साहित्य अकादेमी पुरस्कार: ममता कालिया के 'जीते जी इलाहाबाद' को मिला सर्वोच्च सम्मान, जानें इस किताब में क्या है ख़ास?

वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को उनके बहुचर्चित संस्मरण 'जीते जी इलाहाबाद' के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार, राजकमल प्रकाशन ने जताई खुशी।
Mamta Kalia, Sahitya Akademi Award
वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को संस्मरण 'जीते जी इलाहाबाद' के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार। जानें उनके साहित्यिक सफर और इस ख़ास किताब के बारे में।
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नई दिल्ली। हिन्दी की वरिष्ठ लेखक ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा पर राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी है।

अशोक महेश्वरी ने कहा कि ममता कालिया का लेखन जीवन के साधारण दिखने वाले प्रसंगों में छिपे गहरे अर्थों को सामने लाने की क्षमता रखता है। वे ऐसी लेखक हैं जिनकी रचनाएँ कई दशकों से पाठकों और साहित्यिक जगत को लगातार समृद्ध करती रही हैं। ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया जाना उनके दीर्घ और महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान का स्वाभाविक स्वीकार है।

उन्होंने कहा कि प्रकाशक और लेखक की यात्रा हमेशा साझी होती है। ‘जीते जी इलाहाबाद’ सहित ममता कालिया की अनेक महत्वपूर्ण कृतियाँ राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुई हैं और उनके साथ यह साहित्यिक रिश्ता लंबे समय से बना हुआ है। हमें यह संतोष और खुशी है कि उनकी लेखन-यात्रा के कई महत्वपूर्ण पड़ावों में राजकमल प्रकाशन समूह भी सहभागी रहा है।

‘जीते जी इलाहाबाद’ में ममता कालिया ने अपने अनुभवों, स्मृतियों और समय को जिस आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ दर्ज किया है, वह पाठकों को एक साथ निजी और सामाजिक जीवन की कई परतों से रू-ब-रू कराता है। इस कृति के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया जाना प्रकाशक होने के नाते हमारे लिए भी अत्यन्त खुशी और गर्व का विषय है।

अशोक महेश्वरी ने कहा कि साहित्य अकादेमी द्वारा ममता कालिया को सम्मानित किया जाना हिन्दी साहित्य के लिए भी खुशी की बात है। इस निर्णय से साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित राजकमल के लेखकों की सूची में एक और महत्वपूर्ण नाम जुड़ा है और इसके लिए हम साहित्य अकादेमी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

किताब के बारे में..

‘जीते जी इलाहाबाद’ ममता कालिया का एक महत्त्वपूर्ण संस्मरण है, जिसमें इलाहाबाद के उस जीवंत साहित्यिक संसार की झलक मिलती है, जिसने आधुनिक हिन्दी साहित्य को गहराई से प्रभावित किया। यह किताब किसी शहर का साधारण वर्णन नहीं करती, बल्कि स्मृतियों, लोगों और सांस्कृतिक अनुभवों के ज़रिए एक पूरे दौर को जीवित करती है।

ममता कालिया अपने निजी अनुभवों, मुलाकातों और प्रसंगों के सहारे उस इलाहाबाद को सामने लाती हैं जहाँ विश्वविद्यालय, कॉफी-हाउस, साहित्यिक गोष्ठियाँ और लेखक-मित्रताओं का एक विशिष्ट वातावरण था। किताब में शहर के साथ-साथ उन लेखकों, बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक हलचलों के शब्दचित्र भी मिलते हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य की दिशा को आकार दिया।

अपनी सहज, आत्मीय और कभी-कभी हल्की व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गई यह किताब दरअसल एक ऐसे शहर की स्मृति-यात्रा है, जो सिर्फ़ भौगोलिक जगह नहीं बल्कि हिन्दी के बौद्धिक और साहित्यिक जीवन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

ममता कालिया का परिचय

ममता कालिया का जन्म 2 नवम्बर 1940 को वृन्दावन में हुआ। प्रारम्भिक और उच्च शिक्षा दिल्ली, मुम्बई, पुणे, नागपुर और इन्दौर जैसे विभिन्न शहरों में हुई। कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, कविता और पत्रकारिता—लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक विधाओं में उनकी सक्रिय उपस्थिति रही है। हिन्दी कथा साहित्य के परिदृश्य पर उनका हस्तक्षेप साठ के दशक के उत्तरार्ध से निरन्तर बना हुआ है।

वे महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक अंग्रेज़ी पत्रिका ‘HINDI’ की सम्पादक भी रह चुकी हैं।

संस्मरणात्मक कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित उन्हें अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिसमें व्यास सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, यशपाल स्मृति सम्मान, महादेवी स्मृति पुरस्कार, राममनोहर लोहिया सम्मान, कमलेश्वर स्मृति सम्मान, सावित्री बाई फुले स्मृति सम्मान, लमही सम्मान आदि प्रमुख हैं।

प्रकाशित कृतियाँ

उपन्यास : बेघर, नरक-दर-नरक, दौड़, दुक्खम सुक्खम, सपनों की होम डिलिवरी, कल्‍चर-वल्चर, सच्चा झूठ

कहानी-संग्रह : छुटकारा, उसका यौवन, मुखौटा, जाँच अभी जारी है, सीट नम्बर छह, निर्मोही, प्रतिदिन, थोड़ा-सा प्रगतिशील, एक अदद औरत, बोलनेवाली औरत, पच्‍चीस साल की लड़की, ख़ुशक़िस्‍मत, प्रतिनिधि कहानियाँ, सम्पूर्ण कहानियाँ (अब तक की) (दो खंडों में)

कविता-संग्रह : A Tribute to Papa and other Poems, Poems ’78’, खाँटी घरेलू औरत, कितने प्रश्न करूँ, पचास कविताएँ

एकांकी-संग्रह : आप न बदलेंगे

संस्‍मरण : जीते जी इलाहाबाद, कल परसों के बरसों, सफ़र में हमसफ़र, कितने शहरों में कितनी बार, अन्‍दाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा

स्त्री-विमर्श : भविष्‍य का स्‍त्री-विमर्श, स्‍त्री-विमर्श का यथार्थ, स्‍त्री-विमर्श के तेवर

सम्‍पादन : महिला लेखन के सौ वर्ष

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