
कर्नाटक के धारवाड़ में दलित समुदाय के खिलाफ हो रहे अत्याचारों और पुलिस की कथित लापरवाही ने भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। इसी कड़ी में 3 नवंबर को विभिन्न दलित संगठनों ने एकजुट होकर कलाभवन से लेकर पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्यालय तक एक विशाल मार्च निकाला।
इन संगठनों का आरोप है कि पुलिस पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाय उलटा उन्हीं के परिवारों पर मुकदमे दर्ज कर रही है। यह पूरा विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से जिले में मारपीट, धमकी और यौन शोषण के तीन अलग-अलग मामलों पर केंद्रित था।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इन सभी घटनाओं में पुलिस ने शिकायत दर्ज करने में भारी देरी की। हद तो तब हो गई जब आरोपियों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय पीड़ितों के परिजनों के खिलाफ ही क्रॉस-केस (जवाबी मामले) दर्ज कर दिए गए, जिससे उनकी मुसीबतें और बढ़ गई हैं।
पहला मामला कलघटगी तालुक के मिश्रीकोटी गांव का है। यहां अभिषेक उर्फ पिरप्पा चलवादी नामक युवक पर कुछ लोगों ने चाकू से जानलेवा हमला कर दिया। बुरी तरह घायल अभिषेक का फिलहाल हुबली के केएमसी अस्पताल में इलाज चल रहा है। संगठनों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर घायल युवक के ही परिवार वालों पर जवाबी मामला क्यों दर्ज किया गया।
दूसरी घटना अलनावर तालुक के कोगिलागेरी गांव निवासी श्रीकांत रामप्पा चलवादी से जुड़ी है। धारवाड़-अलनावर रोड पर फल बेचते समय उन पर हथियारों से बर्बर हमला किया गया। इस हमले में श्रीकांत के सिर पर गंभीर चोटें आईं। आरोप है कि पुलिस ने इस वारदात के पूरे तीन दिन बाद जाकर एफआईआर लिखी। इतना ही नहीं, पुलिस ने श्रीकांत के परिवार के तीन सदस्यों पर ही काउंटर केस थोप दिया।
तीसरा और सबसे संवेदनशील मामला अलनावर तालुक के ही होन्नापुर गांव का है। यहां एक 42 वर्षीय अधेड़ व्यक्ति ने 15 साल की एक नाबालिग बच्ची के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया। आरोप है कि इस जघन्य अपराध को रफा-दफा करने के लिए मध्यस्थता का सहारा लिया गया और पीड़ित बच्ची को लगातार धमकियां दी गईं।
इन घटनाओं से आक्रोशित संगठनों ने पीड़ितों के खिलाफ दर्ज किए गए झूठे क्रॉस-केस की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने आरोपियों पर तत्काल कार्रवाई करने, पीड़ित परिवारों को सुरक्षा मुहैया कराने और नाबालिग के रेप केस में तेज जांच सुनिश्चित करने की अपील की है।
इसके साथ ही, ड्यूटी में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग भी मजबूती से उठाई गई है।
मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने यह स्पष्ट तौर पर कहा कि उनका यह आंदोलन सिर्फ अन्याय और अत्याचार के खिलाफ है। इसका मकसद किसी विशेष जाति या धर्म का विरोध करना नहीं है, बल्कि पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित करना है।
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