पश्चिम बंगालः ईसीएल ने बिजली काटने का दिया नोटिस, सरकारी क्वार्टरों में सालों से रह रहे अवैध कब्जेदारों में मचा हड़कंप

ईसीएल ने बिजली काटने का दिया नोटिस / फोटो - पूनम मसीह, द मूकनायक
ईसीएल ने बिजली काटने का दिया नोटिस / फोटो - पूनम मसीह, द मूकनायक
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आसनसोल। कोल इंडिया की सहायक कंपनी ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) अपने आवासीय इलाकों में कर्मचारियों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराती है। इधर, लगातार घाटे में चल रही ईसीएल को बिजली का यह बिल परेशान करने लगा है। ईसीएल प्रबंधन ने अब आवासीय इलाकों में खाली पड़े क्वार्टरों (आवासीय घरों) से बिजली कनेक्शन काटने का निर्णय लिया है। यानि कि जो भी लोग ईसीएल में कार्यरत नहीं है और कंपनी के क्वार्टर में अनाधिकारिक तौर पर रह रहे हैं, उनके घर की बिजली को काट दिया जाएगा।

गैर ईसीएल कर्मचारी परेशान

आपको बता दें कि, ईसीएल पूर्वी भारत में कोयला उत्पादन की बड़ी कंपनी है। जिसके 11 एरिया पश्चिम बंगाल और तीन झारखंड में हैं। पश्चिम बंगाल में भी दो कोलयिरी पुरुलिया जिला एक बांकुडा और बाकी की सभी पश्चिम बर्धमान जिले में आती है। ईसीएल द्वारा यह पहला नोटिस नहीं है, जब कब्जे वाले क्वार्टर को खाली करने की बात कही जा रही है। इससे पहले भी ईसीएल ने कई बार नोटिस जारी किया है। लेकिन इस बार नोटिस में कंपनी ने लोकल बॉडी से मदद की गुहार लगाई है, ताकि अगस्त के महीने में ईसीएल के 14 एरिया की विभिन्न कोलयिरी के अवैध कब्जे वाले क्वार्टरों से बिजली को काटा जा सके।

ईसीएल द्वारा जारी की गई नोटिस के बाद लगभग हर किसी के मन में एक बार फिर घर खाली करने का खौफ आ गया है। इससे पहले भी जब भी नोटिस आती थी तो आम जनता इसको लेकर परेशान हो जाती थी। ईसीएल की पुरानी कोलयिरी विभिन्न कारणों से धीरे-धीरे बंद हो गई हैं। इन बंद कोलयिरी के रिहायशी क्वार्टरों को खाली नहीं कराया गया, जिसके कारण यहां रहने वाले लोग स्थानीय निवासी बन गए। यहां तक की लोगों के पहचान पत्र भी उसी एरिया के हिसाब से बने हुए हैं। रितू भी ऐसी ही एक महिला है। जो लंबे समय से ईसीएल के क्वार्टर में रह रही हैं। वह कहती है कि, "मेरे घर में कोई नौकरी नहीं करता था। मेरे पति ऐसे ही मजदूरी करते थे। अब उनका देहांत हो गया है। बेटा ड्राइवर है। मैं खुद किसी के घर में काम करती हूं। किसी तरह घर का खर्चा चल रहा है। मेरी पोतियां यहीं ईसीएल के सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं। ऐसे में क्वार्टर छोड़कर कहां जाएं। हमारे पास कोई जमीन नहीं है। जहां जाकर घर बनाकर रहा जाए। जब बिजली काट दी जाएगी तो अंधेरे में ही रहेंगे। ईसीएल के विभिन्न एरिया में हजारों की संख्या में ऐसे लोग है जो दिहाड़ी मजदूरी का काम करते हैं।"

कुछ लोग ऐसे भी है जो हाल के कुछ सालों में रिटायर हुए हैं और उन्होंने घर नहीं छोड़ा है। एक व्यक्ति ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर बताया कि, उनकी मां को रिटायर हुए छह साल हो गए हैं। रिटायरमेंट के लगभग छह महीने बाद मां का देहांत हो गया। उस वक्त उन्हें मां के रिटायरमेंट के सारे पैसे नहीं मिल पाए थे। ऐसे में उन्होंने क्वार्टर खाली नहीं किया। अब वह उसी क्वार्टर में रह रहे हैं। वह बताते है कि, ईसीएल वालों ने उनसे क्वार्टर को देने के लिए कुछ पैसे भी लिए हैं और एक लिखित कागज भी दिया है। जिसे वह उस दिन दिखाएंगे जब उन्हें क्वार्टर खाली करने को कहा जाएगा।

आवासीय इलाकों का एक घर (फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक)
आवासीय इलाकों का एक घर (फोटो- पूनम मसीह, द मूकनायक)

लंबे समय से परिवार आकर बसे हैं

बिजली काटने की खबर पर गुरमुख सिंह का कहना है कि, "मेरे पिताजी पंजाब से यहां नौकरी करने आए थे। पिताजी के रिटायरमेंट के बाद हमारा सारा परिवार यहीं बस गया। सबकी शादी भी यहीं हुई। हमारा बच्चे भी यहीं पले बढ़े हैं। हमारी तीसरी पीढ़ी पश्चिम बंगाल में रह रही है। हमने कभी सोचा ही नहीं है कि पंजाब वापस जाएंगे। पिताजी के रिटायरमेंट के बाद से क्वार्टर में ही रह रहे हैं। बिजली काटने की बात चल तो रही है, लेकिन देखते हैं क्या होता है।"

ईसीएल ने जबसे यह नोटिस जारी किया है। हर कोई इसके बारे में दबी जुबान से ही सही, लेकिन बात जरूर कर रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार इस बारे में कुछ करे। आखिर इतनी जनता कहां जाएगी। जिनके पास पैसा है वो तो चले जाएंगे। लेकिन जो रोज कमा खा रहे हैं वह क्या करें?

ईसीएल पर लगातार बढ़ता बिजली का बोझ और अनाधिकृत क्वार्टरों से बिजली काटने को लेकर द मूकनायक की टीम ने आसनसोल के एक वरिष्ठ पत्रकार से मामले को और विस्तार से जानने की कोशिश की। नाम नहीं लिखने के शर्त पर उन्होंने बताया कि, ईसीएल देश के पुरानी कंपनियों में से एक है। जिन्हें पहले निजी लोगों द्वारा चलाया जाता था। जिस वक्त यही निजी कंपनी के तौर पर काम करती थी तो बिहार, पूर्वी यूपी के लोगों को ठेका प्रथा के तहत छोटे-छोटे कमरों में रखा जाता था और मजदूर के तौर पर काम कराया जाता था। इन मजदूरों को सुविधा के अनुसार कोलयिरी के आस-पास सब्जी वाला, दूधवाला, कपड़े धोनेवाला, राशनवाला आकर बस गए। ऐसे धीरे-धीरे करके कोलयिरी इलाकों में जनसंख्या बढ़ने लगी।

वह बताते हैं कि, 1973 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया गया। जिसके तहत बाहर से आए लोगों की नौकरी पक्की हुई। वहां बने क्वार्टर में लोग रहने लगे। लोगों का परिवार बढ़ने लगा, लेकिन ईसीएल में नौकरियां नहीं बढ़ी और जिनको नौकरी मिली उन्हें भी बड़ी जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। ऐसे में जिन लोगों को नौकरियां नहीं मिली वह यहीं बस कर दूसरा काम धंधा करने लगे और ईसीएल के क्वार्टर में रहने लगे। दूसरी ओर बंद होती कोलयिरी के खाली क्वार्टरों में भी लोग रहने लगे।

आज स्थिति ऐसी है कि हर मुहल्ले में एक घर ईसीएल के कर्मचारी का है और पांच घर गैर ईसीएल कर्मचारी के हैं। ऐसे में बिजली काटना संभव नहीं है। क्योंकि ईसीएल को वहां रह रहे अपने एक कर्मचारी को बिजली की सुविधा देनी होगी।

वह बताते हैं कि, कुछ लोगों का तर्क है कि अगर ईसीएल बिजली काट भी देती है तो राज्य सरकार बिजली दे देगी। वह कहते हैं कि यह कैसे संभव हो पाएगा? चूंकि क्वार्टर ईसीएल की जमीन पर है और राज्य सरकार की बिजली लेने के लिए पहले ईसीएल को एनओसी (नो अब्जेक्शन सार्टिफिकेट) देना होगा। ऐसे में जब तक ईसीएल एनओसी नहीं देगी तब तक राज्य सरकार की बिजली मिलना मुश्किल है।

ईसीएल द्वारा जारी की गई नोटिस के बाद द मूकनायक ने ईसीएल के हेडक्वार्टर के पीआरओ पुण्यजीत भट्टाचार्य से बात कि उन्होंने कहा कि, "क्वार्टर की गिनती के लेकर उनके पास कोई खास जानकारी नहीं है। इसके लिए उच्चाधिकारी से संपर्क करें।" द मूकनायक ने उच्च अधिकारी (जीएम) से संपर्क करने के कोशिश की। लेकिन उन्होंने मामले पर कोई जवाब नहीं दिया।

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