नई दिल्ली। 18वें हैबिटैट फ़िल्म फ़ेस्टिवल 2026 के अंतर्गत इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर हॉल में मशहूर दास्तानगो और रंगकर्मी महमूद फ़ारूक़ी की किताब ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ का लोकार्पण किया गया। बुधवार, 20 मई की शाम आयोजित इस विशेष सत्र में किताब पर एक विस्तृत परिचर्चा भी हुई।
राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह किताब फ़िल्मकार गुरुदत्त के जीवन और उनके समय के भारतीय सिनेमा की गहरी पड़ताल करती है। इस परिचर्चा में वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जवरीमल पारख, फ़िल्म अध्येता इरा भास्कर, कवि व समीक्षक प्रियदर्शन और लेखिका सुदीप्ति ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का शानदार संचालन दास्तानगो पूनम गिरधानी ने किया।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए पूनम गिरधानी ने कहा कि यह सिर्फ़ एक किताब का लोकार्पण नहीं, बल्कि अदब, सिनेमा और दास्तानगोई तीनों विधाओं के संगम का जश्न है। उन्होंने बताया कि इस कृति के ज़रिए उस भूली-बिसरी अदबी परम्परा की याद ताज़ा होती है, जब किताबें पहले सुनाई जाती थीं और बाद में छापी जाती थीं।
वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जवरीमल पारख ने किताब को हिन्दी सिनेमा और गुरुदत्त के रचनात्मक अंतर्विरोधों का गहरा दस्तावेज़ बताया। उन्होंने कहा कि इसमें गुरुदत्त को किसी मिथकीय महानायक की तरह नहीं, बल्कि उनकी जटिलताओं और कमजोरियों के साथ पेश किया गया है।
पारख ने गीता दत्त के साथ गुरुदत्त के संबंधों के ईमानदार चित्रण की सराहना की। उन्होंने 'प्यासा', 'कागज़ के फूल' और 'साहब बीवी और ग़ुलाम' का ज़िक्र करते हुए कहा कि महमूद फ़ारूक़ी की आलोचनात्मक दृष्टि हिन्दी सिनेमा को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
फ़िल्म अध्येता इरा भास्कर ने कहा कि यह किताब बेहद संवेदनशील, संतुलित और बिना किसी पूर्वाग्रह के लिखी गई है। लेखक ने गुरुदत्त से भावनात्मक निकटता होने के बावजूद एक ज़रूरी आलोचनात्मक दूरी बनाए रखी है, जो पाठक को गहराई से छूती है।
उन्होंने गुरुदत्त की तुलना पी.सी. बरुआ और ऋत्विक घटक से करते हुए कहा कि इन कलाकारों में बेचैनी के साथ जीवन और सृजन के प्रति गहरी आस्था भी थी। इरा भास्कर के अनुसार, गुरुदत्त केवल एक दुखांत व्यक्तित्व नहीं थे, बल्कि मानवीय भावनाओं के अद्वितीय शिल्पी थे।
कवि और समीक्षक प्रियदर्शन ने इसे हिन्दी सिनेमा के एक पूरे दौर का जीवंत दस्तावेज़ करार दिया। उन्होंने कहा कि 'प्यासा' जैसी फ़िल्में केवल सिनेमाई उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन और कविता के गहरे अंतर्द्वंद्व का प्रतीक हैं। यह किताब आज़ादी के बाद बदलते भारतीय समाज और टूटते स्टूडियो सिस्टम का आईना है।
वहीं, लेखिका सुदीप्ति ने कहा कि 'दास्तान-ए-गुरुदत्त' को सुनना और पढ़ना दोनों ही अलग लेकिन गहरे अनुभव हैं। उन्होंने बताया कि किताब दास्तान से आगे जाकर पाठक को इतिहास, रचनात्मक प्रक्रियाओं और उस दौर की सांस्कृतिक दुनिया को गहराई से समझने का अवसर देती है।
किताब के लेखक महमूद फ़ारूक़ी ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य गुरुदत्त के जीवन को किसी अतिरिक्त रंग-रोगन या रोमानी मिथक में बदलना नहीं था। वह उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक जीवन के अंतर्विरोधों को ईमानदारी से सामने लाना चाहते थे।
सवाल-जवाब सत्र में फ़ारूक़ी ने बताया कि अपने अंतिम वर्षों में गुरुदत्त बेहद थक चुके थे और गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे थे। उन्होंने कहा कि वहीदा रहमान सहित कई लोगों ने यह महसूस किया था कि उनके भीतर जीने की इच्छा लगातार कम होती जा रही थी।
फ़ारूक़ी ने रचनात्मक थकान की जटिलता को समझाते हुए वी.एस. नायपॉल और पी.सी. बरुआ का भी उल्लेख किया। अंत में उन्होंने कहा कि गुरुदत्त के दुख को समझने के साथ-साथ यह बेहद ज़रूरी है कि हम उन्हें उनकी फ़िल्मों और रचनात्मक विरासत के ज़रिए भी याद करें।
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