आयुष्मान भारत योजना लेप्रसी प्रभावितों की मदद क्यों नहीं कर पा रही है?

बायोमेट्रिक की बाधाएं और लिस्ट से नदारद नाम: इलाज के लिए तरसते कुष्ठ प्रभावितों की अनसुनी दास्तां
Ayushman Bharat Yojana issues
फिंगरप्रिंट नहीं तो इलाज नहीं? जानिए, क्यों आयुष्मान भारत योजना कुष्ठ (Leprosy) मरीजों के लिए बेअसर साबित हो रही है और क्या है असली वजह।(Ai Image)
Published on

मेरा नाम बलराम घोषाल है और मैं मथुरा जिले में रहता हूं। यहां की लेप्रसी (कुष्ठ रोग) कॉलोनी मेरे लिए सिर्फ एक सुनी-सुनाई जगह नहीं, बल्कि एक रोज की हकीकत है। मेरी मां वहां रहती हैं। वे भी लेप्रसी से प्रभावित हैं और मेरे पिता भी इसी बीमारी से जूझ चुके हैं। बचपन से मैंने देखा है कि यह बीमारी केवल शरीर नहीं, बल्कि पूरे जीवन को धीरे-धीरे सीमित कर देती है। इलाज का अंतहीन खर्च, पहचान के कागजों की उलझन और सरकारी योजनाओं तक पहुंच के लिए लगातार चलने वाली जद्दोजहद; इस बीमारी से जुड़े संघर्षों में शामिल हैं। इसी अनुभव ने मुझे लेप्रसी प्रभावितों की जिंदगी को समझने और उनके हक की लड़ाई को दस्तावेज करने की दिशा में आगे बढ़ाया।

मैं नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसएबल्ड पीपल (एनसीपीईडीपी) के साथ फेलो के रूप में काम कर रहा हूं। इस दौरान मैंने 200 से अधिक लेप्रसी प्रभावितों का सर्वे किया। इसमें साफ तौर पर सामने आया कि बड़ी संख्या में लोग आयुष्मान भारत योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं और उन्हें इलाज के लिए लगातार आर्थिक संघर्ष करना पड़ रहा है।

मेरी मां जिस लेप्रसी कॉलोनी में रहती हैं, वहीं रहने वाले ठाकुर दास महतो जिनका कुछ दिन पहले ही निधन हो गया, इसका उदाहरण थे। वे पिछले 35 वर्षों से लेप्रसी के दुष्प्रभाव झेल रहे थे और लगभग 40 प्रतिशत विकलांग हो चुके थे। लेप्रसी में शरीर के प्रभावित हिस्सों की संवेदना कम हो जाती है, जिससे छोटी चोट या कट का पता ही नहीं चलता। समय के साथ ये मामूली घाव बड़े जख्म या अल्सर बन जाते हैं जिनके लिए नियमित ड्रेसिंग, लगातार इलाज और डॉक्टर की निगरानी जरूरी होती है।

इस इलाज पर लगातार खर्च आता है, जो पहले से ही बड़े परिवार की जिम्मेदारी उठा रहे लेप्रसी प्रभावितों के लिए भारी बोझ बन गया है। सरकार से उन्हें साल में केवल दो बार सहायता मिलती है, लेकिन यह इलाज की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाती। अपनी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद महतो कभी स्वास्थ्य बीमा नहीं ले पाए क्योंकि प्रीमियम भरना उनकी पहुंच से बाहर था।

उन्होंने स्थानीय कॉमन सर्विस सेंटर पर आयुष्मान कार्ड बनवाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें बताया गया कि उनका नाम साल 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) सूची में नहीं है, इसलिए वे पात्र नहीं हैं। उनका नाम बीपीएल कार्ड से भी हट चुका था, जबकि उनकी पत्नी का नाम अब भी दर्ज है। ऐसे में वे इलाज के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच लगातार संघर्ष करते रहते रहे।

महतो अकेले नहीं थे। सर्वे के दौरान कई ऐसे लेप्रसी प्रभावित सामने आए जिनके नाम एसईसीसी सूची में नहीं हैं और इसी कारण वे योजना से बाहर रह जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनका नाम सूची में होने के बावजूद आधार या केवाईसी सत्यापन में दिक्कत आती है। लेप्रसी के कारण कई मरीज फिंगरप्रिंट नहीं दे पाते हैं जो आयुष्मान भारत के लिए अनिवार्य हैं। डिजिटल केवाईसी में वीडियो या लाइवनेस चेक, स्क्रीन पर टैप और मूव जैसे स्टेप्स शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के लिए बेहद मुश्किल होते हैं। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया को दिव्यांग लोगों के लिए आसान बनाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन स्क्रीन रीडर, कमांड-बेस्ड नेविगेशन और अन्य एक्सेसिबिलिटी फीचर्स की कमी अब भी बड़ी बाधा बनी हुई है।

मेरी मां की कॉलोनी में भी अधिकांश लोगों के नाम आयुष्मान भारत की सूची में नहीं हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग योजना और कार्ड बनवाने की प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। जागरूकता की यह कमी उनकी समस्याओं को और बढ़ा देती है। जिन कुछ लेप्रसी प्रभावितों के पास आयुष्मान कार्ड है, उनसे भी अस्पतालों में बिना किसी कारण बीपीएल कार्ड और आधार कार्ड जैसे और भी दस्तावेज मांगे जाते हैं।

लेप्रसी प्रभावितों की इन दिक्कतों की जानकारी मैंने स्टेट एजेंसी फॉर कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एंड इंटीग्रेटेड सर्विसेज (एसएसीएचर्आएस) की सीईओ संगीता सिंह को भी दी है, ताकि इस स्तर पर कोई ठोस हस्तक्षेप हो सके। एनसीपीईडीपी की हालिया रिपोर्ट “इन्क्लूसिव हेल्थ कवरेज फॉर ऑल” भी बताती है कि भारत के करीब 16 करोड़ विकलांग लोग सरकारी और निजी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से बाहर हैं। इसमें लेप्रसी प्रभावितों की स्थिति और भी चिंताजनक है।

ये आंकड़े मेरे लिए सिर्फ संख्या नहीं बल्कि मेरी मां जैसी सैकड़ों जिंदगियां हैं, जो इलाज और रोजमर्रा के खर्च के बीच हर दिन समझौता करने को मजबूर हैं। जब तक नीतियां इन जिंदगियों तक नहीं पहुंचेंगी, तब तक ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज’ सिर्फ एक नारा ही बना रहेगा।

यह लेख इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू पर प्रकाशित हो चुका है. जो मूलरूप से आईडीआर हिंदी पर प्रकाशित हुआ था। इसे यहाँ देखा जा सकता है।

Ayushman Bharat Yojana issues
PG NEET में 'निगेटिव कटऑफ' को लेकर भ्रम: 10 Facts जो आपके लिए जानना है जरूरी
Ayushman Bharat Yojana issues
SC छात्रों के लिए खुशखबरी: स्कॉलरशिप के लिए आय सीमा 2.5 लाख से बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये करने की तैयारी
Ayushman Bharat Yojana issues
MP के इंदौर हाईकोर्ट का फैसला: शादी के बाद दूसरे राज्य से आकर बसने वाली महिलाओं को आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता, जानिए क्या है मामला?

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com