"पहले भी हुआ है ऐसा": IIT Bombay प्रशासन पर छात्र आवाज़ दबाने का आरोप, APPSC ने गिनाई पुराने मामलों की फ़ेहरिस्त

APPSC का आरोप है कि प्रो. सूर्यनारायण डूल्ला के डीन (छात्र मामले) रहने के दौरान अनुशासन समिति (DAC) ने कई मामलों में बेहद कड़ी सज़ाएँ दीं। संगठन के मुताबिक़ कई छात्रों ने प्रो. डूल्ला पर उत्पीड़न की शिकायतें भी की हैं।
APPSC के मुताबिक़ कैंपस जीवन के फ़ैसलों में छात्रों की कोई भागीदारी न होना हालिया आंदोलन का मुख्य मुद्दा था।
APPSC के मुताबिक़ कैंपस जीवन के फ़ैसलों में छात्रों की कोई भागीदारी न होना हालिया आंदोलन का मुख्य मुद्दा था।
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मुंबई- आईआईटी बॉम्बे में 18 अक्टूबर को प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ हुई हिंसा और 11 दिन तक उनका सामान न लौटाए जाने के बाद अब छात्र संगठन अंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल (APPSC) ने प्रशासन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। संगठन का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। उसके मुताबिक़ बीते कुछ सालों में छात्रों की आवाज़ बार-बार दबाई गई है और कैंपस में उनके लिए जगह लगातार सिमटती गई है। संगठन ने इसी सिलसिले में पुराने मामलों की सूची जारी की है।

APPSC का आरोप है कि प्रो. सूर्यनारायण डूल्ला के डीन (छात्र मामले) रहने के दौरान अनुशासन समिति (DAC) ने कई मामलों में बेहद कड़ी सज़ाएँ दीं। संगठन के मुताबिक़ कई छात्रों ने प्रो. डूल्ला पर उत्पीड़न की शिकायतें भी की हैं और अपने विभाग में वे "तानाशाह" के रूप में जाने जाते हैं।

1. शिकायत करने गए छात्र ने आत्महत्या जैसे विचार की बात कही

APPSC द्वारा जारी एक बयान में बताया गया कि एक बार एक छात्र किसी दूसरे छात्र के ख़िलाफ़ उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने गया था। प्रो. डूल्ला से बातचीत के बाद उसने आत्महत्या जैसे विचार आने की बात कही। एक अन्य छात्र ने आरोप लगाया कि अस्पताल में उस पर मनोचिकित्सा केंद्र में "स्वैच्छिक" भर्ती के लिए सहमति देने का दबाव बनाया गया।

2. मीडिया से बात करने पर निलंबन (2024)

APPSC के मुताबिक़ संगठन के दो पदाधिकारी छात्रों को सिर्फ़ मीडिया से बात करने पर निलंबित कर दिया गया, जबकि तब ऐसा कोई नियम मौजूद नहीं था। एक को 8 महीने का निलंबन मिला। दलित पृष्ठभूमि के दूसरे छात्र को 13 महीने का निलंबन, हॉस्टल से स्थायी निष्कासन और 13 महीने तक कैंपस में प्रवेश पर रोक झेलनी पड़ी। संगठन का कहना है कि इससे वह लाइब्रेरी, अस्पताल, रीडिंग रूम और साथी छात्रों के सहारे से कट गए।

3. अपील के सारे रास्ते बंद

APPSC का दावा है कि DAC के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील के सभी आंतरिक रास्ते बंद कर दिए गए, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है। छात्र और उनके माता-पिता ने कई पत्र लिखे, पर सात महीने तक कोई जवाब नहीं मिला। मजबूर होकर उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट जाना पड़ा। APPSC का कहना है कि मुंबई जैसे महँगे शहर में हॉस्टल से स्थायी निष्कासन का मतलब छात्र की पढ़ाई और शोध को ही मुश्किल बना देना है। पढ़ाई दोबारा शुरू होने के बाद भी उसे बाहर रहने का ख़र्च और शोध जारी रखने की दिक़्क़त झेलनी पड़ रही है।

4. मेस में आपत्ति जताई तो भारी जुर्माना

संगठन के अनुसार, एक हॉस्टल मेस में केवल शाकाहारी हिस्से के प्रावधान पर आपत्ति जताने वाले हाशिये के समुदाय के एक छात्र पर डीन SA के तौर पर प्रो. डूल्ला ने भारी जुर्माना लगाया। APPSC इसे भेदभावपूर्ण और जातिगत पूर्वाग्रह का उदाहरण बताता है, जिसका मक़सद वंचित छात्रों को प्रशासन की आलोचना से रोकना है।

5. हर विरोध के बाद नई पाबंदी

बयान में मुख्य सुरक्षा अधिकारी अंबुज खरे के समय लागू सख़्त नियमों का ज़िक्र है। इनमें कैंपस प्रवेश पर कड़ाई, पुलिस की बढ़ी मौजूदगी और ऑटो पर रोक शामिल हैं। संगठन का आरोप है कि जब-जब छात्रों ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल किया, कार्रवाई हुई और फिर "सुरक्षा" के नाम पर और पाबंदियाँ जोड़ दी गईं।

6. हॉस्टल 14 का मामला (2025)

APPSC के अनुसार, एक पूर्व छात्र हॉस्टल के कमरों और बाथरूम जैसी निजी जगहों में छात्रों की रिकॉर्डिंग करता पाया गया। सुरक्षा विभाग को क़रीब 30 GB तस्वीरें और वीडियो मिले, फिर भी संस्थान कार्रवाई से हिचकता रहा। संगठन का दावा है कि मामला छात्रों के भारी दबाव के बाद ही पुलिस तक पहुँचा। उसका आरोप है कि संस्थान ने "पूर्व छात्र" होने का हवाला देकर आरोपी को कैंपस आने से रोकने से इनकार कर दिया, जबकि एक दलित छात्र के प्रवेश पर रोक लगाने में उसे कोई दिक़्क़त नहीं हुई। बयान में आरोपी को ब्राह्मण पूर्व छात्र बताया गया है और मामले को सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामी का सबूत कहा गया है।

APPSC का आरोप है कि कैंपस को छात्र गतिविधियों के लिए जानबूझकर प्रतिकूल बनाया गया है। सस्ती कैंटीनें और पुराने SAC इलाक़े जैसी जगहें, जहाँ छात्र जुटते थे, बंद कर दी गईं। व्याख्यान और कार्यशालाएँ रद्द हुईं, और विभागीय स्थानों में चर्चा व रीडिंग सर्कल पर पाबंदी लगी। रात 11 बजे के बाद खाने और अन्य सामान की डिलीवरी रोकने का नियम भी छात्रों के भारी विरोध के बावजूद लागू किया गया। संगठन के मुताबिक़ कैंपस जीवन के फ़ैसलों में छात्रों की कोई भागीदारी न होना हालिया आंदोलन के मुख्य मुद्दों में से एक था।

छात्र समूह का कहना है कि निदेशक शिरीष केदारे ने सभी निर्णय-निर्माता निकायों में छात्रों को बराबर प्रतिनिधित्व देने की माँग मान ली थी। लेकिन एक महीना बीत चुका है और ठोस बदलाव दिखाने की तय समय-सीमा निकल गई है। संगठन का कहना है कि पूरे छात्र समुदाय के सामने किए गए और लिखित रूप में दिए गए वादे तोड़ दिए गए हैं।

APPSC का आरोप है कि वादे निभाने या पद छोड़ने के बजाय निदेशक ने छात्र आवाज़ों पर दमन और तेज़ कर दिया है। संगठन का दावा है कि पुलिस के साथ मिलकर छात्रों की हिरासत, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न को बढ़ावा दिया जा रहा है।

APPSC ने कहा कि वह ऐसी व्यवस्था को नकारता है जिसमें शिक्षा से ऊपर सज़ा, संवाद से ऊपर डर और अभिव्यक्ति से ऊपर आज्ञापालन रखा जाए। संगठन ने मौजूदा हालात की तुलना मनु की "दंडनीति" से की और आरोप लगाया कि हाशिये के छात्रों को सवाल उठाने पर चुप कराया जा रहा है।

संगठन ने छात्रों से एकजुट होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार वापस पाने, छात्र स्थानों को बहाल करने और "सहानुभूति व समानता पर टिके संस्थान" के निर्माण के लिए संघर्ष करने की अपील की है। बयान का अंत उस "विशिष्ट उत्कृष्टता" को ठुकराने के साथ होता है जो, संगठन के शब्दों में, असहमति को चुप कराने और छात्रों के अधिकार कुचलने पर टिकी है।

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