बारामूला के ज़ेहनपोरा में मिला 2000 साल पुराना इतिहास: जिसे लोग मिट्टी का टीला समझते रहे, वह निकला प्राचीन बौद्ध स्तूप

टीले के नीचे छिपा 2000 साल पुराना राज. फ्रांस के म्यूजियम से कैसे खुला कश्मीर के इतिहास का पन्ना? पीएम मोदी ने 'मन की बात' में क्यों किया इसका जिक्र? जानिए इस रिपोर्ट में...
Buddhist stupas in Zehanpora.
कश्मीर के ज़ेहनपोरा में 2000 साल पुराना इतिहास सामने आया है। जिसे लोग मिट्टी का टीला समझते थे, वह प्राचीन बौद्ध स्तूप निकला।Pic- Social Media
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श्रीनगर/बारामूला: उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के एक छोटे से गांव ज़ेहनपोरा में, स्थानीय निवासी जिस संरचना को वर्षों से केवल मिट्टी का टीले मान रहे थे, वह वास्तव में इतिहास का एक अनमोल खजाना निकला है। 10 एकड़ में फैले ये टीले हाल ही में मानव निर्मित पाए गए हैं, और अनुमान है कि ये 2,000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।

इस खोज ने न केवल कश्मीर के इतिहास को नया मोड़ दिया है, बल्कि इसे राष्ट्रीय पटल पर भी ला खड़ा किया है। पिछले महीने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में इस स्थल का उल्लेख करते हुए जम्मू-कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित किया था।

इसके बाद, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, "जो पहले असामान्य चट्टानी संरचनाओं जैसा प्रतीत होता था, वह बाद में फ्रांस के एक संग्रहालय के अभिलेखागार में संरक्षित तीन बौद्ध स्तूपों की तस्वीर से मेल खाता हुआ पाया गया। यह खोज जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत को उजागर करती है।"

उत्खनन और कुषाण काल से संबंध

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस पुरातात्विक स्थल पर उत्खनन के निदेशक, डॉ. मोहम्मद अजमल शाह ने बताया कि ये संरचनाएं कुषाण काल की हैं। इस स्थल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कश्मीर पर लिखने वाले इतिहासकारों ने इसका केवल सरसरी तौर पर उल्लेख किया था। किसी ने भी इसकी गहराई से पड़ताल नहीं की थी। यह एक स्पष्ट पुरातात्विक स्थल की तरह था, लेकिन अनदेखा रहा।

यह स्थल एक मानव निर्मित पठार जैसा दिखता है, जिसकी संरचना स्तूप के समान है। सदियों के थपेड़ों ने इन टीलों को छोटा जरूर कर दिया है, लेकिन वे अभी भी परिदृश्य में अलग दिखाई देते हैं। 1970 के दशक से एक नहर इस स्थल को विभाजित करती आ रही है।

फ्रांस के संग्रहालय से मिला अहम सुराग

इस खोज की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। डॉ. अजमल शाह बताते हैं कि 2023 में एक फेलोशिप के दौरान जब वे फ्रांस गए, तो वहां एक संग्रहालय में यात्रियों के फोटो आर्काइव में उन्होंने कश्मीर के इस स्थल की एक तस्वीर देखी।

उन्होंने कहा, "जब मैंने वह तस्वीर देखी, तो मैं हैरान रह गया और उस जगह को पहचानकर बेहद खुश हुआ। मेरा मानना ​​है कि अंग्रेज लाहौर और तत्कालीन तक्षशिला (अब उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान) के रास्ते कश्मीर की यात्रा करते थे और रास्ते में इन स्थलों की तस्वीरें लेते थे।"

आधुनिक तकनीक से मैपिंग और भविष्य की योजनाएं

पिछले साल अक्टूबर में, कश्मीर विश्वविद्यालय के मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र (Centre of Central Asian Studies) के शोधकर्ताओं की एक टीम ने जम्मू-कश्मीर के अभिलेखागार, पुरातत्व और संग्रहालय विभाग के साथ मिलकर इस स्थल की मैपिंग शुरू की। टीम पिछले दो वर्षों से यहां उत्खनन शुरू करने के तरीके तलाश रही थी। वहां एक लकड़ी की अधिरचना (super-structure) के प्रमाण भी मिले हैं, जो शायद टीलों के ऊपर रही होगी।

ड्रोन और रिमोट सेंसिंग जैसे आधुनिक उपकरणों का उपयोग करके मैपिंग शुरू की गई। शुरुआती निष्कर्ष बताते हैं कि पूरा क्षेत्र संरचनाओं से ढका हुआ है। हालांकि, सर्दियों की शुरुआत के कारण काम रोक दिया गया था, जिसे मौसम बदलने के बाद फिर से शुरू किया जाएगा।

कश्मीर और बौद्ध धर्म का गहरा नाता

यह खोज कश्मीर में बौद्ध धर्म के इतिहास पर नई रोशनी डालती है। आम धारणा के अनुसार, कश्मीर में बौद्ध धर्म मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में आया था। लेकिन कल्हण की 'राजतरंगिणी' बताती है कि अशोक के समय से बहुत पहले ही कश्मीर में बौद्ध धर्म प्रचलित था। एक अन्य स्रोत 'महावंश' के अनुसार, अशोक ने पाटलिपुत्र में आयोजित बौद्ध संगीति के लिए कश्मीर के बौद्ध विद्वानों को आमंत्रित किया था।

कुषाण शासकों, विशेषकर कनिष्क के संरक्षण और विभिन्न बौद्ध संप्रदायों के बीच दार्शनिक विचार-विमर्श के जरिए कश्मीर में बौद्ध धर्म ने अपनी पकड़ मजबूत की। यहाँ कई मठ, विहार और स्तूप स्थापित किए गए।

इंडो-ग्रीक शासक मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच बौद्ध धर्म पर संवाद कश्मीर क्षेत्र में ही हुआ था, जिसने इस धर्म को और मजबूती दी। बाद में महायान संप्रदाय, जिसे बौद्ध धर्म का एक नया रूप माना जाता है, ने कश्मीर में अपनी जड़ें जमाईं और यहीं से कश्मीरी मिशनरी भिक्षुओं द्वारा चीन और मध्य एशिया में इसका प्रसार हुआ।

इतिहास की परतों को खोलेगा यह उत्खनन

विशेषज्ञों का मानना है कि ज़ेहनपोरा साइट का उत्खनन कश्मीर से गुजरने वाले व्यापार मार्गों और क्षेत्र में बौद्ध प्रभाव के ज्ञान में महत्वपूर्ण वृद्धि करेगा। इस क्षेत्र में कोई भी अन्य पुरातात्विक स्थल पैमाने में ज़ेहनपोरा का मुकाबला नहीं करता है। यहाँ कुछ विशिष्ट टीले हैं जो अभी तक छेड़छाड़ से बचे हुए हैं और इस क्षेत्र के इतिहास को समझने में बहुत मददगार साबित होंगे।

आज भी कश्मीर के उत्तरी भाग में कनिस्पोरा, उशकूर और परिहासपोरा जैसे कई ज्ञात बौद्ध स्थल हैं, जबकि हरवान मध्य कश्मीर के श्रीनगर में एक प्रमुख बौद्ध परिसर का प्रतिनिधित्व करता है। दक्षिण कश्मीर में सेमथन, हुतमुर, होइनार और कुटबल जैसे स्थल भी बौद्ध विरासत की गवाही देते हैं। अब ज़ेहनपोरा की यह खोज इस कड़ी में एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने जा रही है।

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