
चंपावत: उत्तराखंड के चंपावत जिले के एक स्कूल में भोजनमाता पर जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। स्कूल में जातिवाद का ये खेल अब लम्बा खींचता ही जा रहा है। पहले स्कूल के सवर्ण बच्चों ने दलित वर्ग की भोजन माता के हाथ का खाना खाने से मना कर दिया था। जिसके बाद दलित भोजन माता को हटाकर सवर्ण भोजनमाता की नियुक्ति की गई। अब जब लग रहा था कि मामला शांत हो गया है तभी स्कूल के दलित छात्रों ने सवर्ण भोजनमाता के हाथ से बना खाने से मना कर दिया है। जिसके बाद से ही अब इस विवाद में एक नया मोड़ आ गया है।
क्या है पूरा मामला
कुछ दिन पहले उत्तराखंड का चंपावत सुर्खियों में आया। दरअसल उत्तराखंड के चंपावत जिले के राजकीय इंटर कॉलेज सूखीढांग में मिड-डे मील को लेकर विवाद शुरु हुआ। अब इस विवाद में नया मोड़ आ गया है और अब स्कूल के दलित छात्रों ने सवर्ण भोजनमाता के हाथ से बना खाने से मना कर दिया है।
जी हां! अब अनुसूचित जाति के छात्र सवर्ण जाति की भोजनमाता माता द्वारा तैयार किए गए भोजन को नहीं खा रहे हैं। ये एक तरीके से छात्रों का बहिष्कार है जो कि स्कूल प्रशासन के खिलाफ है।
टीवी9 के अनुसार, अनुसूचित जाति के छात्रों ने सवर्ण जाति की भोजनमाता माता द्वारा तैयार भोजन का बहिष्कार कर दिया है। छात्रों का कहना है कि जब सामान्य वर्ग के छात्र दलित वर्ग की भोजनमाता के द्वारा तैयार भोजन को नहीं खा रहे हैं तो फिर हम भी उच्च जाति के भोजनमाता द्वारा तैयार भोजन नहीं खाएंगे।
रिपोर्ट्स की माने तो, शुक्रवार को स्कूल के दलित बच्चों ने भी सवर्ण बच्चों की तरह सवर्ण महिला के हाथ का बना भोजन करने से मना कर दिया। शुक्रवार को सवर्ण भोजन माता द्वारा बनाए जा रहे भोजन को अनूसूचित जाति के बच्चों ने खाना खाने से मना कर दिया है। घर से लाए टिफिन के खाने को ही दलित बच्चों ने खाया। बच्चों के इस बर्ताव के बाद स्कूल में हड़कंप मच गया है।
क्या बोले प्रधानाचार्य
जनज्वार वेबसाइट के अनुसार, दलित बच्चों के इस कदम के बाद स्कूल प्रशासन सक्ते में आ गया है। स्कूल का शिक्षा विभाग इस मामले को जल्द से जल्द खत्म करने की कोशिश कर रहा है। स्कूल के प्रधानाचार्य प्रेम सिंह ने इस पूरी घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को दी है।
प्रधानाचार्य प्रेम सिंह ने उच्चाधिकारियों को बताया कि, शुक्रवार 24 दिसम्बर को राजकीय इंटर कॉलेज की कक्षा 6 से लेकर 8 तक के कुल 58 बच्चे स्कूल में उपस्थित थे। जिसमें से अनुसूचित जाति के 23 बच्चों ने सवर्ण भोजनमाता के द्वारा बनाया गया मिड-डे-मील का भोजन नहीं किया। प्रधानाचार्य ने बताया कि बच्चों का ये कदम सवर्ण बच्चों के विवाद के बाद उठाया गया है। दलित वर्ग के बच्चों का कहना है कि यदि अनुसूचित जाति की महिला के हाथों बने भोजन से सवर्णों को नफरत है तो हम भी सवर्ण महिला के हाथ का खाना नहीं खाएंगे। हम अपना लंच बॉक्स घर से ही लाएंगे।
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने दिए आदेश
पिछले एक हफ्ते से जारी इस विवाद पर अब खुद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संज्ञान लिया है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि उत्तराखंड समेत देश के पांच राज्यों में चुनाव साल 2022 में होने हैं। चुनाव की इस घड़ी में इस मामले ने चुनावी सरगर्मियां भी बढ़ा दी है। इस संवेदनशीलता को देखते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने प्रकरण की जांच पुलिस उपमहानिरीक्षक कुमाउं (डीआईजी) नीलेश आनंद भरणे को सौंप दी है।
सीईओ ने कहा, की जाएगी जांच
जहां एक ओर सूबे के मुख्यमंत्री ने इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं तो वहीं चंपावत के सीईओ आरसी पुरोहित ने भी इस मामले को लेकर जांच की बात कही है। टीवी 9 के अनुसार आरसी पुरोहित ने कहा कि पिछले दिनों ये मामला सामने आने के बाद मामले की गंभारती को समझा जा रहा है। स्कूली स्तर पर स्कूल प्रशासन ने इस मामले को शांत करा दिया गया था। वहीं प्रधानाचार्य प्रेम सिंह की ओर से शिक्षा विभाग को इसको लेकर पत्र भेजा गया था। लेकिन अब इस मामले में नया मोड़ आ गया है और अब ये मामला और गंभीर हो गया है।
जानिए क्या है ये विवाद
दरअसल चम्पावत जिले के सूखीढांग इंटर कॉलेज में सवर्णों के बच्चों ने भोजन खाने से इंकार कर दिया था। इसका कारण ये था कि भोजन बनाने का काम जिन भोजनमाता को सौंपा गया, वह दलित वर्ग की थीं। चंपावत के सूखीढांग इंटर कॉलेज के कुल 230 छात्र-छात्राओं में से छठी से आठवीं तक के 66 छात्र-छात्राओं के लिए मिड-डे-मील बनता है। 66 छात्रों के लिए खाना बनाने के लिए इसके लिए यहां दो भोजन माता रखी जाती हैं। 11 अक्टूबर तक यहां भोजन माता के रूप में शकुंतला देवी और विमलेश उप्रेती काम कर रही थीं। शकुंतला देवी 60 साल की हो गई ती इसलिए उन्हें रिटायर कर दिया गया। उनकी जगह दलित वर्ग की सुनीता देवी को इस पद पर नियुक्त किया गया। दलित महिला के भोजन बनाने पर सवर्ण छात्रों ने आपत्ति जताई और खाना ही नहीं खाया। न सिर्फ बच्चे बल्कि इन बच्चों के परिवार वालों ने भी इसको लेकर हंगामा कर दिया। अंत में इस विवाद में भोजनमाता सुनीता देवी पर ही गाज गिरी और उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई थी। इसके बाद इस पद पर एक सवर्ण वर्ग की भोजन माता को रखा गया था। लोगों को लगा था कि अब ये मामला शांत हो जाएगा लेकिन अनूसूचित जाति के बच्चों ने अब मोर्चा खोल दिया है और सवर्ण भोजनमाता के हाथों से बने भोजन को खाने से इंकार कर दिया है।
भोजन माता की नियुक्ति पर भी सवाल
बीबीसी के अनुसार, शकुंतला देवी की रिटायरमेंट के बाद 28 अक्टूबर को इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने नई भोजन माता की नियुक्ति के लिए एक विज्ञप्ति जारी की। ये विज्ञप्ति छात्रों के माता पिता को भी भेजी गई थी। विज्ञप्ति पर जो आवेदन आए वे 6 थे। इसमें से एक अनुसूचित जाति और 5 सामान्य वर्ग के थे। कुछ एसएमसी (विद्यालय प्रबंधन कमेटी) और कुछ पीटीए (शिक्षक-अभिभावक संघ) सदस्यों ने इनमें से पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव किया। सभी आवेदक एपीएल श्रेणी की थीं, इसलिए एसएमसी के सचिव, स्कूल के प्रिसिंपल ने इसे मानकों के अनुसार न मानकर प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए। स्कूल का मानना था कि इस पद पर गरीब और पिछड़े वर्ग को पहले मौका मिलना चाहिए था। इसके बाद एक बार फिर से विज्ञप्ति निकाली गई और इसमें लिखा गया कि नियुक्ति में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति की महिला को प्राथमिकता दी जाएगी।
इस बार 11 आवेदन आए जिनमें से एक को निरस्त कर दिया गया था। बाकी बची 10 महिलाओं में से 5 सवर्ण और 5 अनुसूचित जाति की थीं। इसके बाद 4 शिक्षकों की एक समिति बनाई गई जिसमें सुनीता देवी के नाम पर मुहर लगाई गई। प्रक्रिया यहीं नहीं रुकी, 25 नवंबर को इन आवेदनों पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई गई। इस बैठक में पुष्पा भट्ट के नाम को लोगों ने आगे रखा। इस बैठक में सवर्ण प्रतिनिधियों ने पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव दिया और दलित समुदाय के लोग सुनीता देवी के पक्ष में खड़े हो गए। बैठक में ही वाद-विवाद और तू-तू मैं-मैं हो गई जिसके बाद दलित समुदाय के लोग बैठक छोड़कर चले गए।
दलित वर्ग की गैरमौजूदगी में ही सवर्ण वर्ग ने पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव बनाकर उसे बहुमत से पास कर दिया। लेकिन प्रभारी प्रधानाचार्य चंद्रमोहन मिश्रा ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। एक और बैठक 4 दिसंबर को की गई। इस बैठक में सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए और सुनीता देवी के नाम के प्रस्ताव पर मुहर लग गई।
प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने सुनीता देवी को 13 दिसंबर से कार्यभार संभालने के लिए कहा लेकिन ये भी कहा कि जब तक नियमानुसार खंड शिक्षा अधिकारी की ओर से अनुमति न मिल जाए, वह इसे नौकरी न मानें। वैसा ही हुआ और सुनीता देवी की यह अनाधिकारिक सरकारी नौकरी 20 तारीख तक ही चली।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सूखीढांग इंटर कॉलेज के ठीक सामने कांडा का सरकारी प्राइमरी स्कूल है। सियाला के प्रधान जगदीश प्रसाद कहते हैं कि 4-5 साल पहले वहां भी भोजनमाता एक दलित समुदाय की महिला को बनाया गया था. उसके बाद वहां से सवर्णों ने अपने बच्चों को निकाल लिया. अब उस स्कूल को दलितों का स्कूल कहा जाता है. अब उस स्कूल में सिर्फ दलितों के बच्चे ही पढ़ते हैं।
आपको बता दें कि, उत्तराखंड समेत पूरे देश में जातिवाद की जड़े गहरी बैठ चुकी हैं. आए दिन भेदभाव की खबरें आती रहती हैं जो भारतीय समाज पर सबसे बड़ा धब्बा है. हाल ही में राजस्थान में एक दलित बच्चे की रीढ़ की हड्डी जातिवादियों ने इसलिए तोड़ दी क्योंकि मासूम ने नल से पानी पी लिया था।
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