
आंध्र प्रदेश: कुरनूल जिले से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां 40 वर्षीय दलित महिला माला गंगम्मा की मौत के बाद भारी बवाल मच गया है। मानवाधिकार संगठन 'ह्यूमन राइट्स फोरम' (HRF) और 'इंडियन फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस' (IFTU) ने आरोप लगाया है कि महिला की जान पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की बर्बरता के कारण गई है।
संगठनों ने इस पूरे प्रकरण की एक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग तेज कर दी है। आरोप है कि महिला के लापता बेटे वीरेंद्र की गुत्थी सुलझाने के नाम पर पुलिस ने उससे जबरन जुर्म कबूलवाने के लिए हिरासत में अमानवीय टॉर्चर किया।
इस घटना की सच्चाई जानने के लिए दोनों संगठनों की ओर से एक संयुक्त फैक्ट-फाइंडिंग टीम का गठन किया गया था। इस तीन सदस्यीय टीम में एचआरएफ के प्रदेश उपाध्यक्ष यूजी श्रीनिवासुलु, कुरनूल जिला अध्यक्ष के उरुकुंदप्पा और आईएफटीयू के जिला प्रतिनिधि नरसन्ना शामिल थे। इस टीम ने जमीनी हकीकत जानने के लिए बदिनेहल गांव का दौरा किया। वहां उन्होंने मृतका के परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों से लंबी बातचीत की और अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले कोवथलम पुलिस से भी पूरे घटनाक्रम को लेकर सवाल-जवाब किए।
इस पूरे विवाद की शुरुआत नवंबर 2024 से हुई, जब महिला का बेटा वीरेंद्र अचानक लापता हो गया था। अपने बेटे की तलाश के लिए गंगम्मा ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। अदालत के कड़े निर्देश के बाद मामले की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया। इस विशेष जांच दल का नेतृत्व तत्कालीन गुंटूर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) के सुप्रजा को सौंपा गया था।
मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, एसआईटी ने अपनी तहकीकात में यह निष्कर्ष निकाला कि गंगम्मा ने अपने साथी मल्ला दुर्गय्या के साथ मिलकर खुद अपने बेटे वीरेंद्र की हत्या कर दी है। पुलिस की थ्योरी थी कि वीरेंद्र उन दोनों के रिश्ते के सख्त खिलाफ था। एचआरएफ और आईएफटीयू का सीधा आरोप है कि वीरेंद्र के शव का पता लगाने के लिए एसआईटी ने गंगम्मा और दुर्गय्या दोनों को पुलिस कस्टडी में भयानक यातनाएं दीं।
इसी कथित टॉर्चर के चलते 31 मई को गंगम्मा ने दम तोड़ दिया। वहीं उनका साथी दुर्गय्या गंभीर हालत में कुरनूल के सरकारी अस्पताल में भर्ती है और वहां उसका इलाज चल रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुलिस की जांच प्रक्रिया और उनके क्रूर तौर-तरीकों पर गंभीर सवालिया निशान लगाए हैं। उन्होंने गंगम्मा की मौत की परिस्थितियों को बेहद संदिग्ध और चिंताजनक बताया है।
आनन-फानन में महिला को कुरनूल के केआईएमएस (KIMS) अस्पताल में स्थानांतरित करने से लेकर, पोस्टमार्टम की प्रक्रिया और शरीर पर मौजूद चोटों के निशानों की सही ढंग से रिपोर्टिंग न किए जाने तक, हर कदम पर पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में है। इसके अलावा जिस जल्दबाजी में गंगम्मा का अंतिम संस्कार किया गया, उसने इस मामले को और भी ज्यादा रहस्यमय बना दिया है। संगठनों के अनुसार, 1 जून को उनके पैतृक गांव बदिनेहल में महिला के शव को दफना दिया गया, और इस दौरान वहां करीब 20 से 30 पुलिसकर्मी मुस्तैद थे।
पुलिस की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि दुर्गय्या को जो गंभीर चोटें आई हैं, वे एक मोटरसाइकिल दुर्घटना का नतीजा हैं। हालांकि, फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। टीम का स्पष्ट कहना है कि अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद दुर्गय्या के परिजनों को उससे मिलने तक की इजाजत नहीं दी गई, जो पुलिस की मंशा पर संदेह पैदा करता है।
एचआरएफ और आईएफटीयू ने यह बिल्कुल स्पष्ट किया है कि यदि कानूनी प्रक्रिया के तहत कोई भी व्यक्ति वीरेंद्र की हत्या का दोषी पाया जाता है, तो उस पर मुकदमा जरूर चलना चाहिए। लेकिन किसी भी परिस्थिति में पुलिस हिरासत में यातनाएं देने और कानूनी प्रक्रियाओं के घोर उल्लंघन को कतई सही नहीं ठहराया जा सकता।
इन संगठनों ने अब सरकार से इस पूरी घटना की स्वतंत्र न्यायिक या निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। साथ ही उन्होंने गंगम्मा के शव का दोबारा पोस्टमार्टम कराने और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या के आरोपों के साथ-साथ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत सख्त आपराधिक मामले दर्ज करने की पुरजोर अपील की है।
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