
— ✍️डॉ. दीपक आचार्य
जैसलमेर- संत कबीरदास के श्रम, समता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता के संदेश को चरितार्थ करने वाली राजस्थान के जैसलमेर जिले की कबीर बस्ती आज अपनी ऐतिहासिक पहचान के बावजूद बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जूझ रही है। स्वतंत्रता सेनानियों और समाजसेवियों के सपनों से सजा यह गाँव, जिसे कभी 'गाँधी का थाना' कहा गया और जो राजस्थान का पहला ग्रामदानी गाँव होने का गौरव रखता है, आज पेयजल, सड़क, सिंचाई और खादी उद्योग के पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रहा है।
स्वाधीनता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा, गोकुल भाई भट्ट, सिद्धराज ढड्डा, गंगासिंह मोहता तथा स्थानीय समाजसेवियों भगवानदास माहेश्वरी, गोवर्धन कल्ला, लालचन्द जोशी, ताराचन्द जगाणी और सत्यदेव व्यास के सहयोग से दलित समाज के कार्यकर्ताओं अमोलकराम, चान्दाराम और खुशालाराम ने खादी को आधार बनाकर आत्मनिर्भर आदर्श ग्राम की परिकल्पना की। इसी उद्देश्य से पारेवर गाँव के 27 मेघवाल परिवारों को बसाकर 3 मार्च 1961 को कबीर बस्ती की नींव रखी गई। उस समय हर परिवार को आवास, पानी, खेती और रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य स्पष्ट था।
कबीर बस्ती शीघ्र ही खादी उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गई। यहाँ स्थापित कबीरबस्ती खादी उत्पादक सहकारी समिति ने 11 गाँवों के लगभग 250 बुनकरों और 5000 कतिनों को रोजगार प्रदान किया। प्रतिवर्ष लगभग 30 लाख रुपये का ऊनी खादी उत्पादन और 35 से 37 लाख रुपये का विक्रय इस गाँव की पहचान बन गया। यहाँ निर्मित पटू, हिरावल, बरड़ी, चूनरी और लेडीज़ शॉल देशभर में पहुँचते थे। लेकिन आज यह गौरवशाली परम्परा लगभग लुप्त है और खादी उद्योग पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रहा है।
कबीर बस्ती की उपलब्धियों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। 10 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस गाँव का दौरा किया और इसे "गाँधी का थाना" कहकर इसकी विशिष्ट पहचान को रेखांकित किया। इससे पूर्व अनेक सांसद एवं राष्ट्रीय स्तर के प्रतिनिधि भी यहाँ आ चुके थे। यह गाँव शत-प्रतिशत साक्षरता और महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय है। लगभग 200 परिवारों की इस बस्ती से अनेक लोग सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।
गाँव की सबसे बड़ी समस्या पानी और आधारभूत सुविधाओं की है। लिफ्ट सिंचाई तथा खड़ीन आधारित कृषि के प्रयास अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके। गर्मियों में पेयजल संकट बना रहता है। ग्रामीण यह भी बताते हैं कि क्षेत्र से होकर औद्योगिक उपयोग के लिए पाइपलाइन तो गुज़री, किन्तु गाँव को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिला। भारी वाहनों के कारण सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं और स्थानीय लोगों को पर्याप्त प्रतिपूर्ति भी नहीं मिल सकी। इन विषयों पर ग्रामीण लंबे समय से समाधान की अपेक्षा कर रहे हैं।
वर्ष 2020 में कबीर बस्ती प्रवास के दौरान ग्रामीणों ने वर्षों से लंबित अनेक मांगों की जानकारी दी। ग्रामीणों की प्रमुख अपेक्षाओं में कबीर बस्ती को ग्राम पंचायत का दर्जा, नहर वितरिका से जोड़कर कृषि को स्थायी आधार, खादी समिति को कार्यशील पूँजी, जैसलमेर शहर में खादी बिक्री केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, आधुनिक खादी एवं ग्रामोद्योग प्रशिक्षण केन्द्र, आर.ओ. प्लांट, सीवरेज, खेल मैदान, स्टेडियम और वृक्षारोपण योजनाएँ, आबादी भूमि का विस्तार, तालाब एवं नाड़ियों का निर्माण, सड़क एवं मोबाइल नेटवर्क का विस्तार शामिल हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इनमें से अधिकांश मांगें आज भी अधूरी हैं।
गाँव की सबसे बड़ी समस्या पानी और आधारभूत सुविधाओं की है। लिफ्ट सिंचाई तथा खड़ीन आधारित कृषि के प्रयास अपेक्षित सफलता नहीं पा सके और गर्मियों में पेयजल संकट बना रहता है। ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र से होकर औद्योगिक उपयोग के लिए पाइपलाइन तो गुज़री, लेकिन गाँव को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिला। भारी वाहनों के कारण सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं और स्थानीय लोगों को पर्याप्त प्रतिपूर्ति भी नहीं मिल सकी।
ग्रामीणों का कहना है कि कबीर जयंती केवल संत के दोहों का स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को धरातल पर उतारने का भी दिन है। उन्होंने सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज से मिलकर कबीर बस्ती को उसके गौरव के अनुरूप विकसित करने की अपील की है। तभी कबीर के नाम पर बसी इस बस्ती का नाम वास्तव में सार्थक सिद्ध होगा।
- लेखक राजस्थान सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं ।
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