क्या झारखंड सरकार नहीं दे पा रही आदिवासी महिलाओं को इंसाफ?

क्या झारखंड सरकार नहीं दे पा रही आदिवासी महिलाओं को इंसाफ?
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महिला पत्रकार मोनिका मरांडी के फेसबुक वॉल से।

सुनीता खाखा का नाम आजकल सोशल मीडिया और अखबारों में खूब छाया हुआ है। साथ ही, सीमा पात्रा का नाम भी जो झारखंड में भाजपा नेता थी और बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ मुहिम का नेतृत्व कर रही थी। इस घटना का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि ये घटना झारखंड की है और आदिवासी बहुल राज्य में ही जब आदिवासी सुरक्षित नहीं हैं तो देश के किसी भी जगह पर सुरक्षित नहीं है। देश की ऐसी पार्टी जो एक तरफ आदिवासी महिला को राष्ट्र का सबसे ऊंचा पद देकर राष्ट्रपति बना देती है। वहीं उसी पार्टी की नेता पिछले 8 सालों से आदिवासी महिला पर अमानवीय अत्याचार कर रही है। इस मामले से झारखंड के आदिवासियों का विश्वास झारखंड की सरकार के साथ-साथ देश की सरकार से उठा रहा है।

मामला है घर में काम करने वाली नौकरानी सुनीता खाखा के साथ मारपीट करना। सीमा पात्रा ने न केवल उसे मारा पीटा बल्कि उसके साथ जानवरों जैसा सलूक भी रखा। सुनीता पुलिस को दिए गए बयान में बताती हैं कि सीमा पात्रा छोटी-छोटी गलतियों के लिए न केवल उन्हें मारती पीटती थी बल्कि गर्म तवे से जलाया भी करती थी। उसने यहाँ तक बताया कि एक बार बाथरूम साफ नहीं करने पर सीमा पात्रा ने फर्श से पेशाब चाटकर साफ करने के लिए कहा। किसी का मन गुस्से से भर जाएगा। साथ ही सोचने लगेगा की क्या मानव समाज इतना गिर चुका है।

इस मामले को सामने लाने वाला और कोई नहीं सीमा पात्रा का बेटा आयुष्मान ही था। उसने अपनी मां की करतूतों के बारे में पूरी जानकारी विवेक को दी थी। विवेक इस वक्त झारखंड सरकार में कार्मिक, प्रशासनिक सुधार और राजभाषा विभाग में सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार विवेक ने बताया कि आयुष्मान ने उसे एक दिन फोन कर के कहा कि उसके घर में आदिवासी महिला को बचा लो वरना उसकी मां उसे मार देगी। उसके बाद ही मामला पुलिस में रजिस्टर हो गया। उसके बाद झारखंड में ये खबर आग की तरह फैल गई।

कार्यवाही कहां तक पहुंची

इस वक्त सीमा पात्रा को 14 सितंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। सीमा के ऊपर एससी-एसटी प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट के तहत केस दर्ज हुए हैं। उन पर आईपीसी की धारा 323 (जानबूझ कर मारना), 325 (जानबूझ कर गंभीर चोट देना), 346 (गलत तरीक) से बंधक बनाना), 374 (जबरन मजदूरी कराना) लगाई गई है।

झारखंड सरकार से उठ रहा है आदिवासियों का विश्वास

सन् 2000 में झारखंड, बिहार से इसलिए अलग हुआ था कि आदिवासियों को उनकी पहचान बनाए रख पाना मुश्किल हो रहा था। झारखंड की नींव का आधार ही आदिवासी गरिमा का बनाए रखना था। पिछले कई सालों में झारखंड आदिवासी महिलाओं की गरिमा को बनाएं रख पाने में विफल होता दिखाई दे रहा है। चाहे रूपा तिक्री का मामला हो। जिसमें सारी उंगलियां झारखंड के सीएम के प्रिय पंकज मिश्रा पर उठ रही थीं। सरकार कड़ी कार्यवाही करने से बचती नजर आ रही थी। इसके कुछ ही दिन बाद संध्या टोपनो की हत्या का भी यही हाल रहा। लोगों को इंसाफ के लिए सड़कों पर आना पड़ा। महिलाओं के खिलाफ सिर्फ ये मामला नहीं है। झारखंड में सालाना 40-50 औरतें डायन के नाम पर मार डाली जाती हैं। वहीं भौतिक सुविधाएं नहीं होने के कारण सालाना लाखों महिलाएं दूसरे राज्यों में पलायन कर रही हैं। जिसकी वजह से शारीरिक, आर्थिक शोषण का शिकार होती हैं। जिस पर सरकार की ओर से निराशा ही हाथ लगती है।

सवाल उठता है कि आदिवासी विश्वास को पाकर सरकार बनाने वाली जेएमएम सरकार आज आदिवासियों से ही मुंह क्यों फेर रही है? क्या झारखंड के लोगों के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं है? आदिवासी महिलाओं की लगातार होती मौतों पर सरकार मौन की धारण कर लेती है। झारखंड की आदिवासी जनता ये कब तक सह पाएगी। इसका जवाब कोई नहीं दे सकता।

घरों में काम करने वाली आदिवासी महिलाएं

आराम पूर्वक जिंदगी के लिए हम सभी घरों में काम करने वाली महिलाओं की मांग करते हैं। 1993 में इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार भारत में ज्यादातर लोग घरों में काम करने के लिए आदिवासी महिलाओं का चुनाव ही करते हैं। कई बार उनकी उम्र 16 से कम होती है। ताकि उन्हे लंबे समय तक रोका जा सके और वेतन भी कम देना पड़े। जब सुनीता खाखा जैसा मामला सामने आता है तो सरकार लग जाती जी हजूरी करने। इतना कुछ होने के बावजूद उसे सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाती। सीमा पात्रा जैसे लोग उसपर लगातार दबाव बनाते है केस वापस लेने का। इसके जिम्मेदार उन लोगों से ज्यादा सरकार द्वारा बनाया श्रम कानून है।

झारखंड के लेबर लॉ में अभी घरों में काम करने वाली ऐसी महिलाओं के लिए किसी भी प्रकार के नियम नहीं बनाए गए हैं। न ही उनके काम करने का समय तय है और न उनका वेतन। साथ ही, उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के भी वो अपने मालिकों पर ही निर्भर ही रहती हैं। यही कारण है कि घरों के मालिक खुद को भगवान समझने लगते हैं और घरों में काम करने वाली महिलाओं को अपना दास।

उम्मीद ही की जा सकती है कि आने वाले नए लेबर लॉ इस केस को ध्यान में रखे और घरों में काम करने वाली आदिवासी महिलाओं के लिए जेएमएम सरकार कड़े नियम लाए। ताकि उन्हें भी इज्जत से जीवन जीने का अधिकार मिले।

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