
ग्वालियर- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में सोमवार 5 जनवरी को अनिल कुमार मिश्रा और उनके साथियों के खिलाफ SC/ST एक्ट मामले में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। याचिका संख्या WP-2/2026 (अनिल कुमार मिश्रा बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य) पर जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस आशीष श्रोति की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और फैसला सुरक्षित रख लिया। याचिकाकर्ता पक्ष की ओर सीनियर एडवोकेट आर.के. शर्मा ने प्रशांत शर्मा, राजीव शर्मा, समीर श्रीवास्तव और संकल्प शर्मा के साथ पेश होकर अपनी दलीलें रखीं।
राज्य सरकार की ओर एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने ब्रह्मदत्त सिंह, अतिरिक्त एडवोकेट जनरल विवेक खेडकर और दीपेंद्र सिंह कुशवाहा, साथ ही गवर्नमेंट एडवोकेट एस.एस. कुशवाहा तथा सोहित मिश्रा ने पक्ष रखा। शिकायतकर्ता (रिस्पॉन्डेंट नंबर 5) की ओर सीनियर एडवोकेट रमेश्वर ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आशोक अहीरवार और विजय सुंदरम के साथ दलीलें दीं।
कल के आदेश के अनुपालन में शिकायतकर्ता को याचिका की कॉपी सौंपी गई थी, जिसके बाद आज की सुनवाई में सभी पक्षों ने विस्तृत बहस की। कोर्ट ने SC/ST अधिनियम की धारा 15-ए(3) और सुप्रीम कोर्ट के हरिराम भांभी बनाम सत्यनारायण (AIR 2021 SC 5601) फैसले का हवाला देते हुए पीड़ित के अधिकारों पर जोर दिया था, जो आज की कार्यवाही में भी प्रमुख रहा। अनिल मिश्रा की जमानत याचिका पर कोई अंतरिम राहत नहीं मिली, और वे फिलहाल जेल में ही हैं। फैसले की तारीख का ऐलान बाद में होगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का रुख सख्त रहेगा, जो बाबा साहब के अपमान और नफरत फैलाने जैसे अपराधों पर नरमी न दिखाने का स्पष्ट संदेश देगा।
सामाजिक कार्यकर्ता और SC/ST संगठनों ने कोर्ट की इस प्रक्रिया को सराहा है, इसे संविधान की रक्षा के लिए सकारात्मक कदम बताते हुए। ग्वालियर में बढ़ते सामाजिक तनाव के बीच यह मामला पूरे देश के लिए मिसाल बन सकता है। मामले की अगली अपडेट फैसला आने पर ही मिलेगी। प्रदेश महासचिव (ASP) एड. रायसेन बौद्ध ने बताया, "दोनों पक्षों ने हर बिंदु पर बात रखी है। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं और हमें पूरा भरोसा है कि बाबासाहेब के संविधान से हमें न्याय मिलेगा"। नगीना सांसद और भीम आर्मी चीफ चन्द्रशेखर आज़ाद ने इस मामले में गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर सभी आरोपियों पर NSA लगाने की मांग की थी।
उधर, अनिल मिश्रा मामले में चल रही त्वरित सुनवाई को लेकर ओबीसी महासभा ने इसे मनुवादी मानसिकता का परिचायक बताया है. एक पोस्ट में ओबीसी महासभा ने आरोप लगाया कि " मनुवाद और कॉलेजियम सिस्टम का असली रंग आज फिर देश ने देख लिया। 2 जनवरी को निचली अदालत से जमानत ख़ारिज, और 3 जनवरी को ही हाईकोर्ट में मामला लिस्ट! इतना ही नहीं, तुरंत स्पेशल बेंच तक बना दी गई। जिस न्याय व्यवस्था में आम आदमी को सालों-साल तारीख़ पर तारीख़ मिलती है, वहीं मनुवादी सोच वाले लोगों के लिए न्याय के दरवाज़े पलक झपकते खुल जाते हैं। यह न्याय नहीं, नेटवर्क है। यह कानून नहीं, वर्ग विशेष की सुविधा है। कॉलेजियम सिस्टम आज देश को तबाही की ओर ले जा रहा है। अदालतें अब न्याय के मंदिर कम और ब्राह्मण-बनिया सेंटर ज़्यादा बनती जा रही हैं। गरीब, दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज की ना सुनवाई है, ना संवेदना। अनिल मिश्रा जैसे अराजकता फैलाने वाले लोग अगर जेल से बाहर रहेंगे तो समाज में फिर ज़हर घोला जाएगा, फिर हिंसा फैलाई जाएगी। अब बहुत हो चुका। सरकार को चाहिए कि ऐसे तत्वों पर NSA के तहत सख़्त कार्रवाई करे।"
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में अनिल कुमार मिश्रा और उनके सहयोगियों पर डॉ. भीमराव अंबेडकर (बाबा साहब) के फोटो जलाने, अभद्र और नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल करने, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने तथा दंगा भड़काने के गंभीर आरोप हैं। यह मामला SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है, जो संविधान के अपमान और सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है। अनिल मिश्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR रद्द करने या जमानत की मांग की, लेकिन कोर्ट ने इसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' बताने वाली दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। रविवार को हुई सुनवाई के बाद आदेश में शिकायतकर्ता को पक्षकार बनाया गया था, और आज सोमवार को बहस के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.