MP: स्वर्ण रेखा नदी सरक्षंण के लिए सरकार के पास पैसे नहीं, कोर्ट ने कहा - 'कहिए तो प्रदेश में आर्थिक आपातकाल का आदेश दे दें!'

26 किमी की जाली लगाने के लिए मात्र 2 करोड़ का फंड आवंटित करने में हो रही देरी पर हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीरफोटो साभार- इंटरनेट

भोपाल। मध्य प्रदेश की हाईकोर्ट खंडपीठ ग्वालियर ने नगर निगम को फटकार लगाते हुए कहा कि यदि सरकार के पास पैसा नहीं है तो कोर्ट आदेश दे देगा की प्रदेश में आर्थिक आपातकाल है। ग्वालियर में स्वर्ण रेखा नदी के दोनों तरफ लगभग 26 किमी की जाली लगाने के लिए मात्र 2 करोड़ का फंड आवंटित करने में हो रही देरी पर हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।

स्वर्ण रेखा नदी पुनर्जीवित की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस रोहित आर्या और जस्टिस आरके वानी की डिवीजन बेंच ने अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी से कहा, "यहां-वहां करोड़ों रुपए बहाए जा रहे हैं और 2 करोड़ रुपए नहीं हैं आपके पास कि जाली लग जाए, और आम जनता के काम आए। बांटने के लिए हजारों करोड़ रुपए हैं। इससे बड़ी विडंबना कुछ और हो सकती है? इससे ज्यादा खर्चा तो एक आमसभा में हो जाता है।"

"जब शासन के पास लोगों को मूलभूत सुविधाएं देने का पैसा नहीं है तो कोर्ट क्यों इतने ऑर्डर पास करे? बोल दो कि हमारे पास कुछ नहीं है, जो कुछ है वो हमने बच्चों को बांट दिया, अब तो बस जैसे-तैसे सरकार चला रहे हैं। आप कह दीजिए कि पैसे नहीं है तो हम सबको सुनने के बाद यह आदेश दे देंगे कि प्रदेश में फाइनेंशियल इमरजेंसी की स्थिति है, पर सबको सुनने के बाद ही हम ये कर पाएंगे," कोर्ट ने कहा.

कोर्ट की फटकार के बाद निगमायुक्त हर्ष सिंह कोर्ट को आश्वस्त किया कि जाली लगाने का काम निगम ने अपने हाथों में ले लिया है और जल्द ही इसे पूरा कर दिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई अब 12 अप्रैल को होगी। 

जस्टिस आर्या 27 अप्रैल को रिटायर होने जा रहे हैं। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि निजी एजेंसी ने क्या-क्या काम करने का दावा किया और अब तक क्या-क्या काम किया। ये सारी जानकारी ऑर्डर में लिखकर जाऊंगा ताकि मेरे बाद जब सुनवाई हो, तो जज को यह पता चले कि यह मामला कितना गंभीर, कितना महत्वपूर्ण है और इसमें किसी भी प्रकार की लीपापोती नहीं की जा सके। बता दें कि वर्ष 2019 में स्वर्ण रेखा को पुनर्जीवित करने की मांग करते हुए एडवोकेट विश्वजीत रतोनियां ने जनहित याचिका दायर की है।

नाले में तब्दील हुई नदी

शहर के बीचों-बीच बहने वाली स्वर्ण रेखा लगभग 29 किमी लंबी कभी शहर की जीवन रेखा हुआ करती थी और इस नदी से इतिहास भी जुडा हुआ है। यह वह नदी है जिसके किनारे वीरांगना लक्ष्मीबाई ने अंतिम सांस ली थी और वर्तमान में यहां वीरांगना का समाधि स्थल बना हुआ है। यह नदी कभी शहर की शान हुआ करती थी लेकिन अब स्वर्ण रेखा नदी का नाम सरकारी कागजों में ही है और निगम व प्रशासन की लापरवाही से यह एक नाला बन चुकी है।

स्वर्ण रेखा नदी जब से कंक्रीट की बनी है तब से नगर में भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि आसपास के क्षेत्र में लगे हैंडपंप तक सूख चुके हैं और बोरिंगे भी फेल होती जा रही हैं। वहीं शहरवासियों की प्यास बुझाने के लिए तिघरा पर लगातार लोड बढ़ता जा रहा है।

निगम अधिकारियों ने स्वर्ण रेखा में साफ पानी बहाने के नाम पर शहरवासियों को नदी में नाव चलाने का सपना दिखाते हुए इसमें करोड़ों रुपए खर्च कर इसे कंक्रीट कर दिया, लेकिन इसमें नाव तो नहीं चली उल्टा शहर का भूजल स्तर तेजी से गिरने के साथ ही नदी नाला में बदल गई। शहर के कई इलाकों का गंदा पानी नदी में पहुँच रहा है। जिसके कारण अब यह नदी एक बड़े नाले की तरह दिखाई देती है।

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