Ground Report: द मूकनायक की आँखों-देखी- केन-बेतवा लिंक परियोजना से उजड़े आदिवासियों के आंदोलन के आखिरी दो दिन..

छतरपुर से 80 किलोमीटर दूर, बराना नदी के किनारे आंदोलन के आखिरी दो दिनों की आँखों-देखी कहानी
आसिफ, द मूकनायक
आसिफ, द मूकनायक
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छतरपुर/भोपाल। शनिवार की सुबह जब द मूकनायक की टीम छतरपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर किशनगढ़ की ओर बढ़ रही थी, तब यह अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद संघर्ष, बेबसी और उम्मीद का ऐसा दृश्य सामने आएगा, जिसे शब्दों में समेटना आसान नहीं होगा। बराना नदी के किनारे निर्माणाधीन पुल के नीचे सैकड़ों आदिवासी ग्रामीण पिछले कई दिनों से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे थे।

सबसे अधिक संख्या महिलाओं की थी। कोई कमर तक पानी में बैठकर सत्याग्रह कर रहा था, कोई हाथों में जय किसान संगठन का झंडा लिए नारे बुलंद कर रहा था, तो कुछ महिलाएं बांस की लकड़ियों से बनी सांकेतिक चिताओं पर लेटी हुई थीं। कहीं प्रतीकात्मक फांसी का प्रदर्शन हो रहा था, तो कहीं मिट्टी सत्याग्रह चल रहा था। बहती नदी, गूंजते नारों और चुपचाप सब कुछ सहते चेहरों के बीच यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं था, बल्कि विस्थापन, न्याय और अस्तित्व की लड़ाई की ऐसी तस्वीर थी, जिसे देखकर सहज ही समझा जा सकता था कि विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है। द मूकनायक आपको इस आंदोलन के आखिरी दो दिनों की वह कहानी बताएगा, जो अपने आप में संघर्ष, पीड़ा और उम्मीद को बयां कर रही है।

छतरपुर के किशनगढ़ क्षेत्र में बराना नदी में आदिवासी ग्रामीणों का आंदोलन
छतरपुर के किशनगढ़ क्षेत्र में बराना नदी में आदिवासी ग्रामीणों का आंदोलनThe Mooknayak

पानी में चिता, बांस का फंदा और भूख हड़ताल...

यह आंदोलन समाजसेवी और जय किसान संगठन के संयोजक अमित भटनागर के नेतृत्व में 3 जुलाई से जारी था। जिस दिन हम पहुंचे, उनके आमरण अनशन का 13वां दिन था।

अमित भटनागर नदी के पानी में रखी बांस की सांकेतिक चिता पर अर्धनग्न लेटे हुए थे। चिता की बांस की लकड़ियां उनकी पीठ में लगातार चुभ रही थीं। आसपास बैठे लोग बार-बार उन्हें उठाकर बैठा देते, लेकिन कुछ ही देर बाद वह फिर उसी चिता पर लेट जाते। उनके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन आंदोलन छोड़ने का कोई संकेत नहीं था।

13 दिनों से आंदोलन कर रहे है अमित भटनागर से बातचीत करते द मूकनायक रिपोर्टर अंकित पचौरी
13 दिनों से आंदोलन कर रहे है अमित भटनागर से बातचीत करते द मूकनायक रिपोर्टर अंकित पचौरीThe Mooknayak

आंदोलन स्थल पर कुछ प्रदर्शनकारी बांस से बने सांकेतिक फंदों पर झूलकर फांसी का प्रतीकात्मक प्रदर्शन कर रहे थे। पानी, चिता और फंदा ये तीनों प्रतीक आंदोलन की पीड़ा को शब्दों से ज्यादा प्रभावी ढंग से सामने रख रहे थे।

चेहरे पर मिट्टी लगाए बैठी दिव्या बोलीं- "सरकार न्याय दे या हमें मार दे"

नदी के पानी में महिलाओं के बीच बैठी एक युवा लड़की ने हमारा ध्यान खींचा। उसके चेहरे पर मिट्टी लगी थी। नाम था दिव्या अहिरवार। वह 'मिट्टी सत्याग्रह' में शामिल थीं।

द मूकनायक से बातचीत में दिव्या ने बताया कि यह संघर्ष नया नहीं है। इससे पहले अप्रैल में भी 12 दिनों तक सत्याग्रह किया गया था। उस समय प्रशासन ने बातचीत कर मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया था, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

उन्होंने कहा, "जब न्याय नहीं मिला तो हमें दोबारा आंदोलन करना पड़ा। जब तक न्याय नहीं मिलेगा, हमारा सत्याग्रह जारी रहेगा।"

जब उनसे पूछा गया कि सरकार या प्रशासन का कोई प्रतिनिधि मिलने आया क्या? तो जवाब था-"इस बार कोई नहीं आया। किसी ने बात तक नहीं की।"

इसके बाद उन्होंने भावुक स्वर में कहा, "सरकार या तो हमें न्याय दे या हमें मार दे। अगर सरकार को हमारी इतनी ही चिंता है तो भगवान से प्रार्थना करे कि इस नदी में बाढ़ आ जाए और हम सब बह जाएं।"

उनकी यह बात सुनते ही आसपास बैठे कई आंदोलनकारी भावुक हो गए। थोड़ी देर बाद फिर "इंकलाब जिंदाबाद" और "हमारा हक दो" के नारे गूंजने लगे।

जल सत्याग्रह करती दिव्या अहिरवार
जल सत्याग्रह करती दिव्या अहिरवार The mooknayak

यह विकास नहीं, हमारा विनाश है

नदी के पानी में बैठे राकेश कुमार आदिवासी कई दिनों से सत्याग्रह में शामिल थे। उन्होंने कहा कि सरकार ने उनकी जमीन और घर ले लिए, लेकिन बदले में ऐसा मुआवजा दिया जिससे न नई जमीन खरीदी जा सकती है और न ही सम्मानजनक जीवन दोबारा बसाया जा सकता है।

राकेश का कहना था कि करीब 12 लाख रुपये के मुआवजे में आज जमीन खरीदना और मकान बनाना लगभग असंभव है।

उन्होंने कहा, "सरकार कहती है कि आदिवासी इस देश के मूल निवासी हैं, जल-जंगल-जमीन पर हमारा अधिकार है। लेकिन वही सरकार हमें हमारी जमीन, जंगल और घर से बेदखल कर रही है।"

विकास के सवाल पर राकेश ने बेहद मार्मिक शब्दों में कहा, "हमें भी पता है कि देश का विकास जरूरी है, लेकिन हमारे साथ जो हो रहा है वह विकास नहीं, हमारा विनाश है।"

जल सत्याग्रह करते राकेश आदिवासी
जल सत्याग्रह करते राकेश आदिवासीThe Mooknayak

अमित भटनागर का आरोप- "मुआवजा और पुनर्वास में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ"

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे समाजसेवी अमित भटनागर ने द मूकनायक से बातचीत में आरोप लगाया कि केन-बेतवा लिंक परियोजना में मुआवजा और पुनर्वास की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है।

उनका दावा है कि अनेक पात्र परिवारों को न तो उचित मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास की व्यवस्था। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और भ्रष्टाचार में शामिल लोगों को जेल भेजा जाए।

अमित भटनागर ने कहा, "जब तक विस्थापितों को उनका हक नहीं मिल जाता, तब तक मेरा आमरण अनशन जारी रहेगा।"

दिनभर सत्याग्रह, रात को जीवन की जद्दोजहद!

सुबह से लेकर शाम करीब पाँच बजे तक बराना नदी का किनारा आंदोलन का मैदान बना रहता था। बहते पानी की आवाज के बीच "इंकलाब जिंदाबाद", "हमें न्याय दो" और "जल-जंगल-जमीन हमारा अधिकार है" जैसे नारे लगातार गूंजते रहते। महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा घंटों तक नदी के पानी में बैठकर सत्याग्रह करते। लेकिन जैसे ही शाम ढलने लगती, आंदोलन का स्वरूप बदल जाता। पानी से बाहर निकलते ही वही लोग अपने रोजमर्रा के जीवन की कठिन जद्दोजहद में जुट जाते। निर्माणाधीन पुल के नीचे ईंट-पत्थरों से अस्थायी चूल्हे बनाए जाने लगते और कुछ ही मिनटों में पूरा स्थान एक अस्थायी रसोईघर में बदल जाता।

किसी के हाथ में सूखी लकड़ियां थीं, कोई बोरी से आटा निकालकर उसे गूंध रहा था, तो कोई आलू काटने में लगा था। संसाधनों का घोर अभाव था, लेकिन पूरे दिन के संघर्ष के बाद भूख मिटाना भी जरूरी था। न गैस थी, न बर्तन पूरे, न कोई व्यवस्थित रसोई। फिर भी हर परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन तैयार करने में जुटा था। यह दृश्य बता रहा था कि आंदोलन सिर्फ नारे लगाने का नाम नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए कठिन परिस्थितियों में जीते रहने का भी संघर्ष है।

उधर, आमरण अनशन के 13वें दिन समाजसेवी अमित भटनागर को भी पुल के नीचे बैठाया गया। शारीरिक कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन हौसला बरकरार था। वे आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए बार-बार यही कहते रहे कि संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक विस्थापित परिवारों को न्याय नहीं मिल जाता। उनके आसपास बैठे लोग ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे और एक-दूसरे का मनोबल बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे।

इसी बीच मौसम ने अचानक करवट ली। आसमान में काले बादल छा गए और तेज गर्जना के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। शुरुआत में पुल की छत होने के कारण लोगों को लगा कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन कुछ ही देर में बहता बारिश का पानी पुल के नीचे पहुंचने लगा। देखते ही देखते लोगों का सामान भीगने लगा। लोग अपने बिस्तर, राशन और बर्तनों को बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। जो चूल्हे जल रहे थे, उन्हें भी उठाकर दूसरी जगह ले जाना पड़ा। करीब दो घंटे तक हुई तेज बारिश ने आंदोलन स्थल की पूरी व्यवस्था अस्त-व्यस्त कर दी।

बारिश थमने के बाद भी किसी ने हार नहीं मानी। फिर चूल्हे जलाए गए, कहीं हांडी में चावल पकने लगे, तो कहीं बुंदेलखंड की पहचान मानी जाने वाली हाथ से बनी मोटी रोटियां 'टिक्कड़' सेंकी जाने लगीं। बिना तेल की आलू की साधारण सब्जी तैयार हो रही थी। सीमित संसाधनों में पक रहा यह भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं था, बल्कि संघर्ष के बीच सामूहिक जीवन और उम्मीद भी था।

इसी दौरान द मूकनायक से बातचीत में आंदोलनकारी करधा बाई ने बताया, "हम आंदोलन के पहले दिन से यहीं रह रहे हैं। हमारी हर सुबह और हर रात इसी पुल के नीचे गुजरती है।" जब उनसे पूछा गया कि क्या प्रशासन ने आंदोलनकारियों के लिए कोई व्यवस्था की है, तो उन्होंने आसपास का दृश्य दिखाते हुए कहा, "आप जो देख रहे हैं, बस यही व्यवस्था है। यहां न शौचालय है, न खाने की व्यवस्था, न डॉक्टर और न ही कोई स्वास्थ्य शिविर। लेकिन जब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा, तब तक हम यहीं रहेंगे, चाहे कितनी भी मुश्किल क्यों न आए।"

निर्माणाधीन पुल के नीचे सुलगता चूल्हा
निर्माणाधीन पुल के नीचे सुलगता चूल्हाThe Mooknayak

रात गहराने लगी तो भोजन भी तैयार हो चुका था। किसी ने अपनी थाली में चावल परोसे, किसी ने टिक्कड़ तोड़ा और आलू की सब्जी के साथ खाना शुरू किया। यहां किसी का भोजन सिर्फ उसका नहीं था। जो कुछ था, सब मिल-बांटकर खाया जा रहा था। संघर्ष ने इन लोगों को एक परिवार की तरह जोड़ दिया था।

भोजन के बाद पुल के नीचे ही रात बिताने की तैयारी शुरू हो गई। एक चटाई, एक चादर, एक कंबल और सिरहाने के लिए घर से लाया हुआ झोला, बस यही उनका बिस्तर था। दिनभर नदी में बैठकर सत्याग्रह करने की थकान कई लोगों के चेहरों पर साफ दिखाई दे रही थी।

पुल के नीचे बच्चों को सुलाती महिला
पुल के नीचे बच्चों को सुलाती महिलाफ़ोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

आंदोलन स्थल पर सबसे मार्मिक तस्वीर तब सामने आई, जब पुल के नीचे एक महिला अपने तीन छोटे बच्चों के साथ चटाई पर लेटी मिली। सबसे छोटा बच्चा महज आठ महीने का था, जो अपनी मां की गोद में सो रहा था। आसपास न कोई बिस्तर था, न कोई सुरक्षित ठिकाना। खुले पुल के नीचे, सीमित सामान के बीच यही उनका अस्थायी घर बन चुका था। बातचीत में महिला ने बताया कि वह पिछले एक सप्ताह से अपने तीनों बच्चों के साथ यहीं रह रही हैं। उन्होंने कहा, "हम मजबूरी में यहां हैं। न्याय के लिए यह सब सह रहे हैं, लेकिन सरकार को हमारी परवाह ही कहां है।"

कुछ लोग लेटते ही गहरी नींद में चले गए, जबकि कुछ देर तक बैठकर अपने गांव, अपने उजड़े घर और न्याय की उम्मीद पर बातें करते रहे। पुल के नीचे बीत रही यह रात सिर्फ एक आंदोलन की रात नहीं थी, बल्कि उन लोगों की कहानी थी जो अपने घर-आंगन से विस्थापित होकर अब खुले आसमान के नीचे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे।

19वें दिन की सुबह: आंदोलन शुरू होने से पहले पहुंचा भारी पुलिस बल, जबरन खाली कराया सत्याग्रह स्थल

अगली सुबह आंदोलन स्थल पर एक और दिन की तैयारी शुरू ही होने वाली थी। यह आंदोलन का 19वां दिन था। रातभर पुल के नीचे सोए कई आंदोलनकारी अभी जागे भी नहीं थे। सुबह करीब छह बजे का समय था, जब अचानक बड़ी संख्या में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए। आंदोलनकारियों का कहना है कि कुछ ही देर में पूरे क्षेत्र को पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया। अचानक हुई इस कार्रवाई से वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई।

आंदोलनकारियों के अनुसार, पुलिस बल को देखकर प्रदर्शनकारी समाजसेवी अमित भटनागर को अपने साथ लेकर बराना नदी के बहते पानी के बीच दूसरी ओर चले गए। इस दौरान आंदोलन स्थल पर नारेबाजी लगातार जारी रही। मौके पर बिजावर के एसडीएम विजय द्विवेदी सहित पुलिस और प्रशासन के कई अधिकारी मौजूद थे। प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की कोशिशें भी शुरू हुईं।

नदी के उसे पर अमित भटनागर को ले जाते आंदोलनकारी
नदी के उसे पर अमित भटनागर को ले जाते आंदोलनकारी

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने अमित भटनागर से अपील की कि वे बातचीत के लिए उनके पास आएं और आश्वासन दिया कि उनकी मांगों पर चर्चा की जाएगी। आंदोलनकारियों का कहना है कि इसी भरोसे पर कुछ लोग अमित भटनागर को प्रशासनिक अधिकारियों के पास लेकर पहुंचे। उनका आरोप है कि वहां किसी प्रकार का पाउडर या पदार्थ अमित भटनागर पर डाला गया, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे बेहोश हो गए। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इसी दौरान पुलिसकर्मियों ने उन्हें उठाकर अपने कब्जे में ले लिया। उनका यह भी आरोप है कि मौके पर मौजूद अन्य आंदोलनकारियों को भी बलपूर्वक वहां से हटाया गया और सत्याग्रह स्थल खाली करा दिया गया।

वहीं, प्रशासन का पक्ष इससे अलग है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि आंदोलनकारियों को समझाइश दी गई और उन्हें शांतिपूर्वक वहां से जाने के लिए कहा गया, जिसके बाद वे स्वयं वहां से चले गए। प्रशासन के अनुसार, आमरण अनशन पर बैठे अमित भटनागर की तबीयत खराब होने के कारण उन्हें उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

आंदोलनकारियों का आरोप पुलिस ने महिलाओं के साथ अभद्रता और मारपीट की
आंदोलनकारियों का आरोप पुलिस ने महिलाओं के साथ अभद्रता और मारपीट की

इस कार्रवाई के बाद कई दिनों से बराना नदी के किनारे चल रहा सत्याग्रह अचानक समाप्त हो गया। जहां एक दिन पहले तक पानी में बैठे आंदोलनकारी अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे, वहीं अगले दिन सुबह वही स्थान लगभग खाली दिखाई दिया।

कुछ घंटों पहले तक जहां गूंज रहे थे नारे, वहां अब सिर्फ पुलिस का पहरा था

जब द मूकनायक की टीम दोबारा आंदोलन स्थल पर पहुंची, तो कुछ ही घंटे पहले तक सैकड़ों आंदोलनकारियों से गुलजार रहा बराना नदी का किनारा पूरी तरह खाली नजर आया। निर्माणाधीन पुल के नीचे बिछी चटाइयां, बुझ चुके चूल्हों की राख और इधर-उधर पड़े संघर्ष के निशान इस बात की गवाही दे रहे थे कि यहां बीते 19 दिनों से एक बड़ा आंदोलन चल रहा था। लेकिन अब वहां सिर्फ पुलिसकर्मी तैनात थे। आंदोलनकारी वहां से हटाए जा चुके थे। कुछ देर पहले तक "न्याय दो" के नारों से गूंज रहा यह स्थान अचानक खामोश हो चुका था। उस सन्नाटे में बस बहती बराना नदी की आवाज सुनाई दे रही थी।

सिर पर गठरी, आंखों में आंसू और मन में सवाल...

जब द मूकनायक की टीम किशनगढ़ की ओर लौट रही थी, तब आंदोलन स्थल से करीब दो किलोमीटर दूर सड़क पर 10 से 12 महिलाएं पैदल जाती दिखाई दीं। उनके सिर पर कपड़ों, बर्तनों और रोजमर्रा के सामान की गठरियां थीं। कुछ घंटे पहले तक जो महिलाएं बराना नदी के पानी में बैठकर अपने अधिकारों के लिए सत्याग्रह कर रही थीं, अब वही महिलाएं चुपचाप अपने सिर पर अपना पूरा संसार उठाए आगे बढ़ रही थीं। उनके चेहरों पर थकान थी, आंखों में पीड़ा और मन में अनिश्चितता कि अब आगे क्या होगा।

आंदोलन स्थल से गाँव जाती आदिवासी महिलाएं
आंदोलन स्थल से गाँव जाती आदिवासी महिलाएंThe Mooknayak

इन्हीं महिलाओं में करीब 50 वर्षीय सीता बाई आदिवासी भी थीं। सिर पर भारी गठरी उठाए उन्होंने चलते-चलते द मूकनायक को बताया कि सुबह करीब छह से सात बजे के बीच बड़ी संख्या में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी आंदोलन स्थल पर पहुंचे। उनके अनुसार, पुलिस ने पूरे इलाके को चारों ओर से घेर लिया, जिससे आंदोलनकारियों में अफरा-तफरी मच गई। उन्होंने दावा किया कि डर के कारण सभी लोग नदी के उस पार चले गए। सीता बाई का आरोप है कि बाद में प्रशासन के लोगों ने बातचीत के बहाने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर को बुलाया और उन पर "पाउडर जैसी कोई चीज" डाली, जिसके बाद वे बेहोश हो गए। इसके बाद पुलिस उन्हें अपने साथ ले गई। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद आंदोलनकारियों को बलपूर्वक हटाया गया और कई लोगों के साथ मारपीट, बदसलूकी भी की गई।

द मूकनायक से बातचीत करती सीता बाई आदिवासी
द मूकनायक से बातचीत करती सीता बाई आदिवासी द मूकनायक

वहीं, एक अन्य आंदोलनकारी फूल कुँअर ने भी कार्रवाई के दौरान अपने साथ हुई घटना का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया, मुक्के मारे और जबरन आंदोलन स्थल से हटाया। भावुक होते हुए उन्होंने कहा, "सरकार ने पहले हमारी जमीन, घर और आजीविका छीन ली। अब जब हम अपना हक मांगने बैठे, तो हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया गया, हम कहां जाएं?"

सड़क पर सिर पर गठरी उठाए आगे बढ़ती ये महिलाएं सिर्फ अपना सामान नहीं, बल्कि विस्थापन, संघर्ष और अनिश्चित भविष्य का बोझ भी अपने साथ लिए चल रही थीं। कुछ घंटे पहले तक उनका ठिकाना बराना नदी के किनारे था, लेकिन अब उनके सामने फिर वही सवाल था- आखिर अब जाएं तो जाएं कहां?

समझिए पूरा मामला क्या है?

केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी ग्रामीणों का यह आंदोलन पुनर्वास, मुआवजे और कथित अनियमितताओं के विरोध में चल रहा था। आंदोलनकारी आरोप लगा रहे हैं कि परियोजना के लिए उनकी जमीन और मकान अधिग्रहित किए गए, लेकिन कई प्रभावित परिवारों को न तो उचित मुआवजा मिला और न ही संतोषजनक पुनर्वास की व्यवस्था की गई। इन्हीं मांगों को लेकर जय किसान संगठन के नेतृत्व में 3 जुलाई से सत्याग्रह और आमरण अनशन जारी था।

400 करोड़ के कथित भ्रष्टाचार का खुलासा होने से पहले हुई कार्रवाई!

आंदोलनकारी दिव्या अहिरवार ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि रविवार को जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर केन-बेतवा लिंक परियोजना सहित अन्य योजनाओं में करीब 400 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने वाले थे। दिव्या का दावा है कि इसी प्रस्तावित खुलासे से पहले सुबह तड़के पुलिस बल ने आंदोलन स्थल पर पहुंचकर कार्रवाई की और आंदोलनकारियों को वहां से हटा दिया। उनके अनुसार, यह कार्रवाई आंदोलन को दबाने और कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे को सामने आने से रोकने के उद्देश्य से की गई।

अस्पताल से भी अनशन जारी

पुलिस कार्रवाई के बाद अस्पताल में भर्ती कराए गए जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने अपने आंदोलन को जारी रखने की बात कही है। उनके अनुसार, प्रशासनिक कार्रवाई या हिरासत से उनका आंदोलन समाप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि वे न तो ड्रिप लगवाएंगे और न ही अन्न ग्रहण करेंगे। उनका कहना है कि यदि आवश्यकता पड़ी, तो वे जेल में रहते हुए भी अपना आमरण अनशन जारी रखेंगे।

आखिर सवाल सिर्फ मुआवजे का नहीं, भरोसे का भी है

बराना नदी के किनारे बैठे इन आदिवासी परिवारों की आंखों में सिर्फ जमीन खोने का दुख नहीं था, बल्कि उस भरोसे के टूटने की पीड़ा भी थी, जो उन्हें प्रशासन के आश्वासनों से मिला था। उनके लिए यह आंदोलन केवल मुआवजे की मांग नहीं, बल्कि सम्मान, पुनर्वास और न्याय की मांग है।

निर्माणाधीन पुल के नीचे बैठे इन लोगों के सामने एक ओर विकास परियोजना का ढांचा खड़ा हो रहा है, तो दूसरी ओर अपने उजड़ते जीवन की कहानी लिए सैकड़ों लोग न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सवाल यही है कि क्या विकास की इस यात्रा में इन आवाजों को भी सुना जाएगा, या ये आवाजें बरार नदी के बहते पानी में ही खो जाएंगी?

आसिफ, द मूकनायक
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