल साधारण मास्क थे, जबकि कुछ लोग तो सिर्फ रुमाल बांधकर ही रेस्क्यू में जुट गए। क्लोरीन जैसी खतरनाक गैस से निपटने के लिए जरूरी स्पेशल मास्क, गॉगल्स, दस्ताने, बूट और रेजिडेंट सूट जैसी कोई व्यवस्था मौके पर उपलब्ध नहीं थी। परिणामस्वरूप, बचाव कार्य में लगे कर्मचारी भी गैस की चपेट में आ गए।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अंततः गैस से भरे टैंक को पानी में डाल दिया गया, जिससे गैस का प्रभाव कम हुआ और रिसाव पर काबू पाया जा सका। हालांकि, यह उपाय भी आपातकालीन स्थिति में लिया गया, जो यह दर्शाता है कि प्लांट पर किसी भी प्रकार की आपदा से निपटने की पूर्व तैयारी नहीं थी।
इस घटना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। स्थानीय विधायक वीरसिंह भूरिया ने बचाव कार्य में लापरवाही को दुर्भाग्यपूर्ण बताया, वहीं नगर परिषद की नेता प्रतिपक्ष वंदना भाभर के प्रतिनिधि सुधीर भाभर ने इस मामले पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी।
दूसरी ओर, महिला कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष रीना बोरासी ने झाबुआ दौरे के दौरान इस घटना को गंभीर बताते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि प्लांट पर सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे और कर्मचारियों को जरूरी सुरक्षा किट तक उपलब्ध नहीं कराई गई थी, जो सीधे तौर पर प्रशासन की लापरवाही को दर्शाता है।
रीना बोरासी ने यह भी कहा कि क्लोरीन गैस का प्रभाव सीधे फेफड़ों पर पड़ता है और ऐसी स्थिति में तत्काल और बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी होता है। उन्होंने मांग की कि सभी पीड़ितों का इलाज इंदौर के बड़े अस्पतालों में कराया जाए और प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को कम से कम दो लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही, उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की भी मांग उठाई।
वहीं, नगर परिषद के सीएमओ कमलेश जायसवाल ने सफाई देते हुए कहा कि टैंक के बॉल्व में लीकेज के कारण यह घटना हुई, लेकिन सभी प्रभावितों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई और स्थिति को नियंत्रण में ले लिया गया है। हालांकि, इस बयान के बावजूद कई सवाल अनुत्तरित हैं,आखिर वर्षों तक टैंक में गैस क्यों पड़ी रही, नियमित निरीक्षण क्यों नहीं हुआ और आपात स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक सुरक्षा संसाधन क्यों उपलब्ध नहीं थे।
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