कूड़ा बीनने के लिए मजबूर इन बच्चों का बचपन और महिलाओं का स्वास्थ्य जहरीली गैस और दूषित पानी की चपेट में

पश्चिम बंगाल से आया परिवार जो कूड़ा बीनने का काम करता है [फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक]
पश्चिम बंगाल से आया परिवार जो कूड़ा बीनने का काम करता है [फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक]
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जीविका चलाने के लिए कूड़ा बीनने के लिए मजबूर हो रहीं मासूम जिंदगियाँ। भलस्वा लैड़फिल में कूड़ा बीनने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य और बच्चों पर पड़ सकता है हानिकारक असर।

दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आकर अपने-अपने कामकाज में जुटे हैं। यहां कोई बड़ी कंपनी का बाबू है तो कोई किसी के घर का काम कर रहा है। यहां हर किसी की जिदंगी में काम ही सबसे महत्वपूर्ण है। दिल्ली में तीन कूड़े के पहाड़ हैं — भलस्वा, गाजीपुर और अखोला। जहां देश के अलग-अलग हिस्सें के लोग काम करते हैं। ताकि, अपनी जीविका चला सके। सेहत और पर्यावरण के हिसाब से सबसे खतरनाक जगह होने के बावजूद यहां पर काम करना लोगों के लिए मजबूरी है। लेकिन, इसके बाद भी छोटे बच्चों के लिए यहां काम करना कितना मुश्किल हो सकता है, आप इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। द मूकनायक की टीम ने भलस्वा लैंडफिल में काम करने वाली कुछ महिलाओं से बात की है। जो इस कचड़े की पहाड़ी के सहारे अपनी जीविका चला रही हैं।

लैंडफिल से आग लगने के बाद निकलता धुआं [फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक]
लैंडफिल से आग लगने के बाद निकलता धुआं [फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक]

भलस्वा लैड़फिल में पिछले महीने आग लग गई थी। लेकिन अब यहां के लोगों की जिदंगी सामान्य हो गई है। हम जैसे ही भलस्वा के कचड़े से लदे पहाड़ पर जाने लगे, छोटी-छोटी झुग्गियों के सामने हमें दो बहनें मिली, जो पश्चिम बंगाल से आई थीं। दोनों ने नाम न लिखने के शर्त पर बात की। बड़ी बहन की उम्र लगभग 17 से 18 साल रही होगी और छोटी बहन 13 साल की थी।

बड़ी बहन ने बताया कि, पांच साल पहले उनका परिवार यहां काम की तलाश में आया था। एक छोटी सी मलिन झोपड़ी (झुग्गी) में उसके माता-पिता और भाई बहन रहते हैं। चूंकि, दोपहर का समय था इसलिए सभी कूड़ा बीनने गए हैं। वह बताती है, "कूड़ा बीनने मेरी सास भी जाती है, मैं भी जाती हूं।" शादी की बात करते हुए वह बताती है कि, दिल्ली आने के बाद ही उसकी शादी यहां एक लड़के से उसके घरवालों न कर दी। "वह भी कूड़ा बीनता है। हम दोनों ही यह काम करते हैं। फिलहाल मेरा एक बच्चा है। उसको कभी मेरी सास तो कभी मैं देखती हूं। ताकि हम दोनों बारी-बारी से काम पर जा सके। यही हमारी जिदंगी है और यही हमारा काम।" पास में ही खड़ी छोटी बहन से जब द मूकनायक ने पूछा की वह पढ़ती है! तो उसका जवाब था, "गांव में पढ़ती थी। यहां नहीं, क्योंकि मैं बंगला स्कूल में पढ़ी हूं मुझे हिंदी कम समझ में आती है। इसलिए यहां आकर एडमिशन नहीं कराया। अब कूड़ा बीनने चली जाती हूं। अपने घर वालों का हाथ बटाती हूं। लेकिन इस साल घर वाले कह रहे हैं कि यहां सरकारी स्कूल में एडमिशन करवा देंगे।"

इन झुग्गियों से आगे बढ़ने पर स्टिक के कचड़े से भरी बोरियां दिखी। जिसमें लोगों ने कूड़ा बीनकर जमा किया था और अब वह बिकने के लिए जा रही थी। इन सारे कचड़े को कई घरों के परिवारों ने सुबह छह बजे से लेकर शाम छह बजे तक काम करके बीना था। कचड़े के पहाड़ पर चढ़ने पर हमें पता चला कि, कई ऐसी महिलाएं भी हैं जो तपती धूप में अपनी बच्चियों के साथ यहां कूड़ा बीनती हैं। इनमें से शायद कईयो के रिश्तेदारों को पता भी नहीं है कि ये लोग यहां क्या काम करते हैं। शमरीन इनमें से एक है। जिसका ससुराल गुड़गांव में है। भलस्वा में उनका मायका है। सूरज ढलने वाला था।

शमरीन बड़ी तेजी में पहाड़ पर चढ़कर कूड़ा बीनने की तैयारी करती है। वह बताती है कि, उसके ससुराल वालों को यह पता नहीं है कि वह मायके आकर भी कूड़ा बीनती है। "मेरी मां अकेली है, और बीमार भी रहती है। पहले भी बीमारी के कारण लोगों से कर्ज लिया हुआ है। अब उनको पैसा देना भी जरुरी है। साथ ही उसका ध्यान भी रखना है" वह बताती है कि, "गुड़गांव में वह बिल्डिंग से कचड़ा इकट्ठा करती हैं। यहां तक कि जब मैं पेट से थी (गर्भवती होने की स्थति में) तब भी यह काम करती थी। बच्चे की डिलवरी के एक सप्ताह बाद ही मैंने यह काम शुरु कर दिया था। अभी मैं अपने बेटे को अपनी मां को देकर आई हूं," वह बड़े सहज भाव से कहती है कि अगर काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या?

शमरीन जैसी ऐसी कई महिलाएं हैं जिनके जीवन में ऐसी परेशानियां है। कोरोना काल के बाद लोगों का जीवन ऐसे पटरी से उतारा है कि दोबारा सामान्य हो पाना मुश्किल हो रहा है। शायद इसलिए बिहार के मुजफ्फरपुर की सीता देवी यहां अपनी बच्ची के साथ एक डिब्बे को घूम-घूमाकर कचड़े में से लोहे की तलाश कर रही है। क्योंकि, लोहा सबसे महंगा बिक्री होता है। सीता एक लाठी साथ लगे एक डिब्बे, जिसमें चुम्बक लगा है, को गोल-गोल घुमाती है। उसके साथ उसकी सहेली और दो बच्चियों भी है। सभी लोग यही काम कर रहे हैं। सीता बताती हैं कि, वह पिछले साल दिल्ली आई थी, और सीजन में आती है फिर चली जाती है। इसी क्रम में उनके बच्चे को पढ़ाई भी चलती है। सीता के साथ उनकी बेटी भी थी, जो अपनी मां का हाथ बंटा रही थी।

सीता देवी और उसकी बेटी [फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक]
सीता देवी और उसकी बेटी [फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक]

सीता बताती है कि, जब बरसात शुरु हो जाती है तो वह वापस अपने गांव चली जाती है, और उसी दौरान बच्चे स्कूल भी जा पाते हैं।   क्योंकि यहां कोई काम नहीं रहता है। सीता की सहेली का भी यही हाल है। वह भी कुछ समय पहले ही दिल्ली आई है। हमने जब उनसे पूछा कि क्या वह अपने गांव जाती है तो वह कहती है कि "हां, गांव नहीं जाएंगे तो हमेशा यहां कैसे रहेगें।" अप्रैल महीने में लगी आग के बारे में पूछने पर वह बताती है कि, हमारी सेहत पर तो इसका बुरा असर पड़ा ही है, इसके साथ ही हमारा बीना हुआ कचड़ा भी उसी में जल गया, जिससे लगभग 10 हजार का नुकसान हो गया।

इसी पहाड़ पर अंशु और उसकी दोस्त भी है, जो लगभग 10 साल से कम उम्र की थी। एक हाथ में बोरा और एक हाथ में पानी की बोतल लिए हुए शाम को खेलते-कूदते हुए आगे जा रही थी। हमें देखकर रुक गई। अंशु द मूकनायक से बताती है, "यहां बहुत गंदगी है, हम लोग गरीब हैं इसलिए यहां आते हैं।" जब हमने पूछा कि वह यहां वह कूड़ा बीनने आई है तो उसका कहना था कि, "नहीं, मैं अपनी मम्मी से मिलने आई हूँ। जो यहां डम्प प्लांट में काम करती है।" लेकिन कूड़ा बीनने वाले बोरे दोनों बच्चियों हाथ में थे। वह कहती है कि, मेरा यहां आने का मन नहीं करता है। लेकिन यहां आना हमारी मजबूरी है। जब दोनों बच्चियों से उनकी शिक्षा के बारे में पूछा तो बड़ी खुशी से दोनों ने कहा हां, हम स्कूल जाते हैं। "मैं अभी क्लास छह में पढ़ाती हूं और मन लगाकर पढ़ती हूं। ताकि मुझे पुलिस की नौकरी मिल सके। मेरे पापा डिश केवल का काम करते और मम्मी प्लांट में," अंशु ने कहा।

देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी कई महिलाओं की जिदंगियां ऐसी ही जहरीली और दूषित बस्तियों में बीत रही हैं। कचड़े से निकलने वाले मीथेन गैस से सांस लेने के साथ-साथ कई तरह की बीमारियां भी होती है। छोटे बच्चे जिन्हें ताजी हवा लेनी चाहिए थी, वह अब जहरीली गैस में सांस ले रहे और जहरीला पानी पी रहे हैं। पिछले साल एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के तीनों लैंडफिल साइट से दिल्ली के पर्यावरण को 450 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यह रिपोर्ट आईआईटी दिल्ली, सीपीसीबी नीबी के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई है थी।

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