मध्य प्रदेश: भोपाल कलियासोत नदी किनारे नो-कंस्ट्रक्शन जोन में बिल्डिंगों को कैसे मिली अनुमति?

कलियासोत नदी के नो कंस्ट्रक्शन जोन में करीब 1100 से अधिक अतिक्रमणों को चिह्नित कर नोटिस भेजे गए हैं। लेकिन कार्रवाई से पहले इस मामले में रहवासियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने स्टे दे दिया है।
कलियासोत नदी, भोपाल
कलियासोत नदी, भोपाल

भोपाल। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा कलियासोत नदी की चौड़ाई छोड़ कर दोनों किनारे से 33 मीटर के दायरे में अनधिकृत रूप से मकान बनाने वालों पर कार्रवाई करने के आदेश जारी होने के बाद निगम और जिला प्रशासन की शुरू हुई कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। निगम के अधिकारियों द्वारा कलियासोत नदी के नो कंस्ट्रक्शन जोन का चिह्नांकन व सीमांकन कर लिया गया है। इसमें करीब 1100 से अधिक अतिक्रमणों को चिह्नित कर नोटिस भी भेजे गए हैं। लेकिन कार्रवाई से पहले इस मामले में रहवासियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने स्टे दे दिया है। कोर्ट के सामने रहवासियों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जब यहां निर्माण अवैध था, तो अधिकारियों ने अनुमति क्यों दी।

बता दें कि नगर निगम ने कलियासोत नदी के इर्द-गिर्द 33 मीटर के दायरे में आ रहे निर्माण कार्यों को लेकर 700 से अधिक लोगों को नोटिस दिए हैं। इन्हीं नोटिस की कार्रवाई को रोकने के लिए स्टे दिया गया है। इसके अलावा इस हिस्से में रह रहे 350 से अधिक झुग्गिवासियों को भी नोटिस जारी किया गया है। इस मामले में नोटिस मिलने के बाद रहवासियों का तर्क था कि नगर निगम समेत अन्य एजेंसियों की अनुमति के आधार पर ही मकानों का निर्माण किया गया है, फिर यह अवैध कैसे हो सकते हैं?

कलियासोत नदी
कलियासोत नदी

इस मामले में रहवासियों ने नगर निगम आयुक्त फ्रैंक नोबल ए. के सामने भी पक्ष रखा था। इसके बाद हाईकोर्ट में सागर प्रीमियम फेस-2 के रहवासियों के पक्षकार एडवोकेट आर्यन उरमलिया ने बताया कि नगर निगम द्वारा नोटिस दिए जाने के मामले में रहवासियों की तरफ से उच्च न्यायालय में याचिका लगाई गई थी। कोर्ट में सुनवाई के बाद स्टे दिया गया है।

कोर्ट ने चार सप्ताह में मांगा जवाब

नगर निगम के नोटिस को लेकर सिग्नेचर 99 के रहवासियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले में निगम को अगले 4 सप्ताह में जवाब देने को कहा गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 11 अगस्त को आदेश दिया था कि भोपाल की नदी कलियासोत के 33-33 मीटर के ग्रीन बेल्ट को आरक्षित किया जाए। इसके लिए 31 दिसंबर तक चिह्नांकन, सीमांकन कर अतिक्रमण को हटा कर हरियाली विकसित की जाए। इस अवधि में जिला प्रशासन ने सीमांकन का काम पूरा कर लिया। वहीं एनजीटी के समक्ष 15 जनवरी से पहले रिपोर्ट सौंपना है। हालांकि, इससे पहले निगम के नोटिस पर रहवासियों को स्टे मिला है।

दरअसल कलियासोत नदी के आसपास हुए अवैध अतिक्रमण के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में यह केस 2014 से प्रचलित है। एनजीटी ने अगस्त 2023 में दो माह में नदी के दोनों किनारे से 33 मीटर के दायरे में चिन्हांकन और सीमांकन करने के आदेश दिए थे। इसके बाद 31 अगस्त तक इस दायरे में आने वाले अवैध अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण को तोड़ने को कहा था। आदेश पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट 15 जनवरी को पेश करने के निर्देश दिए थे। जिसके लिए नगर निगम सीमांकन और नदी की सीमा में बने अवैध मकानों को नोटिस भेज रही है। पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी पांडेय ने बताया कि पर्यावरण के सरक्षंण के लिए नदी, तालाबों और जंगलों का सरंक्षण होना जरूरी है।

30 साल के भीतर हुआ कंस्ट्रक्शन

कलियासोत नदी के समीप सागर प्रीमियम टॉवर, अल्टीमेट कैंपस, भूमिका रेसीडेंसी, सिग्नेचर, सर्वधर्म, मंदाकिनी कॉलोनी, शिर्डी पूरम, अमरनाथ कॉलोनी इसके साथ अन्य मकानों का निर्माण 30 वर्षों के भीतर हुआ है। इन बड़ी बिल्डिंगों को परमिशन नगर निगम और अन्य एजेंसियों ने दी थी। अब सवाल यहीं खड़ा होता है कि जब नदी के किनारे नो कंस्ट्रक्शन जोन था तब इन 6 मंजिला मल्टियों के नक्शे कैसे स्वीकृत हो गए, इसके साथ सम्बंधित विभागों के अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) कैसे मिल गए?

यह है जनश्रुति

बात 11 वीं सदी की है। धार के राजा भोज एक ऐसे चर्म रोग से पीड़ित हो गए जिसका इलाज किसी भी वैद्य-हकीम के पास नहीं था। कहते हैं कि एक सिद्ध साधु ने उन्हें बताया कि यदि वह एक ऐसा जलाशय बनाएं जिसमें 365 वाटर सोर्स से पानी भरता हो, और उसमें स्नान करेंगे तो राजा की स्किन पहले की तरह दमकने लगेगी। राजा ने अपने विशेषज्ञों को इस तरह के स्थान की खोज करने के लिए भेज दिया जहां पर 365 वाटर सोर्स मौजूद होता कि जलाशय बनाया जा सके।

राजा भोज के विशेषज्ञ बेतवा नदी के मुहाने पर आकर रुक गए क्योंकि यहां पर 356 वाटर सोर्स से पानी आ रहा था, लेकिन प्रॉब्लम यह थी कि यह संख्या सिद्ध साधु द्वारा बताई गई संख्या 365 से 9 कम थी। राजा के दरबारी परेशान थे तभी भोपाल में रहने वाले गोंड कबीले के मुखिया (कालिया) ने राजा के विशेषज्ञों एक ऐसी नदी के बारे में बताया जो जंगल में बहती है और जिसके 9 वाटर सोर्स हैं। यानी दोनों नदियों का पानी मिलाकर एक जलाशय में डाल दिया जाए तो उसका टोटल वाटर सोर्स 365 हो जाएगा।

इस प्रकार भोपाल के तालाब का निर्माण शुरू हुआ। राजा भोज बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें मृत्यु के निकट ले जा रहे चर्म रोग से मुक्ति मिल गई थी। जंगल में बहने वाली इस अज्ञात नदी का नाम गोंड आदिवासी कबीले के मुखिया कालिया के नाम पर कालियास्त्रोत रखा गया, समय के साथ इसका उच्चारण बदला और इसे कलियासोत नदी कहा जाता है।

इस नदी के पानी में आज भी काफी चमत्कारी गुण हैं। कलियासोत नदी के पानी का उपयोग किसानों के खेतों में सिंचाई के लिए किया जाता है और आश्चर्यजनक रूप से काफी अच्छी फसल होती है। काली नदी के पानी से सिंचित खेतों की फसलों में न्यूट्रिशन वैल्यू भी काफी अच्छी देखी गई है।

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