नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रखने के खिलाफ रोटेशन की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है। अदालत ने कहा कि विधानसभा और संसद की सीटों का आरक्षण विधायिका के क्षेत्राधिकार का विषय है। याचिकाकर्ता को निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास जाने की छूट दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा सीटों के आरक्षण में रोटेशन का सिद्धांत लागू करने की मांग वाली विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। अदालत ने साफ कहा कि राज्य विधानसभाओं और संसद में सीटों का आरक्षण मूल रूप से विधायिका के क्षेत्राधिकार का विषय है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने जगदीश सिंह बनाम भारत संघ व अन्य (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 37437/2026) में यह आदेश पारित किया।
अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वे चाहें तो निर्वाचित प्रतिनिधियों से संपर्क कर उन्हें रोटेशन का सिद्धांत अपनाने पर विचार करने के लिए मनाने का प्रयास कर सकते हैं। यह सिद्धांत याचिकाकर्ता ने 2006 में परिसीमन आयोग द्वारा की गई टिप्पणियों के आधार पर उठाया था।
यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की खंडपीठ के 22 जून 2026 के फैसले (डब्ल्यूसी संख्या 6153/2011) के खिलाफ दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को दी गई चुनौती खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए राज्य विधानसभा सीटों का आरक्षण रोटेशन के सिद्धांत से तय होना चाहिए।
उनके अनुसार, 191-कादीपुर विधानसभा क्षेत्र अपने गठन के समय से ही अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रहा है और 2006 के परिसीमन के बाद भी आरक्षित बना रहा। उनका कहना था कि रोटेशन अपनाने पर इस सीट को आरक्षण से मुक्त किया जा सकता है और उसकी जगह अनुसूचित जाति की सबसे अधिक आबादी वाले किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र को आरक्षित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। उसने अन्य बातों के साथ यह टिप्पणी की कि आदर्श स्थिति में रोटेशन अपनाया जा सकता है, लेकिन ऐसी प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय विधायिका के दायरे में आता है।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गगन गुप्ता सहित अधिवक्ताओं की बड़ी टीम पेश हुई। उन्हें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से अलग राय बनाने का कोई आधार नहीं दिखता। पीठ ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वे चाहें तो निर्वाचित प्रतिनिधियों से संपर्क कर उन्हें रोटेशन का सिद्धांत अपनाने पर विचार करने के लिए मना सकते हैं। यह सिद्धांत याचिकाकर्ता ने 2006 में परिसीमन आयोग की टिप्पणियों के आधार पर उठाया था।
इसी स्वतंत्रता के साथ अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया और लंबित आवेदनों, यदि कोई हों, को भी निस्तारित माना। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता इंदिरा बखर, मुकेश कुमार सिंह (एओआर), विनीत सिंह, चिरायु शर्मा, नरेंद्र कुमार गोयल, राहुल सैनी, दिव्यांशु सारस्वत, सब्यसाची दुबे, सरोज कुमार सिन्हा, श्रीजीत पी.आर., सौरभ कुमार सिंह और ए.ए. कलेबुद्दे भी उपस्थित थे।
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