Lok Sabha Elections 2024: मध्य प्रदेश में मुस्लिम समुदाय को क्या मिलेगा राजनीतिक प्रतिनिधित्व?

आखिरी मुस्लिम सांसद असलम शेर 80 के दशक में रहे, 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक भी टिकट मुस्लिम को नहीं दिया।
Lok Sabha Elections 2024: मध्य प्रदेश में मुस्लिम समुदाय को क्या मिलेगा राजनीतिक प्रतिनिधित्व?
Courtesy-Internet

भोपाल। देश में आम चुनाव की तैयारी जोरों पर हैं, अगले कुछ दिनों में ही राजनीतिक पार्टियां प्रत्याशियों का ऐलान भी करना शुरू कर देंगी। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर मध्य प्रदेश में राज्य के दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी अपने उम्मीदवारों की सूची अगले माह तक जारी कर सकती हैं। चुनाव को देखते हुए दोनों ही प्रमुख पार्टियां सभी वर्गों को साधने में लगी हुई हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की जनसंख्या में 7 प्रतिशत की भागीदारी रखने वाले मुस्लिम समुदाय के नेताओं को शायद ही भाजपा-कांग्रेस किसी सीट से अपना उम्मीदवार बनाएं!

मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों पर साल 2019 के आम चुनावों में भाजपा-कांग्रेस ने किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था। साथ ही 2023 के विधानसभा में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। लिहाजा इस बार जिस तरह देश में हिंदुत्व का वातावरण तैयार हुआ है, राजनीतिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि उस हिसाब से दोनों ही पार्टियां मुस्लिम समाज के लोगों को टिकट नहीं देंगी।

हाल ही में मध्यप्रदेश में 230 सीटों पर हुए विधानसभा चुनावों में भी भाजपा कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवारों के टिकट में कटौती की है। 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने दो मुस्लिम नेताओं को टिकट दिए थे, जबकि भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया।

मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व घटा

आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनावों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटा है। गत सात विधानसभा चुनावों में, केवल 9 मुस्लिम विधायक चुनाव जीते हैं और 2018 के चुनाव से पहले के तीन चुनावों में भी, एकमात्र मुस्लिम विधायक मध्य प्रदेश विधानसभा पहुँचे थे।

मध्य प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों पर पिछले तीन बार से भाजपा-कांग्रेस ने मुस्लिमों को टिकट नहीं दिए। साल 2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में मुस्लिमों को टिकट नहीं दिया गया। प्रदेश से आखिरी मुस्लिम सांसद, असलम शेर खान ही रहे हैं और वो भी 80 के दशक में। उनके बाद फिर कभी कोई मुसलमान प्रत्याशी लोकसभा में मध्य प्रदेश से निर्वाचित नहीं हो पाया।

द मूकनायक से बातचीत करते हुए मध्य प्रदेश कांग्रेस के मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता अब्बास हफीज ने कहा - "विधानसभा, लोकसभा सीटों के परिसीमन के चलते जातीय समीकरण के आधार पर प्रत्याशियों का चयन होता है। इस बार कांग्रेस ने दो मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था। मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में परिसीमन जिम्मेदार है।"

इधर, बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने द मूकनायक से बातचीत करते हुए कहा- "भारतीय जनता पार्टी प्रतिशत के आधार पर टिकट नहीं देती, पार्टी का संसदीय बोर्ड फैसला करता है। टिकट गुणदोष और आवश्यकता के आधार पर तय होता है। ये जो लोग जिन्होंने प्रतिशत गिना, और इसकी बात करते हैं, उन्हीं लोंगो ने इस परसेंटेज वालों का विकास नहीं किया।"

जब हमने बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी से पूछा कि 2023 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया, क्या लोकसभा में टिकट देंगे? इस पर आशीष अग्रवाल ने कहा संसदीय बोर्ड तय करेगा।

2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 6.57 प्रतिशत है। राज्य में लगभग 50 लाख मुस्लिम हैं। मध्य प्रदेश के 19 जिलों में मुस्लिम आबादी एक लाख से अधिक है। साथ ही राज्य की करीब दो दर्जन सीटों पर मुसलमानों की अच्छी खासी मौजूदगी है, जिनमें करीब एक दर्जन सीटों पर वह निर्णायक भूमिका में हैं।

मध्य प्रदेश विधानसभा सीटों जैसे इंदौर-1, इंदौर-3, उज्जैन, जबलपुर, खंडवा, रतलाम, जावरा, ग्वालियर, शाजापुर, मंडला, नीमच, महिदपुर, मंदसौर, इंदौर-5, नसरुल्लागंज, इछावर, आष्टा और उज्जैन दक्षिण में मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या के कारण राजनीतिक प्रभाव है।

2018 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने भोपाल की एक सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार फातिमा सिद्दीकी को टिकट दिया था, वहीं कांग्रेस ने तीन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार आरिफ अकील-भोपाल उत्तर, मुसर्रत शाहिद-सिरोंज, आरिफ मसूद-भोपाल मध्य से टिकट दिया था।

दिग्विजय सरकार ने प्रतिनिधित्व देने का किया था प्रयास

वर्ष 1993 में कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह पहली बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उस वक्त छत्तीसगढ़ राज्य का गठन नहीं हुआ था, अविभाजित मध्य प्रदेश की विधानसभा में 320 सीटें हुआ करती थीं। उस साल के चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ था जब उस समय भारत के ‘सबसे बड़े राज्य’ की विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक निर्वाचित नहीं हुआ था।

तब दिग्विजय सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में एक मुस्लिम चेहरे को जगह दी थी। उनका नाम था इब्राहिम कुरैशी, लेकिन कुरैशी विधायक नहीं थे और छह महीनों के अंदर वो कोई चुनाव भी नहीं जीत सके थे इसलिए उन्हें पद से हटना पड़ा था।

वरिष्ठ पत्रकार नितिन दुबे कहते हैं, ‘मुस्लिम प्रतिनिधित्व लोकसभा और राज्यों के विधानसभाओं में लगातार गिरता जा रहा है. इसको लेकर किसी को चिंता नहीं है. इसके जो भी कारण हों लेकिन यह बहुत खराब है. लोकतंत्र में किसी भी समुदाय को भागीदारी या हिस्सेदारी न मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है. एक तरीके से यह लोकतंत्र का मखौल उड़ाता है. लोकतंत्र में संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व होना चाहिए. लेकिन अब समस्या है कि जीत ही सबकुछ तय कर रही है.’

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