
उत्तर प्रदेश: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के इतिहास विभाग द्वारा 16 मई को आयोजित एमए चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा में पूछे गए एक सवाल ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। 'विमेन इन मॉडर्न इंडियन सोसाइटी (1950)' विषय के इस प्रश्नपत्र में छात्रों से पूछा गया था कि वे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता (Brahmanical Patriarchy) शब्द से क्या समझते हैं और इसने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति को कैसे बाधित किया।
परीक्षक भले ही छात्रों के उत्तरों का अपने स्तर पर मूल्यांकन करेंगे, लेकिन इस सवाल ने एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। कई लोगों का मानना है कि प्राचीन भारतीय इतिहास और सामाजिक संरचनाओं से जुड़े प्रश्नपत्र तैयार करते समय अधिक संवेदनशीलता और निष्पक्षता बरती जानी चाहिए।
16 मई को हुई परीक्षा का यह पेपर जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, बीएचयू परिसर के अंदर और बाहर दोनों जगह लोगों ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। यह पेपर कुल 70 अंकों का था और इसे हल करने के लिए तीन घंटे का समय दिया गया था। पूरा पेपर तीन अलग-अलग खंडों में बंटा था, जिसमें वैकल्पिक, लघु उत्तरीय और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न शामिल थे।
इस विवाद पर अखिल भारतीय मनीषी परिषद के महासचिव दिवाकर द्विवेदी ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे सनातन परंपराओं के ध्वजवाहक ब्राह्मणों पर जानबूझकर किया गया हमला बताया। उनके अनुसार, सत्ता से बाहर हो चुके वामपंथी विचारकों के समर्थक आज भी शैक्षणिक संस्थानों में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग ही सामाजिक समानता को बिगाड़ने और जाति के आधार पर बंटवारा करने वाले सवाल पूछ रहे हैं।
श्री काशी विद्वत परिषद (एसकेवीपी) के अध्यक्ष और पद्म भूषण से सम्मानित आचार्य वशिष्ठ त्रिपाठी ने भी इस पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे धर्म शास्त्रों में पितृसत्तात्मक या ब्राह्मणवादी विवादों का कोई उल्लेख नहीं है। शास्त्रों और पुराणों के साथ-साथ वैदिक साहित्य में भी मातृ शक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
आचार्य वशिष्ठ त्रिपाठी ने आगे कहा कि जब प्रमुख शिक्षण संस्थानों से ऐसे सवाल उठते हैं तो समाज में विभाजनकारी स्थितियां पैदा होती हैं। उन्होंने इसे एक विशेष वर्ग को निशाना बनाने का अन्यायपूर्ण प्रयास करार दिया।
ब्राह्मणवादी पितृसत्ता वाले सवाल के अलावा, विद्वानों ने पेपर में पूछे गए एक अन्य प्रश्न की भाषा पर भी चिंता जताई है। यह प्रश्न औपनिवेशिक भारत में महिला संगठनों के विकास और उनके लिए खोले गए शैक्षिक अवसरों से जुड़ा था। इसमें पूछा गया था कि इन बदलावों ने महिलाओं के लिए निजी और सार्वजनिक जीवन के अंतर को पाटने में कितनी प्रभावशीलता दिखाई।
एसकेवीपी के वरिष्ठ सदस्य ने ऐसे सवालों को आधारहीन और अनैतिक बताते हुए इसे शिक्षा प्रणाली की कमजोरी करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि गार्गी, कात्यायनी और मैत्रेयी जैसी ऋषि पुत्रियों और माताओं ने भारतीय समाज में महिलाओं के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया है। मातृ शक्ति हमेशा भारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए आगे रही है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को न केवल ज्ञान और समाज की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा गया है, बल्कि राष्ट्र की रक्षा के लिए उन्होंने तलवार भी उठाई है। रोजगार सृजन में भी महिलाओं की भूमिका हमेशा से काफी अहम रही है।
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के नगर अध्यक्ष राजेश मिश्रा ने भी प्रश्नपत्र सेट करने वाले पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने सवाल किया कि पेपर बनाने वाले ने आखिर यह कहां से पढ़ लिया कि पितृसत्ता की स्थापना ब्राह्मणों ने की थी।
मौजूदा राजनीतिक माहौल में "ब्राह्मण" और "ब्राह्मणवादी" जैसे शब्दों पर पहले से ही काफी तनातनी है। ऐसे में इतिहास के इस प्रश्नपत्र से उपजे विवाद ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन को पूरी तरह से बचाव की मुद्रा में ला दिया है।
विवाद को बढ़ता देख विश्वविद्यालय ने अपना स्पष्टीकरण जारी किया है। प्रशासन ने कहा है कि एमए (इतिहास) के चौथे सेमेस्टर में महिलाओं के इतिहास के संदर्भ में पूछे गए सवाल का संज्ञान लिया गया है। विश्वविद्यालय के मुताबिक, यह प्रश्न 'विमेन इन मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री' पेपर के निर्धारित पाठ्यक्रम के दायरे में ही पूछा गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने आगे कहा कि किसी भी विषय में ज्ञान और विश्लेषणात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए छात्रों से पाठ्यक्रम के हर पहलू से अवगत होने की उम्मीद की जाती है। पाठ्यक्रम में शामिल किसी भी अवधारणा पर अकादमिक बहस और विविध दृष्टिकोण संभव हैं।
इसी प्रक्रिया के तहत छात्रों को पठन सामग्री के सुझाव भी दिए जाते हैं, ताकि वे विषय पर अपनी व्यापक समझ विकसित कर सकें। विश्वविद्यालय का कहना है कि प्रश्नपत्रों में भी यही विचार निहित होता है, इसलिए सेमेस्टर परीक्षाओं के सवालों को सिर्फ अकादमिक संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
जब अधिकारियों से यह पूछा गया कि क्या छपने से पहले प्रश्नपत्रों की जांच (स्क्रीनिंग) की कोई प्रक्रिया होती है, तो उन्होंने बताया कि कुछ क्रॉस-चेक जरूर किए जाते हैं। हालांकि, परीक्षा की गोपनीयता बनाए रखने के कारण इस प्रक्रिया में बहुत अधिक लोगों को शामिल नहीं किया जा सकता है।
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