महाराष्ट्र के प्याज किसान इन दिनों भारी आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। अपनी उपज की लगातार गिरती कीमतों से परेशान होकर नाशिक और छत्रपति संभाजीनगर के किसानों ने सोमवार, 18 मई को उग्र विरोध प्रदर्शन किया। किसानों का कहना है कि वे अपनी उत्पादन लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
इन नाराज किसानों की सीधी मांग है कि जिन लोगों ने सबसे कम दाम पर अपनी फसल बेची है, उन्हें सरकार की तरफ से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल का मुआवजा दिया जाए। The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, लासलगांव कृषि उपज मंडी समिति के बाजार निदेशक प्रवीण कदम ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि किसान भारी नुकसान झेल रहे हैं और सरकार को कम से कम 1500 रुपये देने पर विचार करना चाहिए, ताकि किसानों के हाथ में कुछ तो पैसा आ सके।
किसानों के इस आंदोलन को राजनीतिक दलों का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। एनसीपी विधायक रोहित पवार, एनसीपी-एसपी सांसद नीलेश लंके और भास्कर भगरे जैसे प्रमुख नेताओं ने एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में पहुंचकर किसानों का साथ दिया। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) के अंबाला के दानवे ने समृद्धि राजमार्ग पर वैजापुर के जांबरगांव में इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
अपना कड़ा विरोध दर्ज कराने के लिए प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर ही प्याज और भाकरी खाई। उन्होंने सरकार के सामने यह मांग रखी कि प्याज की सरकारी खरीद 25 रुपये प्रति किलो के भाव पर होनी चाहिए। रोहित पवार ने स्पष्ट किया कि एक किलो प्याज उगाने में 17 से 20 रुपये का खर्च आ रहा है और परिवहन की बढ़ती लागत का बोझ भी सीधा किसानों पर पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार मंडी समितियों और फिर नेफेड (NAFED) के जरिए प्याज नहीं खरीदती है, तो यह आंदोलन और उग्र हो जाएगा।
इससे पहले शुक्रवार, 15 मई को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक अहम घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार किसानों से 12.35 रुपये प्रति किलो यानी 1235 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर प्याज की खरीद करेगी। हालांकि, किसानों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है।
शिवसेना (यूबीटी) विधायक आदित्य ठाकरे ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर सरकार को घेरते हुए इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि दिन-रात खून-पसीना एक करने के बाद भी प्याज के कौड़ियों के भाव मिलना बेहद निराशाजनक और गुस्सा दिलाने वाली बात है। ठाकरे ने सरकार की घोषणाओं को महज 'हवा-हवाई' करार दिया और तुरंत नेफेड के जरिए खरीद शुरू करने, 2,000 रुपये प्रति क्विंटल का गारंटी मूल्य देने और उचित सब्सिडी प्रदान करने की मांग की।
आखिर क्यों सड़कों पर उतरे हैं किसान?
किसानों के इस भारी आक्रोश का मुख्य कारण उनकी गिरती आय है। इसका एक उदाहरण एक हफ्ते पहले छत्रपति संभाजीनगर के पैठण तालुका स्थित वरुडी गांव में देखने को मिला। वहां एक किसान को एपीएमसी मंडी में अपने 1,262 किलो प्याज के लिए मात्र 1 रुपये प्रति किलो का भाव मिला। उसकी कुल कमाई महज 1,262 रुपये हुई। इस घटना के बाद से ही पूरे महाराष्ट्र में प्याज के दाम चर्चा का एक बड़ा विषय बन गए हैं।
किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस नुकसान के पीछे मुख्य रूप से बेमौसम बारिश, खराब निर्यात नीति, बंपर पैदावार और बढ़ती महंगाई जिम्मेदार है। महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संघ द्वारा राज्य कृषि विभाग से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024-25 में 9.78 लाख हेक्टेयर में 115 से 118 लाख मीट्रिक टन प्याज का उत्पादन हुआ था। वहीं, 2025-2026 में 10 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई और उत्पादन का आंकड़ा 165 से 170 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया।
नाशिक के चांदवाड़ क्षेत्र के रहने वाले 50 वर्षीय किसान निवृत्ति न्याहारकर की कहानी भी इसी दर्द को बयां करती है। उनके पास ढाई एकड़ जमीन है और उन्होंने मार्च 2026 के सीजन के लिए प्याज की फसल में 1 लाख रुपये का निवेश किया था। लेकिन मंडी में उन्हें अपनी पूरी फसल के बदले सिर्फ 60,000 रुपये ही मिले। निवृत्ति का कहना है कि उत्पादन लागत ही 20 रुपये प्रति किलो है, जबकि प्याज 10 से 12 रुपये में बिक रहा है, ऐसे में खेती जारी रखना असंभव होता जा रहा है।
मार्च आमतौर पर फसल कटाई का मौसम होता है। लेकिन इस बार महाराष्ट्र के कई हिस्सों में ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश हुई, जिससे प्याज की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई। मंडी में इसी गुणवत्ता के आधार पर कीमत तय होती है। इस सीजन में सुपर क्वालिटी वाले प्याज को 1,500 रुपये प्रति क्विंटल और लाल प्याज को 1,417 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला। जबकि पिछले साल मार्च में ये दरें क्रमशः 2,627 रुपये और 3,101 रुपये प्रति क्विंटल थीं।
लासलगांव के एक अन्य किसान ने निराशा जताते हुए कहा कि 12.35 रुपये प्रति किलो का भाव किसी भी लिहाज से पर्याप्त नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार एयर कूलर सिस्टम वाले अपने खाली गोदामों का इस्तेमाल नहीं कर रही है, जिससे फसल को खराब होने से बचाया जा सकता है। इसके अलावा, कीटनाशकों और उर्वरकों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं, जिन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।
महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संघ के अध्यक्ष भरत दिघोले का कहना है कि घर चलाने और नकद पैसों की जरूरत के कारण हताश किसान अपनी उपज 600 से 850 रुपये प्रति क्विंटल के बेहद कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। उनका तर्क है कि अगर सरकार खेती के उत्पादों से लेकर रोजमर्रा की चीजों की महंगाई पर काबू पा ले, तो किसानों को मुआवजे की मांग ही नहीं करनी पड़ेगी।
कमजोर निर्यात नीति का असर
बाजार में प्याज की आपूर्ति बहुत अधिक है लेकिन निर्यात में भारी गिरावट आई है। इसके पीछे पश्चिम एशिया का मौजूदा संघर्ष एक बड़ा कारण है, क्योंकि अरब देश भारतीय प्याज के प्रमुख खरीदार हैं। इस तनाव के कारण कंटेनर से माल ढुलाई की कीमतें 600 डॉलर से बढ़कर सीधे 6500 डॉलर तक पहुंच गई हैं।
प्रवीण कदम ने बताया कि यमन और मिस्र जैसे देश अब ट्रकों के जरिए अरब बाजारों में प्याज की आपूर्ति कर रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार को माल ढुलाई की कीमतों को नियंत्रित करने के साथ ही प्याज निर्यात पर कम से कम 10 प्रतिशत की सब्सिडी देनी चाहिए ताकि भारतीय किसान वैश्विक बाजार में टिक सकें।
हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष विकास सिंह ने भी चिंताजनक आंकड़े साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि साल 2024-25 में बांग्लादेश भारत से 46 प्रतिशत प्याज खरीदता था। लेकिन 2025-26 में यह आंकड़ा गिरकर सिर्फ 6 प्रतिशत रह गया, क्योंकि बांग्लादेश में खुद प्याज की बंपर पैदावार हुई है।
केंद्र की कृषि निर्यात नीति का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और भारत को कृषि क्षेत्र में एक वैश्विक शक्ति बनाना है। लेकिन भरत दिघोले का कहना है कि सरकार की नीतियां विरोधाभासी हैं और इनसे यह बाजार पूरी तरह बर्बाद हो गया है।
विशेषज्ञों की अनदेखी और समितियों पर सवाल
महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्याज के मुद्दे पर बनाई गई समितियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने अगस्त 2025 में बीजेपी नेता पाशा पटेल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी, जिसका काम प्याज के लिए नीति तैयार करना था। इसके बाद मौजूदा संकट को सुलझाने के लिए मार्च 2026 में कृषि विभाग के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में दूसरी समिति गठित की गई।
किसानों और संघ के सदस्यों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि सरकार उन विशेषज्ञों से सलाह नहीं ले रही है जिन्होंने अपना पूरा जीवन प्याज उद्योग में खपा दिया। उनका आरोप है कि सरकार ने पाशा पटेल जैसे लोगों को नियुक्त किया, जो असल में बांस के विशेषज्ञ हैं, प्याज के नहीं।
लगातार हो रहे इस नुकसान का सीधा असर किसानों के निजी जीवन पर पड़ रहा है। किसानों ने भारी मन से बताया कि खेती में हो रहे इस घाटे के कारण उनके घरेलू बजट, बच्चों की शिक्षा, शादी-ब्याह और अन्य जरूरी खर्च बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं, जिससे उनका पूरा परिवार दांव पर लगा हुआ है।
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