पीएम डाल-डाल तो सुप्रीम कोर्ट पात-पात: कोर्ट ने कहा- ‘अनुच्छेद 370 की कार्रवाई की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है’

पीएम डाल-डाल तो सुप्रीम कोर्ट पात-पात: कोर्ट ने कहा- ‘अनुच्छेद 370 की कार्रवाई की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है’

गुरुवार को श्रीनगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कांग्रेस पर अनुच्छेद 370 पर जनता को भ्रमित करने का आरोप लगाया गया था. दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भी उसी दिन आई जिस दिन पीएम मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधा.

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर अनुच्छेद 370 के नाम पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाया. दूसरी तरफ उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रोफेसर के खिलाफ एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को राज्य द्वारा किए गए किसी भी फैसले की आलोचना करने का अधिकार है, जिसने उसने अपने व्हाट्सएप स्टेटस के माध्यम से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की आलोचना की थी।

पीएम मोदी और सुप्रीम कोर्ट के परस्पर टिप्पणी को एक संयोग भी कहा जा सकता है जो कहीं न कहीं प्रधानमंत्री मोदी के सियासी बयान को मद्धम बना रहा है. जहाँ एक ओर वह कांग्रेस पर 370 के नाम पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगा रहे हैं वहीं सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में नागरिकों को आलोचना करने का अधिकार बता रही है.  

प्रोफेसर जावेद अहमद हजाम पर सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्रोफेसर ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने पर अपने विचार व्यक्त करते हुए इसे जम्मू-कश्मीर के लिए "काला दिन" बताते हुए व्हाट्सएप स्टेटस लगाया था।

उनके व्हाट्सएप स्टेटस में कहा गया था, "5 अगस्त जम्मू-कश्मीर के लिए काला दिन है" और "14 अगस्त-?हैप्पी इंडिपेंडेंस डे पाकिस्तान।"

मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने एक और बात कही कि, प्रत्येक नागरिक को दूसरे देशों के नागरिकों को शुभकामनाएं देने का अधिकार है। इसमें कहा गया है कि अगर कोई भारतीय नागरिक पाकिस्तान के नागरिकों को उनके स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं देता है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा, "भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। उक्त गारंटी के तहत, प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की कार्रवाई की आलोचना करने या, उस मामले के लिए, राज्य के हर फैसले की आलोचना करने का अधिकार है. उन्हें यह कहने का अधिकार है कि वह राज्य के किसी भी फैसले से नाखुश हैं.''

शीर्ष अदालत ने कहा कि, “वैध तरीके से असहमति का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत गारंटीकृत अधिकारों का एक अभिन्न अंग है और प्रत्येक व्यक्ति को इसका सम्मान करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के असहमति के अधिकार का सम्मान करना चाहिए। सरकार के फैसलों के खिलाफ शांतिपूर्वक विरोध करने का अवसर लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है।"

वर्तमान मामले में, अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता प्रोफेसर हाजम ने अपने बयानों में किसी भी सीमा को पार नहीं किया है। कुछ व्यक्तियों के बीच भावनाएं भड़काने की संभावना अपीलकर्ता के शब्दों के प्रभाव को आंकने का आधार नहीं हो सकती।

"हम कमजोर और अस्थिर दिमाग वाले लोगों के मानकों को लागू नहीं कर सकते, हमारा देश 75 वर्षों से अधिक समय से एक लोकतांत्रिक गणराज्य रहा है," शीर्ष अदालत ने कहा.

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान द्वारा गारंटीकृत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा के बारे में पुलिस को शिक्षित और प्रबुद्ध करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। इसने कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए संविधान में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में पुलिस को संवेदनशील बनाने का आग्रह किया।

370 पर पीएम मोदी

श्रीनगर में प्रधानमंत्री ने “विकसित भारत, विकसित जम्मू-कश्मीर” कार्यक्रम के तहत करोड़ों रुपए की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया. उन्होंने कहा कि, कुछ परिवारों के फायदे के लिए जम्मू-कश्मीर को जंजीरों में जकड़ दिया गया था. आज जब 370 नहीं है तो जम्मू-कश्मीर के युवाओं की प्रतिभा का पूरा सम्मान हो रहा है, उन्हें नए अवसर मिल रहे हैं. जम्मू-कश्मीर की आवाम ये सच्चाई जान चुकी है कि उनको गुमराह किया गया था. 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, पाकिस्तान से आए शरणार्थी, वाल्मीकि समुदाय समेत अन्य लोगों को मताधिकार का अधिकार 70 साल तक नहीं मिला, वो अब मिला है. अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर आज विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है क्योंकि वह आज खुल कर साँस ले रहा है. ये नया जम्मू-कश्मीर है, जिसका इन्तजार हम सभी को कई दशको से था.

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