लोकसभा चुनाव 2024: रोजगार के लिए 'पलायन' जानिए क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?-ग्राउंड रिपोर्ट

हरदोई और मिश्रिख संसदीय क्षेत्र के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात व महाराष्ट्र राज्यों में रोजगार की तलाश में पलायन करते है। इन जगहों पर मजदूरों का शारीरिक व आर्थिक शोषण होता है। इसके बावजूद चुनाव में पलायन कोई मुद्दा नहीं है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिली राशि से संयुक्त परिवार के रहने के लिए बनाया घर.
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिली राशि से संयुक्त परिवार के रहने के लिए बनाया घर. तस्वीर- सत्य प्रकाश भारती, द मूकनायक

सीतापुर/हरदोई ( उत्तर प्रदेश)। "तुम दोनों कमाने अहमदाबाद चले जाओ। घर चलाने में समस्या हो रही है। बाहर काम करके थोड़ा आमदनी हो जायेगी। घर को चलाने में मदद मिलेगी।"- यह कहते हुए कुलदीप कुमार ने अपने दोनों भाइयों को पास के स्टेशन के लिए विदा किया, यहां से उसके दोनों भाई साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन लेकर अहमदाबाद के लिए रवाना हो गए। कुलदीप ने भी कई सालों तक अहमदाबाद में रहकर काम किया, लेकिन बढ़ती महंगाई के चलते पैसों की बचत नहीं कर पाया।

सबसे पहले कुलदीप ने लखनऊ में एक दर्जी की दुकान पर रहकर काम किया। वह समय-समय पर घर पैसा भेजा करते थे। तीन साल तक बतौर दूसरे की दुकान पर काम करने के बाद कुलदीप चाहते थे कि वह खुद का काम करें, लेकिन सिलाई मशीने काफी महंगी थी। पैसा घर भी भेजना था। ऐसे में वह अपने सपनों को पूरा नहीं कर सके।

लखनऊ में काम छोड़कर वह गुजरात के अहमदाबाद में गुटखा (पान मसाला) बनाने वाली फैक्ट्री में काम करने लगे। कुछ समय बाद कुलदीप की शादी हो गई। शादी के बाद अपनी पत्नी को भी लेकर वह अहमदाबाद रहे और काम किया। एक साल बाद बेटी हुई,सब कुछ ठीक चल रहा था। शादी के सात साल बाद तक भी अहमदाबाद में काम किया।

इसबीच गांव में पिता को "प्रधानमंत्री आवास योजना" के तहत एक आवास मिला। योजना की राशि इतनी कम थी कि तीन अविवाहित बेटों और एक अविवाहित बेटी सहित कुलदीप के माता-पिता के रहने योग्य अच्छी गुणवत्ता वाला घर (मकान/आवास) बन पाना मुश्किल था। ऐसे में कुलदीप ने कमाकर जोड़ा हुआ पैसा घर के निर्माण के लिए भेज दिया। एक पक्का घर बनाने के लिए दीवारें खड़ा कर दीं। पीएम आवास योजना के अनुसार एक कमरे पर छत भी डाल दी, लेकिन शेष मकान अधूरा बना पड़ा है।

मार्च 2020 तक सबकुछ ठीक ही चल रहा था। अचानक देश के प्रधानमंत्री ने कोरोना के कारण लाकडाउन की घोषणा कर दी। सब जगह बसों और ट्रेनों के पहिये थम गए। कुलदीप का परिवार भी अहमदाबाद में फंस गया। किसी तरह वह 12 हजार की एक गाडी बुक करके अपनी पत्नी और बेटी को लेकर अपने गांव पहुंचे। जिसके बाद उन्होंने दोबारा परिवार को लेकर कभी इतना दूर जाने की नहीं सोची। गांव में रहकर उन्होंने घर की खेती का काम संभाला।

कुलदीप की पत्नी भी स्वयं सहायता समूह से जुड़ गई। कार्यकुशलता को देखते हुए कुलदीप की पत्नी प्रीती को बैंक सखी भी बना दिया गया। उन्होंने केंद्र सरकार की "आत्मनिर्भर" योजना के तहत लोन दिलवाना शुरू किया। कुलदीप खेती का काम करते हैं,बाकी समय कुलदीप स्वयं सहायता समूह के कामों में प्रीती की मदद करते थे।

प्रीती चाहती थी कि उनके पति भी कोई काम करें और वह भी छोटा मोटा रोजगार कर लें। ऐसे में प्रीती ने स्वयं सहायता समूह और बैंक की मदद से आत्मनिर्भर बनने के लिए लोन के लिए आवेदन किया। चूंकि प्रीती खुद बैंक सखी थी ऐसे में उन्हें लोन लेने में ज्यादा अड़चने नहीं आई। प्रीती को एक लाख अस्सी हजार का लोन मिल गया।

इस पैसे से प्रीती ने एक ब्यूटी पार्लर खोल लिया और कुलदीप को दो ऑटोमैटिक सिलाई मशीन दिलवाई। लेकिन गांव में लाईट की समस्या थी। ऐसे में एक इन्वर्टर भी खरीदना पड़ा। शुरुआत में सारा काम घर पर ही शुरू किया। लेकिन गांव में विशेष आमदनी नहीं हुई। ऐसे में कुलदीप को एक हजार रुपया महीना पर गांव के बाजार में दुकान लेनी पड़ी। अब किसी तरह काम चल रहा है, लेकिन महंगाई के बीच खर्च इतना बढ़ गया है कि लोन की किश्त और घर का खर्च चला पाना मुश्किल है।

पिता के घर में आत्मनिर्भर योजना के तहत मिले लोन से खरीदी मशीन पर काम करते कुलदीप.
पिता के घर में आत्मनिर्भर योजना के तहत मिले लोन से खरीदी मशीन पर काम करते कुलदीप.तस्वीर- सत्य प्रकाश भारती, द मूकनायक

यह कहानी हरदोई जिले के संडीला तहसील के कोथावां ब्लॉक के कमलापुर के रहने वाले कुलदीप कुमार गौतम और उनके परिवार की है। कुलदीप अपने परिवार में तीन भाई और दो बहन हैं। एक बहन की शादी हो चुकी है। घर में बुजुर्ग माता-पिता भी हैं जो पेशे से किसान हैं।

कुलदीप की एक बहन और दो भाइयों की शादी अभी बाकी है। द मूकनायक को अपनी पीड़ा बताते हुए कुलदीप कहते हैं-"इस समय खर्च बहुत बढ़ा हुआ है। हर महीने लोन की 12 हजार रुपया किश्त भी जाती है। बहन की शादी के लिए भी पैसा जोड़ना है। घर की छत्त भी डलवानी है। बेटी स्कूल में पढ़ रही है। उसकी स्कूल की फीस, घर का खर्चा है। कभी-कभी समझ नहीं आता कि पैसा कहाँ से लाऊँ?'

नहीं मिला प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ

कुलदीप बताते हैं- "मेरी शादी हो गई है। मेरा अपना परिवार है। मेरे पिता को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास का लाभ मिला है, लेकिन एक अच्छा घर बनाने के लिए मिलने वाली राशि उचित नहीं होती। ऐसे में मैंने अपना जोड़ा हुआ पैसा भी घर के निर्माण के लिए दे दिया। घर की छत तक नहीं बन सकी है न ही उसमें जीना बन पाया है। यह तो उनका घर है,मुझे तो अभी तक इस सरकारी सुविधा का लाभ नहीं मिल सका है।"

कुलदीप को पिता द्वारा घर बनाने के लिए जमीन मिल गई,लेकिन पीएम आवास योजना का लाभ नहीं मिला.
कुलदीप को पिता द्वारा घर बनाने के लिए जमीन मिल गई,लेकिन पीएम आवास योजना का लाभ नहीं मिला.तस्वीर- सत्य प्रकाश भारती, द मूकनायक

कुलदीप कहते हैं- "यूपी में कोई रोजगार नहीं है। ऐसे में गांव के जवान लड़के कमाने के लिए दिल्ली और अहमदाबाद जाते हैं। रोजगार एक बड़ी समस्या है। मैं भी चाहता हूँ कमाने के लिए बाहर जाऊं, लेकिन लॉकडाउन में जो हुआ उसे सोचकर परिवार के साथ अब बाहर जाने से भी डर लगता है।"

प्रीती कहती हैं-"सरकार की योजना का लाभ लेना आसान है, लेकिन इस महंगाई में उससे पैसे कमाकर तरक्की कर लेना कठिन है। बैंक से लिए गए लोन को चुकाने के लिए क़िस्त बहुत ज्यादा है। कई बार महीने में ज्यादा बिक्री नहीं होती है। सिलाई-कढ़ाई और बुनाई के कार्य में काफी समय देना पड़ता है। ब्यूटी पार्लर का काम भी शादी-विवाह के समय में ही चलता है। ऐसे में अधिक आमदनी नहीं हो पाती। संयुक्त परिवार में कई जरूरतों को पूरा करना और बच्चों को पढ़ना इस महंगाई भरे दौर में मुश्किल काम है।"

बेरोजगारी और महंगाई बढ़ी

2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर कुलदीप कहते हैं-"अशोक रावत 2019 में कई चुनावी वादे लेकर आये थे। जिसमें गांव के विकास के लिए तमाम दावे किये थे। लेकिन उनके खुद के लैटर लिखने के बावजूद क्षेत्र में बिजली की समस्या बरकरार है। यह तो चुनाव का समय है इसलिए समय बढ़ गया है,वरना सिर्फ 12 घंटे ही बिजली आती है।"

चुनाव आते ही बनी गांव की सड़क

कुलदीप बताते हैं-'पांच साल में गांव में कोई विकास का काम नहीं हुआ। लेकिन 2024 का चुनाव आने से पहले गांव की कई सड़कों का निर्माण तेजी से हुआ। मेरे घर के सामने के खड़ंजे को भी उखाड़कर रातों-रात पत्थर पिछाये गए,लेकिन अभी इंटलॉकिंग और नाली का काम बाकी है।

गांव में आधी बनी हुई सड़क,इंटरलॉकिंग का काम अभी बचा हुआ है.
गांव में आधी बनी हुई सड़क,इंटरलॉकिंग का काम अभी बचा हुआ है. तस्वीर- सत्य प्रकाश भारती, द मूकनायक

सीतापुर में चीनी मिल,फिर भी बेरोजगार

पास के ही जिले सीतापुर में चीनी मिल के ठीक पीछे शंकरपुर गांव में रहने वाले महेंद्र भी कुलदीप की तरह काम की तलाश में अम्बाला चले गए। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि चीनी की फैक्ट्री होने के बावजूद काम करने के लिए बाहर जाते हैं। महेंद्र कहते हैं- "फैक्ट्री में जल्दी काम नहीं मिलता है। अगर काम मिल भी गया तो दिहाड़ी बहुत ही कम मिलती है, जबकि अम्बाला में दोगुनी दिहाड़ी मिलती है। इसलिए हम काम करने वहां जाते हैं।"

आज इन स्थानों पर चुनाव होने हैं। मूलरूप से ग्रामीण इलाका होने के कारण यहां के बाशिदों को दिल्ली में बैठने वाली सरकार या उनके सांसद क्या कुछ दे सकते हैं,इसकी जानकारी तक नहीं है। इन क्षेत्रों में रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। इसके बावजूद सरकारों ने इस क्षेत्र में कोई ठोस काम नहीं किया। यह इलाके भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की दृष्टि से काफी बहुमूल्य है, जिन्हे हैरिटेज के रूप में विकसित कर क्षेत्रीय युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जा सकते हैं।

2011 की जनगणना के मुताबिक़ हरदोई जिले की जनसंख्या 4,091,380 है। यह लगभग लेबनान नामक देश की कुल जनसंख्या अथवा अमेरिकी राज्य औरिगन के बराबर है। आबादी की दृष्टि से भारत में हरदोई का 51वाँ (भारत के 640 जिलों में) स्थान है। जनसंख्या घनत्व के हिसाब से हरदोई में 683 प्रत्येक वर्ग किलोमीटर में व्यक्ति निवास करता है।

2001-2011 में जनसंख्या वृद्धि दर 20.39% थी। हरदोई का लिंगानुपात प्रति एक हजार पुरूष पर 856 महिलाएँ है एवं साक्षरता दर 68.89% है। वर्ष 1901 में हरदोई की जनसंख्या 1,092,834 थी और हरदोई नगर के निवासियों की संख्या 12,174 थी। एक अनुमान के मुताबिक पूरे हरदोई से लगभग एक लाख से ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में दिल्ली,अम्बाला हरियाणा,पंजाब,चंडीगढ़ सहित गुजरात के विभिन्न जिलों में रोजगार करने जाते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ नौ साल पहले हरदोई जिले के प्रत्येक पंचायतों में पलायन करने वाले मजदूरों की पलायन पंजी अनिवार्य रूप से रखने के निर्देश कलेक्टर ने दिए थे। कलेक्टर ने प्रतिमाह की 5 तारीख तक पलायन करने वाले मजदूरों की संख्यात्मक जानकारी सरपंच व सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर के साथ देने के आदेश जारी किये थे। हालांकि इन निर्देशों का आज तक पालन नहीं हुआ।

इधर, 2011 जनगणना के मुताबिक़ सीतापुर में 4,483,992 की जनसंख्या थी,जिसमें पुरुष और महिलाएं क्रमशः 2,375,264 और 2,108,728 थीं। आबादी 3,6 9, 661 थी, जिसमें पुरुष 1,941,374 और शेष 1,678,287 महिलाएं थीं। सीतापुर जिला आबादी कुल उत्तर प्रदेश की आबादी का 2.24 प्रतिशत है।

हरदोई में 30 लाख मतदाता

हरदोई जनपद के 30 लाख 17 हजार मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। हरदोई लोकसभा में लगभग 19 लाख मतदाता हैं। जिसमें 10 लाख के करीब पुरुष और 9 लाख के करीब महिला मतदाता हैं। हरदोई सुरक्षित लोकसभा से भारतीय जनता पार्टी ने अपने मौजूदा सांसद जय प्रकाश रावत को अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं, समाजवादी पार्टी ने पूर्व सांसद ऊषा वर्मा को प्रत्याशी बनाया है, बहुजन समाज पार्टी ने विधान परिषद के सदस्य भीमराव अंबेडकर को अपना प्रत्याशी बनाया है।

मिश्रिख में 18 लाख मतदाता

सीतापुर की मिश्रिख लोकसभा में 18 लाख 74 हजार मतदाता हैं। मिश्रिख से भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद अशोक रावत को मैदान में उतारा है। वहीं समाजवादी पार्टी ने मिश्रिख विधानसभा के रहने वाले पूर्व मंत्री रामपाल राजवंशी की बहू संगीता राजवंशी को प्रत्याशी बनाया है। बसपा से बीआर अहिरवार मैदान में हैं। हरदोई जिले में मतदान के लिए 13,312 कर्मियों को लगाया गया है।

गंभीर अपराध की श्रेणी में

ग्रामीण क्षेत्र में लेबर ठेकेदार भी सक्रिय है। भोले-भाले ग्रामीण को ज्यादा पैसे देने के प्रभोलन देकर वे परदेश ले जाते है। वहां जाने के बाद किसी ईट भट्‌ठा में छोड़कर उसको उनके हालात में छोड़कर आ जाते है। जिससे ग्रामीण मजदूर बंधक बन जाते है। एक श्रम पदाधिकारी के अनुसार यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। अभी जिले में फिलहाल पांच लेबर ठेकेदार धारा 370 मानव तस्करी के तहत जेल में बंद हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिली राशि से संयुक्त परिवार के रहने के लिए बनाया घर.
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