
सामान्यतया ये माना जाने लगा है कि इस दौर में दक्षिणपंथ अपने उभार पर है. मध्यवर्ती ताकतें भारी संकट में है, वाम दायरे भी बिखराव की ओर बढ़ रही हैं, दुनिया भर में नज़र डालने पर ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल भी जाते हैं, इन उदाहरणों को सामने रखकर दक्षिणपंथी विचारक हर दिन इस उभार को स्थापित करते रहते हैं, और सारे संकट के लिए वाम व मध्यवर्ती राजनीतिक ताकतों को टारगेट करते हैं, व उनके समर्थकों को हताशा के दलदल में धकेलते रहते हैं.
उदार नागरिकों व नागरिक आंदोलनों व उदार लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमले की बारंबारता में भारी वृद्धि साफ-साफ दिख भी रही है.
अलग-अलग मुल्कों में वर्तमान शासकों को ही राष्ट्र मान लेने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है, और इसी क्रम में शासकों के आलोचना को राष्ट्र की आलोचना मान लेने का चलन स्थापित किया जा रहा है.
फासीवाद अब नव फासीवाद में बदल गया है, लोकतंत्र को बहुमत की तानाशाही में परिवर्तित कर दिया गया है, यानि चुनाव होते रहते हैं और इसी के समानांतर अघोषित आपातकाल भी चलता रहता है, संसद बनी रहती है पर रोज़-रोज़ उसकी प्रासंगिकता भी ख़त्म होती रहती है, अदालतों को धीरे-धीरे उन शासकों के मातहत कर लेने की कोशिश वृहद पैमाने पर ज़ारी है, जिन्हें राष्ट्र मान लिया गया है, और उसी तरह पुलिस व सैन्य तंत्र, शासकों के नीजी सेना में बदलते जा रहे हैं.
ये जो नये तरह का राष्ट्र है वह अपने शासक को ईश्वरीय दर्जा देने के लिए बेताब दिखता है, उसे आलोचनाओं से परे कर दिया गया है, यह शासक कभी ईशा मसीह की तरह दिखने लगता है कभी वह खुद को नानबाइलोजिकल बताने लगता है.
इस नए राष्ट्र में जनता के अधिकारों पर नही कर्त्तव्यों पर जोर बढ़ता जा रहा है, और हक अधिकार को शासकों के दया के हवाले कर दिया गया है.
हालांकि युरोपीय राष्ट्र और एशियाई राष्ट्र के निर्माण का इतिहास अलग-अलग है पर अब इस फर्क को हम मिटते हुए देख रहे हैं,जो राष्ट्र कभी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए निर्मित हुए थे, वहां भी दुश्मन अब मुल्क के अंदर ही तलाशे जाने लगे हैं, सामराजी देश और साम्राज्यवाद से पीड़ित देश भी एक ही ढर्रे पर कुलांचे मारते साफ-साफ दिखने लगे हैं.
इस्लामोफोबिया वैश्विक नैरेटिव के बतौर स्थापित होता जा रहा है, लिंचिंग का विस्तार भी वैश्विक स्तर पर होता जा रहा है, MAGA या MIGA जैसी फाल्स टर्मोलाजी विकसित कर दी गई है, जिसके ज़रिए कही नस्लवादी घृणा को तो कहीं वर्णवादी घृणा को फिर से ताकतवर बनाया जा है.
और फिर इसके बल पर हर इलाके को फासीवादी हिंसा व अराजकता की ओर ढकेला जा रहा है. हर देश में देशभक्त और देशद्रोह की नई परिभाषा भी गढ़ी जा रही है, अब कौन देशभक्त है या नही है, यह बात अब संविधान नही तय करता, बल्कि सरकार, सत्ताधारी पार्टी और उसकी निजी सेनाएं तय करती हैं, और तथाकथित देशद्रोहियों को सजा देने का अधिकार भी अघोषित रूप से इन्हीं ताकतों के पास आ गया है.
हम सब आजकल पूरी दुनिया में सड़कों पर ही न्याय होते बार-बार देख रहे हैं, आप इसे माब लिंचिंग भी बोल सकते हैं, पर वो इसे करते समय न्यायाधीश की भूमिका में रहते हैं.
ऐसे में निष्कर्ष क्या निकाला जाए, क्या इस तरह के नाकारात्मक बदलाव को स्थायी मान लिया जाए, और क्या ये मान लिया जाए कि नव फासीवाद की जड़े गहरी हो गई हैं, जिन्हें अब उखाड़ा नही जा सकता है..
इसकी तलाश हमे नव उदारवादी ताकतों की कमज़ोरी या ताकत में तलाशनी चाहिए.
2008 से ही नव उदारवादी अर्थव्यवस्था, जिसका केंद्र अमेरिका है, भारी संंकट में है, और 2026 में भी इस संंकट से निजात नही मिला है, इस संकट से निपटने की प्रक्रिया में ही दुनिया भर में तानाशाहों का उभार हुआ है, जो तमाम लोकतांत्रिक बाधाओं को बेहिचक होकर ध्वस्त कर सके, ऐसा ही किया भी गया पर मसले का समाधान फिर भी नही मिल रहा है.
यानि टैरिफ वार, इरान वार, घनघोर इस्लामोफोबिया, नस्लवाद, वर्णवाद हिसंक जायोनिजम के बावजूद भी नव उदारवाद का संंकट बरकरार है.
और इसीलिए नव फासीवादी राजनीति के उभार के साथ ही संकटकालीन दौर भी शुरू हो चुका है.
इटली में मेलोनी जनमत संग्रह कराती है और हार जाती हैं, किसी तरह कुर्सी बच जाती है, हंगरी में स्थापित दक्षिणपंथी राजनेता को जनता चुनावों में परास्त कर देती है,
400 पार वाले मोदी 2024 में 240 पर चले आते हैं, हिंदुत्व के गढ़ यूपी में ही हार जाते हैं. मोदी ब्रांड बिकना कम हो रहा है, राष्ट्रवाद जैसे नैरेटिव की ट्रंप हवा निकालते जा रहे हैं.
ईरान युद्ध में लगातार मिलती असफलताओं के चलते,अमेरिका में भी ट्रंप की लोकप्रियता लगातार घट रही है, सर्वे बता रहे हैं कि MAGA समर्थकों का भी उत्साह कम हो रहा है, मध्यावधि चुनाव का सामना करना मुश्किल होता जा रहा है.
इसराइल में परिस्थितियां लगातार बदल रही है, नेतन्याहू अब तक के सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं, अजेय होने का भ्रम टूट गया है, या कहिए कि पहले हमास ने और अब ईरान ने नेतन्याहू के साख को संकट में डाल दिया है, जल्दी ही नेतन्याहू को चुनाव में जाना जहां उन्हें कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा.
यह भी ज़रूर सोचना पड़ेगा कि क्या केवल चुनावी झटके देकर दक्षिणपंथी उभार को फाइनली रोका जा सकता है?
ऐसा नही है, क्योंकि सत्ता केवल संसद में निहित नही है,सत्ता के कई और स्रोत हैं, जिन्हें केवल चुनावों के जरिए नही बदला जा सकता है. समाज संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर भी बढ़ते फासीवादी असर को अलग से एजेंडा बनाकर ही रोकना होगा.
पर यह भी समझना जरूरी है कि पहला और बेहद जरूरी पहल ये है कि चुनावों में इन ताकतों को एकजुट होकर परास्त किया जाए, यह किए बिना लड़ाई को एक-एक इंच आगे बढ़ाना मुश्किल होता जाएगा.
इस लिए चुनावी सफलता, न केवल व्यापक लोकतांत्रिक स्पेस के लिए जरूरी है बल्कि आज़ के दौर की पूंजीवादी दिवार को तोड़ने और भारत में फासीवादी उभार के मजबूत खम्भों, ब्राह्मणवादी व सांप्रदायिक ताकतों को शिकस्त देने की दिशा में भी एक अति आवश्यक क़दम साबित होगा.
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