अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस: डॉ. आंबेडकर ने श्रमिकों को क्यों पढ़ाया राजनीति का 'ककहरा'?

भारत देश को आजादी मिलने से पहले 1936 में इंडिपेंड लेबर पार्टी का किया था गठन, श्रमिक हितों के लिए मजदूरों को किया था एकजुट, लेबर मिनिस्टर रहते श्रमिक हित में किए थे कई बड़े काम।
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर.
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर. फोटो- द मूकनायक

नई दिल्ली: आज अंतराष्ट्रीय मजदूर दिवस है और दुनिया भर के मजदूर इस दिन का जश्न मना रहे हैं। प्रजातंत्र की मां (मदर ऑफ डेमोक्रेसी) कहे जाने वाले भारत में यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस समय यहां आम चुनाव 2024 का आयोजन हो रहा है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि देश में श्रमिकों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए किन पुरोधाओं ने प्रयास किए। द मूकनायक की पड़ताल में सामने आया कि श्रमिकों को राजनैतिक अधिकार और हैसियत व श्रम अधिकारों को सुनिश्चित करने में बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवनकाल में महती काम किया था। चलिए समझते हैं कैसे...

बाबा साहब ने बनाई लेबर पार्टी

देश को आजादी मिलने से पहले बाबा साहब ने 15 अगस्त 1936 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की थी, उसके टिकट पर वे निर्वाचित हुए थे और 7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व भी डॉ. आंबेडकर ने किया। इस हड़ताल के बाद सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मजदूरों का आह्वान किया कि मजदूर मौजूदा लेजिस्लेटिव काउंसिल में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सत्ता अपने हाथों में ले लें। 7 नवंबर की हड़ताल से पहले 6 नवंबर 1938 को लेबर पार्टी द्वारा बुलाई गई मीटिंग में बड़ी संख्या में मजदूरों ने हिस्सा लिया। आंबेडकर स्वयं खुली कार से श्रमिक क्षेत्रों का भ्रमण कर हड़ताल सफल बनाने की अपील कर रहे थे।

डॉ. आंबेडकर ने  7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व  किया था।
डॉ. आंबेडकर ने 7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया था।

ये हड़ताल डॉ. आंबेडकर ने मजदूरों के हड़ताल करने के मौलिक अधिकार की सुरक्षा के लिए बुलाई थी। सितंबर 1938 में बम्बई विधानमंडल में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने औद्योगिक विवाद विधेयक प्रस्तुत किया था। इस विधेयक के तहत कांग्रेसी सरकार ने हड़ताल को आपराधिक कार्रवाई की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया था। डॉ. आंबेडकर ने विधानमंडल में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा, ‘हड़ताल करना सिविल अपराध है, फौजदारी गुनाह नहीं। किसी भी आदमी से उसकी इच्छा के विरूद्ध काम लेना किसी भी दृष्टि से उसे दास बनाने से कम नहीं माना जा सकता है, श्रमिक को हड़ताल के लिए दंड देना उसे गुलाम बनाने जैसा है। हड़ताल एक मौलिक स्वतंत्रता है जिस पर मैं किसी भी सूरत में अंकुश नहीं लगने दूंगा। यदि स्वतंत्रता कांग्रेसी नेताओं का अधिकार है, तो हड़ताल भी श्रमिकों का पवित्र अधिकार है।’

डॉ. आंबेडकर के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने बहुमत का फायदा उठाकर इस बिल को पास करा लिया। इसे ‘काले विधेयक’ के नाम से पुकारा गया। इसी विधेयक के विरोध में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने 7 नवंबर 1938 की हड़ताल बुलाई थी।

पार्टी बनाने के लिए बाबा साहब का तर्क

लेबर पार्टी के गठन के दौरान अन्य प्रमुख सदस्य दादासाहेब गायकवाड़, डी.वी. थे। प्रधान, चित्रे, टिपनिस, और अन्य का इस नई पार्टी को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि कांग्रेस गरीबों की पार्टी नहीं थी, बल्कि अमीर व्यापारियों, फैक्ट्री मालिकों, जमींदारों और पूंजीपति वर्ग की पार्टी थी। गरीब और अमीर वर्गों के उद्देश्य एक जैसे नहीं हैं, और कई बार वे बिल्कुल विपरीत भी हो सकते हैं। 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत चुनावों के बाद विधान सभा में बहुत सारे कानून पारित करने पड़े। यदि विधानसभा में कांग्रेस का एकाधिकार होता, तो कानूनों की प्रकृति अमीरों के लिए फायदेमंद और कभी-कभी गरीबों के लिए हानिकारक हो सकती थी। गरीबों के हितों की रक्षा के लिए इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की गई थी।

इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का कार्यक्रम

प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना 1937 में भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत की गई थी। सभी राजनीतिक दलों ने अब चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। इसी उद्देश्य से, डॉ. अम्बेडकर को अपने नवगठित आईएलपी के लिए एक व्यापक कार्यक्रम तैयार करना पड़ा, जो भूमिहीन गरीब किरायेदारों, किसानों और श्रमिकों की सभी तात्कालिक जरूरतों और शिकायतों पर केंद्रित था। कार्यक्रम के निम्नलिखित बिंदु थे।

  1. राज्य-प्रायोजित औद्योगीकरण को उच्च प्राथमिकता दी गई, जिसके परिणामस्वरूप पुराने उद्योगों के पुनर्वास के साथ-साथ नए उद्योगों की स्थापना भी हुई।

  2. इसने तकनीकी शिक्षा के एक व्यापक कार्यक्रम और जहां आवश्यक हो, उद्योगों के राज्य प्रबंधन और राज्य के स्वामित्व के सिद्धांत की वकालत की।

  3. इसने कारखाने के श्रमिकों की सुरक्षा के लिए मजबूत श्रम कानूनों की मांग की, साथ ही पारिश्रमिक मजदूरी प्रदान करने, काम के अधिकतम घंटे निर्धारित करने, सवैतनिक छुट्टी प्रदान करने और श्रमिकों को किफायती और स्वच्छतापूर्ण आवास प्रदान करने के लिए कानून की मांग की।

  4. स्वच्छता और आवास के संबंध में ग्राम योजना का प्रस्ताव, और गांवों के दृष्टिकोण को आधुनिक बनाना और गांवों को हॉल, पुस्तकालयों और रोटरी सिनेमाघरों से सुसज्जित करने का इरादा जाहिर की गया।

  5. जमींदारों द्वारा जबरन वसूली और बेदखली से कृषि किरायेदारों की सुरक्षा।

  6. सभी प्रकार की रूढ़िवादिता और प्रतिक्रियावादी व्यवहार को दंडित करने की आवश्यकता

  7. शिक्षा जैसे उद्देश्यों के लिए दान निधि से अधिशेष का उपयोग करना।

आईएलपी ने गरीब श्रमिकों और किसानों के कल्याण की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके गठन का कम्युनिस्ट नेताओं ने स्वागत नहीं किया क्योंकि उनका तर्क था कि इससे श्रमिक वर्ग के मतदाताओं में विभाजन हो जाएगा। लेकिन अम्बेडकर ने उत्तर दिया कि कम्युनिस्ट नेता श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम कर रहे थे, लेकिन दलित श्रमिकों के मानवाधिकारों के लिए नहीं। (कलसी, 2016)

श्रम कानूनों पर डॉ. अम्बेडकर का कार्य

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर 20 जुलाई 1942 को वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में शामिल हुए। उन्हें श्रम पोर्टफोलियो के प्रबंधन का काम सौंपा गया था। बॉम्बे विधान परिषद और वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में, भारत में श्रम कानून में उनका योगदान बहुत बड़ा था।

काम के घंटे 14 से घटाकर 8 कराए: आज भारत में काम के 8 घंटे हैं तो इसका श्रेय बाबा साहब को ही जाता है। 27 नवंबर 1942 को हुई सातवीं लेबर कॉन्फ्रेंस में बाबा साहब ने काम के घंटे 14 से घटाकर 8 कर दिए। उससे पहले भारत में मजदूरों को 14-15 घंटे काम करना पड़ता था। ये बिल पेश करते हुए बाबा साहब ने कहा था ‘काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना लेकिन काम का समय 12 से 8 घंटे किये जाते समय वेतन कम नहीं किया जाना चाहिए।’ बाबा साहब ने मजदूरों को दुर्घटना बीमा, प्रोविडेंट फंड, टीए-डीए, मेडिकल लीव और छुट्टियों जैसे लाभ भी दिलाए।

मजूदरों की भलाई के लिए 10 बिल ड्राफ्ट किए: बाबा साहब ने मजदूरों की भलाई के लिए खुद 10 बिल ड्राफ्ट किए। उन्होंने 1. द कोल माइंस सेफ्टी (स्टॉविंग) बिल, 2. द फैक्ट्रीज (अमेंडमेंट) बिल, 3. द फैक्ट्रीज (सेंकड अमेंडमेंट) बिल, 4. वर्कमेन कम्पेन्सेशन (अमेंडमेंट) बिल, 5. द इंडियन माइंस (अमेंडमेंट) बिल, 6. वर्कर्स वेलफेयर एंड सोशल सिक्योरिटी बिल, 7. मीका माइंस वेलफेयर बिल, 8. इंड्स्ट्रियल वर्कर्स हाउसिंग एंड हेल्थ बिल, 9. टी कंट्रोल (अमेंडमेंट) बिल ड्राफ्ट किए थे।

महिलाओं के लिए माइंस मैटरनिटी बेनेफिट (अमेंडमेंट) बिल:29 जुलाई 1943 को बाबा साहब कई और बिल लेकर आए। डॉ. आंबेडकर माइंस में काम करने वाली महिलाओं के लिए माइंस मैटरनिटी बेनेफिट (अमेंडमेंट) बिल लेकर आए और उसे पास कराया, ताकि बच्चा पैदा होने पर महिला को मातृत्व अवकाश मिल सके और उसका वेतन भी ना कटे। माइंस मैटरनिटी बेनेफिट (अमेंडमेंट) बिल पर बोलते हुए बाबा साहब ने कहा “यह काम से अनुपस्थित” या “काम से” शब्द को हटाने के लिए है, जो मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा 5 से अस्पष्टता का कारण बनता है और इस खंड को इस आशय को पढ़ने के लिए सलाह दी जाती है कि “चार सप्ताह से पहले हर दिन महिला को प्रसव से पहले मातृत्व लाभ का हक हो।”

समान काम के लिए समान वेतन: पुरुषों के समान महिलाओं को भी समान वेतन दिलाने के लिए बाबा साहब ने संघर्ष किया था। असेंबली में बाबा साहब ने कहा था कि, “हमें इसका भी ख्याल रखना चाहिए कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान वेतन मिले। मुझे लगता है कि ये पहली बार है जब किसी इंडस्ट्री में समान काम के लिए समान वेतन देने का सिद्धांत लागू किया गया है, वह भी बिना किसी लैंगिक भेदभाव के। हमें इसका भी ध्यान रखना होगा कि महिलाएं उस गलियारे में काम ना करें जो साढ़े 5 फीट से छोटा हो।” इससे पहले जोखिम भरी जगहों पर भी महिलाओं से काम कराया जाता था। 

महिलाओं के लिए बाबा साहब ने खदान मातृत्व लाभ कानून, महिला कल्याण कोष, महिला एवं बाल श्रमिक संरक्षण कानून, महिला मजदूरों के लिए मातृत्व लाभ कानून के साथ उन्होंने भूमिगत कोयला खदानों में महिला मजदूरों से काम न कराने के कानून की बहाली करवाई.

लेबर यूनियन बनाने का अधिकार दिलाया:बाबा साहब लेबर यूनियन को भी बेहद अहम मानते थे। ट्रेड यूनियन एक्ट भले 1926 में बन गया था मगर मालिकों द्वारा श्रमिक संगठनों को मान्यता देने को अनिवार्य बनाने का कानूनी संशोधन 1943 में हुआ। 13 नवंबर 1943 को बाबा साहब इंडियन ट्रेड यूनियन (अमेंडमेंट) बिल लेकर आए थे ताकि फैक्ट्री मालिक ट्रेड यूनियन्स को मान्यता दें। इसी समय काम करते समय दुर्घटना का बीमा, जिसे बाद में ईएसआई का रूप मिला और कानून बना। इसी समय बने कोयला और माइका कर्मचारियों के प्रोविडेंट फण्ड और सारे मजदूरों के प्रोविडेंट फंड्स भी अस्तित्व में आये।

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