दलित महिला के यौन शोषण का मामला: केरल हाईकोर्ट से निष्कासित कांग्रेस पार्षद एम.ए. प्रसोभ की अग्रिम जमानत खारिज

नौकरी और जीवनभर साथ निभाने का झांसा देकर दलित महिला के यौन शोषण मामले में केरल हाईकोर्ट का सख्त रुख, निष्कासित कांग्रेस पार्षद एम.ए. प्रसोभ को नहीं मिली अग्रिम जमानत।
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केरल हाई कोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने मंगलवार को कांग्रेस के निष्कासित पार्षद एम.ए. प्रसोभ को एक बड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने नौकरी दिलाने और जीवनभर साथ निभाने का झांसा देकर एक दलित महिला के यौन शोषण से जुड़े मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।

जस्टिस ए. बदरुद्दीन की पीठ ने विशेष एससी/एसटी अदालत के उस पूर्व आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पूर्व पार्षद की गिरफ्तारी पूर्व जमानत अर्जी ठुकरा दी गई थी। निचली अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना था कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

यह मामला पलक्कड़ टाउन साउथ पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। इस गंभीर आरोप के सामने आने के बाद पलक्कड़ में कांग्रेस को भारी राजनीतिक असहजता का सामना करना पड़ा, जिसके बाद आरोपी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी काफी संवेदनशील रहा है। यहां तक कि विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी माकपा (CPI-M) ने इस घटना को कांग्रेस के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, एम.ए. प्रसोभ पहले से शादीशुदा होने के बावजूद शिकायतकर्ता के साथ करीब डेढ़ साल तक संपर्क में रहे। आरोप है कि उन्होंने महिला को रोजगार मुहैया कराने और पूरी जिंदगी उसका साथ देने का झूठा आश्वासन देकर लगातार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाली पीड़िता ने अपनी शिकायत में दावा किया है कि इस रिश्ते के दौरान वह गर्भवती हो गई थी। जब इस प्रेम प्रसंग की जानकारी सार्वजनिक हुई, तो उसे डराया-धमकाया गया और उसके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया।

पुलिस ने पीड़िता की शिकायत के आधार पर प्रसोभ के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया है। इनमें बलात्कार, झूठे वादे कर यौन शोषण करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोप शामिल हैं। इसके साथ ही उन पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के कड़े प्रावधान भी लगाए गए हैं।

हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की गुहार लगाते हुए बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि यदि सभी आरोपों को सच मान लिया जाए, तो भी यह पूरी तरह से दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध का मामला प्रतीत होता है।

बचाव पक्ष का यह भी तर्क था कि इस मामले में एससी/एसटी एक्ट का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया है, इसलिए अधिनियम के तहत जमानत पर लगी वैधानिक रोक यहां लागू नहीं होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि विशेष अदालत ने बलात्कार के आरोप को पुष्ट करने वाला कोई स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया और केवल एससी/एसटी एक्ट के आधार पर जमानत खारिज कर दी।

हालांकि, शिकायतकर्ता के वकील ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने एक लंबी अवधि तक महिला का भावनात्मक और यौन शोषण किया है।

पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया है कि उसकी प्रसोभ से पहली मुलाकात तब हुई थी, जब चाय की दुकान चलाने वाले प्रसोभ के पिता ने उसके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया था।

महिला का आरोप है कि उस घटना के बाद प्रसोभ ने उसे पुलिस में शिकायत दर्ज न करने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद उसने नौकरी और सुरक्षा का भरोसा दिलाकर धीरे-धीरे उसका विश्वास जीता और उसे अपने जाल में फंसा लिया।

अब केरल हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद निष्कासित पार्षद की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ ही एम.ए. प्रसोभ पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है।

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