JNUSU निष्कासन मामला: रस्टिकेटड छात्रों ने खोला राज, क्या है असल विवाद और आगे क्या?- एक ग्राउंड रिपोर्ट

स्टूडेंट्स का कहना है कि प्रशासन पिछले कुछ सालों से UR श्रेणी में दाखिला लेने वाले OBC, SC और ST समुदाय के छात्रों को छात्रावास के आवंटन में आरक्षण में फेरफार करता है, जिसके खिलाफ आवाज़ उठाने के कारण उन पर यह प्रशासनिक कार्यवाही हुई है।
विचारधाराओं का गढ़ कहा जाने वाला यह विवि इस बार जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों के निष्कासन को लेकर चर्चा में है।
विचारधाराओं का गढ़ कहा जाने वाला यह विवि इस बार जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों के निष्कासन को लेकर चर्चा में है। फोटो- विवेक मिश्रा/ द मूकनायक
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नई दिल्ली- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। विचारधाराओं का गढ़ कहा जाने वाला यह विश्वविद्यालय इस बार जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों के निष्कासन पर चर्चा में है। जेएनयू छात्रसंघ के वर्तमान सभी पदाधिकारी (अध्यक्ष-अदिति मिश्रा, उपाध्यक्ष-गोपिका बाबू, महासचिव-सुनील यादव, संयुक्त सचिव-दानिश अली) और पूर्व जेएनयूएसयू अध्यक्ष नीतीश कुमार को 2 फरवरी को विश्वविद्यालय से दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर दिया गया है। साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में उनके प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया गया है और इन सभी पदाधिकारियों पर 20-20 हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया है।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन छात्रों पर आरोप लगाया है कि दिनांक 21 नवम्बर को जेएनयू स्थित डॉ. बी. आर. अंबेडकर केंद्रीय पुस्तकालय में लगे फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) आधारित एक्सेस गेट को नष्ट किया गया। इन्हें भेजे गए नोटिस में यह भी स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि यदि इन छात्रों को कोई भी परिसर के छात्रावास या आवास में पनाह देता है तो उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। इसके अलावा उस दिन धरना स्थल पर मौजूद 8 अन्य छात्रों को धरने में शामिल होने और ताली बजाने के लिए जांच के लिए नोटिस मिला है और प्रत्येक पर 19,000 रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया गया है।

इसी संदर्भ में एक्टिंग लाइब्रेरियन मनोरमा त्रिपाठी ने वसंत कुंज उत्तरी थाने में सभी वर्तमान चारों पदाधिकारियों और पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी, जिसके संदर्भ में सभी को पूछताछ के लिए एक बार थाने में बुलाया जा चुका है। जेएनयू के छात्रों ने एक्टिंग लाइब्रेरियन मनोरमा त्रिपाठी द्वारा कराई गई इस FIR को छात्रों के प्रति द्वेषपूर्ण व्यवहार और छात्रों के अपराधीकरण की प्रक्रिया कहा है।

 अदिति मिश्रा
अदिति मिश्राफोटो- विवेक मिश्रा/ द मूकनायक

जेएनयूएसयू की अध्यक्ष अदिति मिश्रा कहती हैं, “जिस दिन हमारा निष्कासन हुआ उस दिन स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर एंड कल्चर में 'सिद्धांता नॉलेज फाउंडेशन’ नाम की एक निजी संस्था के खिलाफ पूरे दिन का सफल स्ट्राइक रहा, जहां ‘वैल्यू एडिट कोर्स’ के नाम पर छात्रों को रिकॉर्डेड वीडियो पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है। उस दिन के बाद कुलपति डर गई हैं।”

 उन्होंने प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए। वे कहती हैं, “कॉन्वेंशन सेंटर को इस्कॉन जैसे धार्मिक संस्था को दिया जाता है जबकि इसके लिए रूल बुक में भी मनाही है। छात्रों को ही अपने कॉन्वेंशन सेंटर लेने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है और मिलता भी है तो 15,000 सिक्योरिटी मनी जमा करने के बाद।” वे प्रशासन पर संदेह जताती हैं कि, “कुलपति ने पुस्तकालय में फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी लगवाई है, जबकि पुस्तकालय में पहले से एक डिजिटल स्कैनर सिस्टम मौजूद है।”

वे कहती हैं, बिना किसी एनओसी के, बिना किसी फायर एग्जिट सिस्टम के वहां सिस्टम को इंस्टॉल किया गया था। किसी अप्रिय घटना के घटने पर छात्र क्या करेंगे?” अदिति कहती हैं, “हमारी यूजीसी इक्विटी गाइडलाइन को रोहित वेमुला एक्ट के तर्ज पर लागू करने की लड़ाई, निष्कासन की लड़ाई, सीपीओ मैन्युअल और निजीकरण के खिलाफ की लड़ाई एक साथ लड़ी जाएगी। अब एक-एक चीज का हिसाब लिया जाएगा।” अदिति बताती हैं, "सीपीओ (चीफ प्रॉक्टर ऑफिस) मैन्युअल अहम आवाज को कुचलने के लिए लाया गया है। यह मैन्युअल देशद्रोही गतिविधि की भी बात करता है लेकिन देशद्रोह की परिभाषा इसमें स्पष्ट नहीं है। किसी भी छात्र के वक्तव्य के आधार पर उसे परेशान किया जा सकता है और उसकी असहमति की आवाज को चुप कराया जा सकता है। यह मैन्युअल पूरे जेएनयू परिसर को धरना मुक्त करने की बात करता है कि आप किसी भी चीज के लिए आवाज नहीं उठा सकते।”

गोपिका बाबू
गोपिका बाबू फोटो- विवेक मिश्रा/ द मूकनायक

जेएनयूएसयू उपाध्यक्ष गोपिका बाबू कहती हैं, “प्रशासनिक कार्यवाही से साफ स्पष्ट है कि प्रशासन को असहमति की आवाज से कितना डर है।” वह कहती हैं, “हमारा निष्कासन ऐसे समय पर हुआ है जब मौजूदा सरकार बिल्कुल भी यूजीसी इक्विटी गाइडलाइन लाने के पक्ष में नहीं है और वह यह नहीं चाहती कि जेएनयू में इसे लेकर कोई आंदोलन जन्म ले। लेकिन हम रुकेंगे नहीं, हम एक जनसमूह के साथ रोहित एक्ट की मांग करेंगे और तानाशाही के खिलाफ बेखौफ होकर लड़ेंगे।”

सुनील यादव
सुनील यादवफोटो- विवेक मिश्रा/ द मूकनायक

जेएनयूएसयू के महासचिव सुनील यादव, जिन्हें 2 सेमेस्टर के लिए निष्कासित किया गया है और उन पर 21,000 रुपये का आर्थिक दंड लगाया गया है, कहते हैं, “फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का विरोध कोई नई बात नहीं थी, पूर्व छात्रसंघ ने भी इसका पुरजोर विरोध किया था। हाल के चुनाव के बीच में इसे स्थापित किया गया जबकि उस समय परिसर में आचार संहिता लगी हुई थी। यह जेएनयू के छात्रों पर थोपा गया था ताकि वे निगरानी के डर के साये में जिएं।”

वे आगे कहते हैं, "पुस्तकालय में कांच टूटे हुए हैं, उसमें गत्ते लगाकर प्रशासन ढक कर काम चला रहा है। वाटर कूलर खराब है। मूलभूत सुविधाओं पर काम करने के बजाए प्रशासन एक्टिविज्म करने वाले छात्रों को टारगेट करने के लिए फेशियल रिकग्निशन जैसी तकनीक ला रहा है जिससे लोगों को हमेशा निगरानी में रख कर निशाना बनाना प्रशासन के लिए आसान हो सके और विश्वविद्यालय के फंड का दुरुपयोग किया जा सके।” उन्होंने आगे प्रशासन पर आरोप लगाया कि प्रशासन पिछले कुछ सालों से UR श्रेणी में दाखिला लेने वाले OBC, SC और ST समुदाय के छात्रों को छात्रावास के आवंटन में आरक्षण में फेरफार करता है, जिसके खिलाफ बोलने के लिए उन पर यह प्रशासनिक कार्यवाही हुई है।

दानिश अली
दानिश अली फोटो- विवेक मिश्रा/ द मूकनायक

जेएनयूएसयू की संयुक्त सचिव दानिश अली कहती हैं, "यह पूरे यूनियन को डिस्मेंटल करने की कोशिश है। जेएनयू को लेकर पूरे देश में यह धारणा बनाई जाती है कि यहां के छात्र मुफ्तखोर हैं क्योंकि हम यहां पर अच्छी और सस्ती शिक्षा ले पा रहे हैं।” वे जोड़ती हैं, “हमारा निष्कासन इंक्वायरी खत्म होने के इतने दिनों बाद इसलिए आ रहा है क्योंकि हमने यूजीसी इक्विटी गाइडलाइन को लागू करने के लिए 3 फरवरी को एक बड़े मशाल जुलूस का आव्हान किया था। इसके बाद VBSA विधेयक के खिलाफ दिनांक 7 फरवरी को एक स्टूडेंट पार्लियामेंट का सफल आयोजन किया जाना था।” दानिश इस निष्कासन को यूनियन पर हमला मानते हैं और कहते हैं, “जैसे पूरे देश में किसान यूनियन, मजदूर यूनियन और छात्र यूनियन खत्म की जा रही हैं वैसे ही यहां पर भी हो रहा है।” वे कहती हैं, “हम इस फरमान को नहीं मानते। हम छात्रों के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। हम उनके मुद्दों के लिए हमेशा लड़ेंगे; हम डरने वाले नहीं हैं।”

फोटो- विवेक मिश्रा/ द मूकनायक

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार भी सीपीओ मैन्युअल को हर कार्यवाही की जड़ मानते हैं और कहते हैं, “इस मैन्युअल के अनुसार हम पूरे परिसर में कहीं भी किसी चीज के लिए अपना विरोध दर्ज नहीं कर सकते। यह सरासर असहमति को अपराध बनाने के लिए मैन्युअल बनाया गया है।” वे भी प्रशासनिक कार्यवाही को रोहित एक्ट की मांग के आंदोलन को रोकने की कोशिश मानते हैं। वे कहते हैं, “जेएनयू प्रशासन तमाम कोशिश कर ले लेकिन यूनियन जेएनयू के छात्रों की वकालत करने के लिए, उनके समर्थन में और अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए पीछे नहीं हटने वाला है।”

जेएनयू शिक्षक संघ ने विश्वविद्यालय द्वारा छात्रों पर हुई इस कार्यवाही को छात्र समुदाय के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया है। शिक्षक संघ ने कहा है कि, “यह निर्णय शांतिश्री धूलपुड़ी पंडित के नेतृत्व में तानाशाही और कानूनविहीन प्रणाली को दर्शाता है।” इतना ही नहीं, शिक्षक संघ ने कहा कि छात्रों का अपराधीकरण जेएनयू में अब नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बनता जा रहा है ताकि कोई असहमति की आवाज न उठे। आगे जोड़ते हैं कि, “प्रशासन जूरी, न्यायाधीश और जल्लाद की भूमिका अपना ली है।” साथ ही शिक्षक संघ ने संस्था को अंदर ही नष्ट करने और जेएनयू के व्यवस्थित और वैध मानदंडों को कमजोर करने का आरोप कुलपति पर लगाया है।

सीपीओ मैन्युअल को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों में भी रोष है। जेएनयू की एबीवीपी यूनिट ने बीते शुक्रवार को सीपीओ मैन्युअल को परिसर में जला कर विरोध जाहिर किया और उसे छात्र-विरोधी बताया। एबीवीपी द्वारा जारी किए गए एक पर्चे में बताया गया है कि जेएनयू प्रशासन अब तक सीपीओ मैन्युअल से कुल 4,83,000 रुपये की धन उगाही कर चुका है। (हालांकि हम इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं करते।) इसी पर्चे में कुलपति के बारे में कहा गया है कि, “कुलपति छात्रों पर भरोसा करने के बजाय जुर्माने का डर दिखा कर काम कर रही हैं।”

स्टूडेंट्स कहते हैं कॉन्वेंशन सेंटर को इस्कॉन जैसे धार्मिक संस्था को दिया जाता है जबकि इसके लिए रूल बुक में भी मनाही है।
स्टूडेंट्स कहते हैं कॉन्वेंशन सेंटर को इस्कॉन जैसे धार्मिक संस्था को दिया जाता है जबकि इसके लिए रूल बुक में भी मनाही है।विवेक मिश्रा/ द मूकनायक

हाल में जेएनयू में हुए छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए NSUI से उम्मीदवार रहे विकास बिश्नोई ने जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों पर हुई कार्यवाही को प्रशासन का वीभत्स कदम बताया और इसे यूनियन कल्चर पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि, “यूजीसी इक्विटी गाइडलाइन के समर्थन के कारण ही सबका निष्कासन किया गया है ताकि जेएनयू से यूजीसी इक्विटी गाइडलाइन के समर्थन में कोई बड़ा आंदोलन न खड़ा हो पाए।”

उन्होंने आगे कहा कि, “कुलपति यूनिवर्सिटी के फंड का अनावश्यक चीजों पर फिजूलखर्ची कर रही हैं। लगभग 9000 छात्रों की क्षमता वाले विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में 900 से भी कम कुर्सियां हैं। पुस्तकालय में जर्नल्स नहीं हैं। लाइट, पंखे और किताबें नहीं हैं। छात्रावास की छतें टूट कर गिर रही हैं। लेकिन इन मूलभूत सुविधाओं पर फंड का उपयोग करने के बजाए 20 लाख से अधिक रुपये का फंड फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी जैसे अनावश्यक जगहों पर खर्च किया जा रहा है जिसका छात्रों व एक विश्वविद्यालय की अकादमिक स्थिति की बेहतरी में कोई योगदान नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि वे यूनियन की लड़ाई में यूनियन के साथ हैं।

फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी पर प्रशासन के हवाले से दिए जाने वाले तर्क कि बाहरी लोग पुस्तकालय में आते हैं, इस पर विकास कहते हैं, “जब पुस्तकालय में विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए बैठने की जगह प्रशासन मुहैया नहीं करवा पा रहा है तब बाहर के लोगों की एंट्री का सवाल ही नहीं उठता।”

5 फरवरी 2026 को जेएनयूएसयू की तरफ से यूनिवर्सिटी स्ट्राइक के लिए कॉल दिया गया था। इसमें विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. शांतिश्री धूलिपुडी पंडित के इस्तीफे, सभी छात्रों के निष्कासन की वापसी समेत यूजीसी गाइडलाइन को लागू करने की मांग के साथ-साथ अन्य मांगें भी थीं।

जेएनयू के छात्रों पर हुई इस कार्यवाही की राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा उठने लगी है। लोकसभा सांसद राजा राम सिंह ने कहा कि, “जेएनयूएसयू के पदाधिकारी भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के लिए लड़ रहे हैं जो भारत की आत्मा है। यह गरीब और हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज उठाने वालों के जवाब में उठाया गया कदम है।”

स्टूडेंट्स कहते हैं विवि पुस्तकालय में जर्नल्स नहीं हैं। लाइट, पंखे और किताबें नहीं हैं। छात्रावास की छतें टूट कर गिर रही हैं। लेकिन इन मूलभूत सुविधाओं पर फंड का उपयोग करने के बजाए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी जैसे अनावश्यक जगहों पर खर्च किया जा रहा है

राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा है कि, “विश्वविद्यालय बातचीत की जगह होनी चाहिए न कि निगरानी का गढ़।” उन्होंने कहा कि इसे संसद में उठाया जाएगा।

आपको बता दें कि इसी साल के शुरुआत में संस्थानों में बढ़ते जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यूजीसी ने एक इक्विटी गाइडलाइन जारी किया था जिसको लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में जनरल केटेगरी के लोगों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस गाइडलाइन पर स्टे लगा दिया था। यूजीसी द्वारा ही जारी किए गए एक आंकड़े में कहा गया है कि साल 2020-24 तक संस्थानों में जातीय भेदभाव 118 प्रतिशत तक बढ़ा है। इस रेगुलेशन पर स्टे लगते ही देश के विभिन्न हिस्सों में इसे लागू करने के लिए कई सारे आंदोलन हो रहे हैं। लोगों ने ऐसा भी आरोप लगाया है कि सारा सिस्टम कथित ऊंची जाति के दबाव में आकर इस कानून पर स्टे लगा दिया।

रोजगार अधिकार अभियान के नेशनल को-ऑर्डिनेटर राजेश सचान ने इस निष्कासन के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए राष्ट्रपति से तत्काल सभी शोधार्थियों के निष्कासन को रद्द करने की अपील की है। उन्होंने जेएनयू प्रशासन की इस कार्यवाही को अलोकतांत्रिक और शोधार्थियों का उत्पीड़न बताया है। राजेश सचान आगे कहते हैं कि इस तरह की चीजें अलग-अलग रूपों में हर संस्थान में घटित हो रही हैं या करवाई जा रही हैं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय व बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में यूजीसी एक्ट के समर्थन करने पर छात्रों पर हुए हमलों की भी बात कही है।

हमने विश्वविद्यालय प्रशासन का भी पक्ष जानने का प्रयास किया लेकिन खबर लिखे जाने तक हमें विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला है।

विचारधाराओं का गढ़ कहा जाने वाला यह विवि इस बार जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों के निष्कासन को लेकर चर्चा में है।
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