चंपई सोरेन.
चंपई सोरेन.

झारखंड में जाति आधारित जनगणना को CM चंपई सोरेन की मंजूरी, लिखा- "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी..."

बिहार में हुई जातीय जनगणना की शुरुआत से ही झारखंड में भी इसकी मांग होने लगी थी। झारखंड विधानसभा के पटल पर कई विधायकों ने जातीय जनगणना की मांग की थी। आजसू, कांग्रेस, राजद समेत कई राजनीतिक दल ने राज्य में जाति आधारित जनगणना कराने के पक्ष में है और सदन में इसकी मांग कर चुके हैं।

नई दिल्ली। बिहार के बाद अब झारखंड में भी जातीय जनगणना होगी। राज्य के मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने राज्य में जातीय जनगणना कराने की मंजूरी दे दी है। झारखंड में जातीय जनगणना का कार्य कार्मिक विभाग के ज़िम्मे होगा। CM चंपई सोरेन ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर ट्वीट कर कहा, "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी..."

इसके लिए कार्मिक विभाग की ओर से जल्द ही एक प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य सरकार के इस कदम को एक बड़ा दांव बताया जा रहा है।

बता दें कि बिहार में हुई जातीय जनगणना की शुरुआत से ही झारखंड में भी इसकी मांग होने लगी थी। झारखंड विधानसभा के पटल पर कई विधायकों ने जातीय जनगणना की मांग की थी। आजसू, कांग्रेस, राजद समेत कई राजनीतिक दल ने राज्य में जाति आधारित जनगणना कराने के पक्ष में है और सदन में इसकी मांग कर चुके हैं।

मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के प्रधान सचिव विनय कुमार चौधरी ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा, “कार्मिक विभाग झारखंड में सर्वे करने के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिड्यूर (एसओपी) तैयार करेगा। इसके बाद इसे मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। जिस तरह पड़ोसी राज्य बिहार में जातीय जनगणना कराई गई थी उसी पैटर्न पर झारखंड में यह जनगणना की जाएगी। बिहार में पिछले 2 सालों में 7 जनवरी से लेकर 2 अक्टूबर तक का डेटा जुटाया गया था।”

विनय कुमार चौधरी ने कहा कि जातीय जनगणना कराने के लिए ग्रामीण और कल्याण विभाग पर भी चर्चा की गई थी लेकिन अंत में सर्वे कराने के लिए कार्मिक विभाग का नाम फाइनल किया गया है। झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस-राजद गठबंधन की सरकार है और इस महागठबंधन के विधायक समय-समय पर विधानसभा में जातीय जगणना की मांग उठाते रहे हैं। इससे पहले कांग्रेस के सीनियर लीडर राहुल गांधी ने भी अपने भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान जातीय जनगणना कराए जाने की वकालत की थी। वहीं, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी जातीय जनगणना का समर्थन कर चुके हैं।

जातीय जनगणना के क्या फायदे?

प्रत्येक दस साल के अंतराल में होने वाली भारत की जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों पर आँकड़े प्रकाशित किये जाते रहे हैं लेकिन इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) और अन्य समूहों की आबादी से जुड़े आँकड़े उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं। भारत के कई हिस्सों में जाति-आधारित भेदभाव अब भी प्रचलन में है। ऐसे में जातिगत जनगणना वंचित समूहों की पहचान करने और उन्हें नीति निर्माण की मुख्यधारा में लाने में मदद कर सकती है।

जातिगत जनगणना अलग-अलग जाति समूहों के वितरण को समझकर, सामाजिक असमानता को दूर करने और हाशिये के समुदायों के विकास के लिए नीतियों को बनाकर लागू किया जा सकता है। इसके जरिए नीति निर्माताओं को ऐसी नीतियां बनाने में मदद कर सकती है जो उनकी जरूरतों को पूरा करे और समावेशी विकास को बढ़ावा दे सके।

जातिगत जनगणना से सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने वाली आरक्षण जैसी नीतियों के जमीनी स्तर पर होने वाले प्रभाव के मूल्यांकन में भी मदद मिलेगी। क्योंकि आँकड़ों के अभाव में यह काम काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

भारत के संविधान में भी जातिगत जनगणना कराने का पक्ष लिया गया है। अनुच्छेद 340 सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जाँच करने और इस बारे में सरकारों द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में सिफ़ारिशें करने के लिये एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान करता है। हालांकि, मौजूदा केन्द्र सरकार जातिगत जनगणना की पक्षधर नहीं है। वर्ष 2021 में लोकसभा में सरकार की ओर से कहा गया था कि नीतिगत तौर पर जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के अलावा अन्य जातिगत आबादी की गणना नहीं करने का निर्णय लिया है।

झारखंड में जातीय जनगणना का क्या असर होगा?

जाति जनगणना पर ‘द मूकनायक’ से बातचीत करते हुए राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की प्रवक्ता कंचना यादव कहती हैं, “हजारों साल से चली आ रही वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था तले भारत में एक बड़ी आबादी जिसे हम बहुजन आबादी कहते हैं वह पीछे धकेल दी गई। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तन के लिए तमाम क्रांतियाँ हुईं। बाबा साहब भीम राव आंबेडकर द्वारा लिखा गया संविधान बहुजनों द्वारा क्रांति के एक दस्तावेज की तरह देखा जाना चाहिए। क्योंकि उसमें ओबीसी, एससी और एसटी का हित समाहित है। एक क्रांति मंडल आयोग की 2 सिफारिश को लागू होने के बाद आई जिसमें ओबीसी को सरकारी नौकरियों में और शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण दिया गया।”

लेकिन यह क्रांति 1931 के जातिगत जनगणना के आधार पर था। आज ओबीसी, एससी और एसटी की क्या स्थिति है उसे बताने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के पास कोई आंकड़ा नहीं है। तेजस्वी यादव जब महागठबंधन सरकार में थे तो बतौर उपमुख्यमंत्री उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जाति आधारित गणना राज्य सरकार के कोष पर कराने का दबाव बनाया। भाजपा शाषित केंद्र सरकार जाति आधारित गणना को रोकने के लिए तमाम प्रयास की लेकिन जाति आधारित गणना हुआ। उन अफवाहों पर पूर्ण विराम लगा जो तमाम न्यूज़ चैनल और बीजेपी नेताओं द्वारा फैलाया गया कि इससे जातिवाद फैलेगा।

न सिर्फ पूर्ण विराम लगा बल्कि ओबीसी, एससी, एसटी का आरक्षण भी बढ़ा। 94 लाख गरीब परिवारों को 2-2 लाख रूपये देने का प्रावधान भी किया गया ताकि वह असंगठित क्षेत्र में खुद का कार्य शुरू कर सकें। महागठबंधन की सरकार बीजेपी द्वारा गिराई नहीं गई होती तो बिहार का रूप बदल देने वाले तमाम कार्य किए गए होते। समय आने पर और सरकार बदलने पर वह कार्य भी होंगे। यह सब तभी संभव हो पाया क्योंकि बिहार में महागठबंधन सरकार ने जातिगत गणना कराई।

आगे वह जोड़ती हैं, “हाल ही में झारखंड सरकार ने भी जातिगत गणना कराने का एलान किया है, जो बहुत ही सराहनीय है। जातिगत गणना किसी भी राज्य के विकास में खासकर ओबीसी, एससी और एसटी को मुख्यधारा में लाने में अहम् भूमिका निभाएगी। ऐसा फैसला जो 80% आबादी की जीवन को बदलने की क्षमता रखता हो, मैं मानती हूँ कि सबसे बड़ा क्रांतिकारी फैसला होता है।”

झारखंड में होने वाले जाति जनगणना के बारे में बात करते हुए झारखंड जनाधिकार महासभा के सदस्य अंबिका यादव कहते हैं, “जाति जनगणना होने से योजनाएँ पिछड़ों के हित में बनेगी, उन्हें उनका हक़ और आरक्षण मिल पाएगा। बिना आकड़ों के काम करना, हवा में बात करने जैसा है। मैं समझता हूँ झारखंड में जाति जनगणना का फ़ैसला एक बड़ा कदम है, यह प्रदेश का परिदृश्य बदल देगी।”

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