मध्य प्रदेश: उज्जैन कलेक्टर न्यायालय की अवमानना में दोषी, जानिए क्या था पूरा मामला?

मध्य प्रदेश: उज्जैन कलेक्टर न्यायालय की अवमानना में दोषी, जानिए क्या था पूरा मामला?

जमीन नामांतरण मामले में कलेक्टर ने इंदौर हाई कोर्ट के आदेश का पालन नही किया था, सजा से बचने के लिए मंगलवार को कलेक्टर तहसीलदार हाई कोर्ट परिसर पहुंच गए थे। अवमानना में दोषी करार दिए जाने के मामले में उन्होंने अपील दायर की थी। फिलहाल उन्हें कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी है।

भोपाल। मध्य प्रदेश इंदौर हाईकोर्ट ने उज्जैन कलेक्टर को कोर्ट आदेश की अवमानना का दोषी पाया है। जमीन नामांतरण के एक मामले में उज्जैन कलेक्टर नीरज सिंह सहित अन्य को अदालत के आदेश का पालन नहीं करना भारी पड़ गया। हाई कोर्ट ने आदेश का पालन नहीं करने पर कलेक्टर को दोषी करार दिया है।  

बुधवार को हाई कोर्ट कलेक्टर को सजा के प्रश्न पर सुनवाई होनी है। वहीं, सजा से बचने के लिए मंगलवार सुबह 10 बजे ही कलेक्टर, तहसीलदार हाई कोर्ट परिसर पहुंच गए थे। अवमानना में दोषी करार दिए जाने के मामले में उन्होंने अपील दायर की थी। शाम साढ़े चार बजे तक सुनवाई हुई, लेकिन कोर्ट ने अबतक कलेक्टर को कोई राहत नहीं दी है।

जानिए क्या है मामला?

दरअसल, उज्जैन के नलखेड़ा में किसान गुलाब प्रजापति व अन्य की जमीन को सीलिंग के तहत प्रशासन ने लिया था। फिर नियम आया कि सरकार ने सीलिंग की कार्रवाई कर दी है, लेकिन कब्जा नहीं दिया है तो जमीन छोड़नी होगी।

जमीन मालिक ने याचिका लगाई तो हाई कोर्ट ने पक्ष में फैसला दिया। प्रशासन सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां से भी राहत नहीं मिली। इसके बाद जमीन मालिक ने तहसीलदार के यहां आवेदन किया, पर उसे खारिज कर दिया गया। इस पर हाई कोर्ट में नामांतरण अर्जी दायर की गई। हाई कोर्ट ने जमीन नामांतरण याचिकाकर्ता के पक्ष में करने के आदेश दिए, फिर भी इसका पालन नहीं हुआ। जिसके बाद कोर्ट ने कलेक्टर और तहसीलदार को न्यायालय के आदेश की अवमानना का दोषी पाया। 

यह है सजा का प्रावधान

द मूकनायक से बातचीत करते हुए विधि विशेषज्ञ और हाईकोर्ट के अधिवक्ता मयंक सिंह ने बताया कि, कोर्ट के आदेश का पालन न करना न्यायालय की अवमानना है। ऐसे मामलों में न्यायाधीश उल्लंघनकर्ता व्यक्ति को न्यायालय की अवमानना ​​का दोषी ठहरा सकता है, जिसके लिए आर्थिक जुर्माना और जेल की सजा सहित कई प्रकार की सजा का प्रावधान है। यदि अवमानना करने वाला शासकीय सेवा में है तो कोर्ट उसे वेतन वृद्धि को रोके जाने या फिर निलंवन के निर्देश सरकार को दे सकता है। इसके साथ समय सीमा तय कर आदेश का पालन करना भी आवश्यक होता है।

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