गुजरात: आधुनिक 'द्रौपदी' कब तोड़ेगी अपनी खामोशी ?

अहमदाबाद में 'द्रौपदी से द्रौपदी तक' सम्मेलन में महिलाओं ने भरी हुंकार, दलित-आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार की स्थिति दर्शाती साड़ियाँ राष्ट्रपति, महिला लीडर्स और पत्रकारों को भिजवाईं.
दलित शक्ति केंद्र के प्रतिनिधि-मंडल ने महिला नेताओं को ऐसी साड़ियां पोस्ट की.
दलित शक्ति केंद्र के प्रतिनिधि-मंडल ने महिला नेताओं को ऐसी साड़ियां पोस्ट की.दलित शक्ति केंद्र.

अहमदाबाद. 'विकास' शब्द बार-बार सुनने को मिलता है, अगर विकास हो रहा होता तो महिलाओं पर हिंसा बढ़ती या घटती? 2014 से 2021 तक दलित-आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के 31,967 मामले सामने आ चुके हैं। यानी दलित - आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के कुल मामलों में से 40 प्रतिशत अकेले एनडीए शासन के पिछले 8 वर्षों के दौरान दर्ज हुए हैं। जितना दलित - आदिवासी आरक्षण का विरोध हो रहा है, उतना एक प्रतिशत भी विरोध दलित-आदिवासी महिलाओं के बलात्कार का होता है क्या ? मणिपुर की घटना महिलाओं पर हो रहे अत्याचार व हिंसा की पराकाष्ठा है। इस दयनीय स्थिति के विरोध में बीते सप्ताह गुजरात में 'द्रौपदी से द्रौपदी' तक एक विशाल जुलूस और प्रदर्शन आयोजित किया गया।

अहमदाबाद के दलित शक्ति केंद्र में महिलाओं के इस सम्मेलन में एक साड़ी प्रस्तुत की गयी जिसमें दलित-आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार की स्थिति का सचित्र वर्णन किया गया था। साड़ी भारत के राष्ट्रपति, तीन महिला राज्यपाल, सभी राजनीतिक दलों की दो महिला नेता, महिला हिंसा के मुद्दे पर आवाज उठाने वाली महिला पत्रकारों, महिला कार्यकर्ता और संवेदनशील महिला कलाकारों को भेजी गयी और उनसे अनुरोध किया गया की वह साड़ी भारतीय स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को झंडारोहण के कार्यक्रम में पहने|

महिला सम्मेलन ने मणिपुर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की निंदा की और गुजरात राज्य के 12 जिले और साथ-साथ 7 अलग-अलग राज्यों की महिला प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में महिलाओं की स्थिति के बारे में बात की।

'द्रौपदी से द्रौपदी' तक सम्मेलन में शामिल हुए प्रतिभागी.
'द्रौपदी से द्रौपदी' तक सम्मेलन में शामिल हुए प्रतिभागी.दलित शक्ति केंद्र

सम्मेलन के बाद जुलूस दलित शक्ति केंद्र से शुरू हुआ और अहमदाबाद में नेहरू ब्रिज के अंत तक पहुंचा। सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी महिला साथी नेहरू ब्रिज पर साड़ी प्रदर्शित कर नारेबाजी के साथ राष्ट्रपती द्रौपदी मुर्मू को महिला हिंसा पर अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए कहा| सभी महिलाओं ने पोस्टर-बैनर के साथ कतारबद्ध होकर 30 मिनट के प्रदर्शन किए और नारेबाजी के माध्यम से मणिपुर में हुई घटनाओं की निंदा कर अपना विरोध प्रदर्शित किया| इसके बाद एक प्रतिनिधि-मंडल अहमदाबाद जनरल पोस्ट ऑफिस गया और सभी साड़ियां नामित महिला नेताओं को पोस्ट की गयी।

द्रौपदी से द्रौपदी तक

'द्रौपदी' का नाम सुनते ही हर किसी की आंखों के सामने एक तस्वीर उभर आती है। भरी सभा में सभी पुरुषों की उपस्थिति में एक आदमी मुस्कुराते हुए एक महिला की साड़ी खींच रहा है और उसे नंगा कर रहा है। सभा में ज्यादातर पुरुष द्रौपदी के वस्त्रहरण करने वाले को प्रोत्साहित कर रहे हैं। द्रौपदी नाम की उस स्त्री के पांचों पति उलटे मुंह बैठे हैं। इन पांचों पतियों यानी पांडवों ने अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगा दिया और उसे भी हार गए। क्या पत्नी को दांव पर लगाया जा सकता है? एक स्त्री को दांव पर लगाने से पहले उसकी इच्छा जानना जरुरी नहीं है क्या ? ये सारे सवाल बेकार थे। यहाँ तो एक ही धर्म और एक ही न्याय था कि पांडव द्रौपदी को दांव में हार गए थे इसलिए कौरवों को द्रौपदी के साथ जो चाहे करने का अधिकार मिल गया था। द्रौपदी की लाज बचाना 'अधर्म था। कौरवों ने चाहा होता तो वे द्रोपदी को कमरे में ले जाकर उसकी इज्जत से खिलवाड़ कर सकते थे, लेकिन उन्होंने फैसला किया कि द्रौपदी के बाल पकड़ कर उसे घसीटकर सार्वजनिक सभा में सब के सामने उसके कपड़े उतारे जाये।

गुजरात के 12 जिले और 7  राज्यों की महिला प्रतिनिधियों ने महिलाओं की स्थिति के बारे में बात की।
गुजरात के 12 जिले और 7 राज्यों की महिला प्रतिनिधियों ने महिलाओं की स्थिति के बारे में बात की।दलित शक्ति केंद्र

यह घटना हमें बचपन से बताई जाती है और अंत में सिखाया जाता है कि भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी इतनी लंबी कर दी थी कि कौरव उसे खींचते खींचते थक गए, लेकिन द्रौपदी को अपमानित करने वाले सभी पुरुष, पांडव और कौरव कितने मक्कार व नालायक थे। यह नहीं सिखाया जाता है। जब यह घटना घटी तो पांडव और कौरव गुट की सभी महिलाएं घटनास्थल पर मौजूद थीं,लेकिन उन्हें द्रौपदी की रक्षा के लिए या इस नीच कृत्य के खिलाफ मैदान में आती नहीं दिखाया गया है। आगे 'मनुस्मृति' में समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति को स्पष्ट किया गया। भारत के इतिहास में सभी महिलाओं के लिए समान नागरिक संहिता इस बात का प्रमाण बन गई कि महिलाएं केवल पुरुषों की दासी हैं। किसी महिला का उत्पीड़न करना, उसके साथ बलात्कार करना, उसे सार्वजनिक जगह पर उसे मारना पीटना या उसके साथ दुर्व्यवहार करना पुरुष का अधिकार माना जाता था। कई महिलाएं भी ऐसी मान्यताओं में विश्वास करती हैं।

आधुनिक और स्वतंत्र भारत में 'द्रौपदी' नाम धारण करने वाली एक महिला माननीय 'द्रौपदी मुर्मू हैं जो भारत के राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। जनता की नज़र में भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के रूप में उनकी गौरवशाली नियुक्ति 2024 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए आदिवासी वोट हासिल करने के लिए एक राजनीतिक कदम है। द्रौपदी मुर्मू ओडिशा से हैं और पहले झारखंड के राज्यपाल के पद पर रह चुकी हैं जो कि प्रमुख आदिवासी आबादी वाला राज्य है जो एनडीए का भागीदार नहीं है। हालाँकि राष्ट्रपति होने बावजूद भी उन्हें भारत के नवनिर्मित संसद भवन में न तो आमंत्रित किया जाता है और न ही उनका संदेश प्राप्त किया जाता है। भारत की थल सेना, वायु सेना और नौ सेना की प्रमुख होने के बावजूद भी राष्ट्रपति द्रौपदी भारत की राजधानी के मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश भी नहीं कर सकती हैं।

मणिपुर राज्य में तीन आदिवासी महिलाओं को भरी बाजार में और दिन-दहाड़े पूरी तरह से नग्न कर जुलूस निकाला गया. पुरुषों की टोली महिलाओं के नग्न शरीर के साथ छेड़छाड़ करती रही फिर सबसे कम उम्र की लड़की पर खुले खेत में सामूहिक बलात्कार किया लेकिन इन बलात्कारियों से बचाने के लिए न तो भगवान कृष्ण आगे आये न तो भारत के प्रधानमंत्री व न तो भारत का राष्ट्रीय महिला आयोग आया।

सैकड़ों वर्ष पहले की द्रौपदी और आज के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक समाज की द्रौपदी; उन दोनों के बीच क्या बदलाव आया ? कई बेहतर महिला समानता कानून आये, लेकिन महिलाओं पर अत्याचार बंद हो गये ? दलितों पर व्यापक अत्याचार के आँकड़े 1974 के बाद और आदिवासी अत्याचार के आँकड़े 1989 के बाद आये रिपोर्ट के मुताबिक 1974 से 2021 के बीच दलित महिलाओं से बलात्कार की कुल 58606 घटनाएं दर्ज की गई हैं जबकि 1989 से 2021 के बीच आदिवासी महिलाओं से बलात्कार की कुल 21318 घटनाएं दर्ज की गई हैं। बीच में दो साल तक सरकार ने आंकड़े जारी नहीं किये हैं। यानी पिछले 47 सालों में दलित- आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के 79,914 मामले सामने आए हैं। यह याद रखना चाहिए कि शुरुआती वर्षों में कई राज्य अपने आंकड़े प्रकाशित नहीं करते थे और बलात्कार के सभी मामले पुलिस रजिस्टर में दर्ज भी नहीं किए जाते थे!

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