एमपी: ट्रांसजेंडर्स में एचआईवी संक्रमण का खतरा बढ़ा, एम्स में तीन महीने में पहुँचे चार पॉजिटिव

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल ने महीने में दो दिन ट्रांसजेंडर्स के लिए ओपीडी शुरू की है। 15 फरवरी से 18 अप्रेल तक कुल पांच दिन ओपीडी संचालित हुई, जिसमें कुल 17 ट्रांसजेंडर्स अपनी समस्या लेकर एम्स पहुँचे थे। लेकिन इन मरीजों में चार ट्रांसजेंडर एचआईवी से संक्रमित पाए गए हैं। 
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल.
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल.

भोपाल। "मैं भोपाल के एक किन्नर डेरे में रहती हूं, 15 साल की उम्र में मुझे मेरे परिवार के लोगों ने घर से बाहर निकाल दिया था, परिवार वालों के तानों के कारण मानसिक रूप से परेशान रहती थी, घर से निकलने के बाद डेरे में आकर रहने लगी, यहां के तौर तरीके सीखे। कुछ महीनों से मेरी तबियत खराब रहने लगी, दवाएं बेअसर थी। जब मैंने जांच कराई तो पता लगा एड्स (एचआईवी) से संक्रमित हो चुकी हूँ। मैं घबरा गई थी, अब डेरे में यह बात किसी को पता चली तो सब मुझे अपने से दूर कर देंगे। कोई मुझसे बात नहीं करेगा। वैसे भी एक किन्नर बार-बार अस्पताल जाए तो उससे बाकी के लोग भेदभाव करने लगते हैं।"

एम्स अस्पताल में ट्रांसजेंडर क्लिनिक के डॉक्टर्स को अपनी पीड़ा सुनते हुए, भोपाल की 30 वर्षीय ट्रांसजेंडर ने यह कहा है। डॉक्टर्स को अपनी समस्या बताते हुए एड्स से संक्रमित ट्रांसजेंडर ने बताया कि वह अपनी पीड़ा को उजागर नहीं कर सकती, नहीं तो उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ेगा, इसलिए वह अपना ट्रीटमेंट बिना किसी को बताए करा रही है। डॉक्टर्स के मुताबिक 15 से 25 साल तक कि उम्र में बगैर प्रोटेक्शन के फिजिकल रिलेशन बनाने के कारण वह एड्स की चपेट में आईं होंगी। 

दरअसल, 15 फरवरी 2024 से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल ने महीने में दो दिन ट्रांसजेंडर्स के लिए ओपीडी शुरू की है। 15 फरवरी से 18 अप्रेल तक कुल पांच दिन ओपीडी संचालित हुई जिसमें कुल 17 ट्रांसजेंडर्स अपनी समस्या लेकर एम्स पहुँचे थे। इन मरीजों में चार ट्रांसजेंडर एचआईवी से संक्रमित पाए गए हैं। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल ने महीने में दो दिन ट्रांसजेंडर्स के लिए ओपीडी शुरू की है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल ने महीने में दो दिन ट्रांसजेंडर्स के लिए ओपीडी शुरू की है।

डॉक्टर्स के मुताबिक, यह गंभीर है कि सिर्फ 17 मरीजों में 4 ट्रांसजेंडर एड्स की चपेट में है। डॉक्टर्स का कहना है शर्म और भेदभाव से बचने के कारण एड्स के रोगी ठीक से इलाज नहीं करा रहे हैं। ट्रांसजेंडर क्लिनिक के प्रभारी डॉ. रोशन सुतार ने द मूकनायक प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए बताया कि हम ट्रांसजेंडर के पहचान को गुप्त रखते हुए, उनकी समस्या को समझ कर उपचार कर रहे हैं। सुतार ने बताया कि ट्रांसजेंडर रोगी की हिस्ट्री को भी जांच रहे हैं। जिससे उनकी मानसिक स्थिति को भी समझा जा सके। 

डॉक्टर के मुताबिक जो चार ट्रांसजेंडर एचआईवी पॉजिटिव हैं, उनकी हिस्ट्री के अनुसार शारीरिक संबंध बनाने के कारण ही संक्रमण फैला है। डॉक्टर्स ने बताया फिलहाल अब तक यही संभावनाएं अधिक हैं कि जागरूकता की कमी होने के कारण बगैर सुरक्षा के कई लोगों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने से एड्स से संक्रमित हुए होंगे! डॉक्टर्स के मुताबिक यह आंकड़ा और भी अधिक हो सकता है, लेकिन ट्रांसजेंडर्स में सामाजिक डर के कारण वह अस्पताल इलाज कराने कम संख्या में आ रहे हैं।

द मूकनायक प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए भोपाल की ट्रांसजेंडर एक्टविस्ट संजना सिंह ने कहा- "यह सही है कि ट्रांसजेंडर डर के कारण अस्पताल से दूरी बनाते हैं। यदि ट्रांसजेंडर्स में एड्स का संक्रमण फैल रहा है तो स्वास्थ्य विभाग और एड्स नियंत्रण समिति को जागरूकता अभियान तेज कर देना चाहिए। हम भी समाज में लोगों से अपील कर रहे हैं, कोई भी समस्या हो बिना डरे, बिना उसे छुपाएं अस्पताल जाए ताकि एड्स जैसी बीमारी फैले नहीं।"

किन्नर समुदाय की संख्या ज्यादा

ट्रांसजेंडर क्लीनिक प्रभारी के मुताबिक अब तक 90 प्रतिशत किन्नर समुदाय के लोग क्लिनिक में समस्या लेकर पहुँचे हैं। वहीं 10 प्रतिशत ट्रांसवुमन ने सर्जरी को लेकर कंसल्ट किया है। डॉक्टर्स ने बताया कि कुछ लोग अपनी बॉडी के साथ खुश नहीं हैं, वह लोग भी क्लिनिक पर आ रहे हैं। डॉक्टर सुतार ने कहा- "बॉडी में सर्जरी से बदलाव करने के लिए एक लीगली प्रोसीजर से गुजरना पड़ता हैं। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो सर्जरी नहीं की जा सकती।" 

रोल से तय होगा सर्जरी होगी या नहीं

डॉक्टर्स के मुताबिक जो भी ट्रांस मेल या फीमेल अपनी बॉडी में बदलाव चाहते हैं। उसके लिए उन्हें एक साल तक उस रोल में रहना होता है जो वह बनना चाहते हैं, इससे यह भी पता लगता है कि वह उस भूमिका में कितने खुश हैं। इसके बाद सर्टिफाइड एनजीओ के डिक्लियरेशन और सहमति पत्र के बाद आगे की प्रॉसेस शुरू की जाती है। बॉडी में किसी भी तरह के बदलाव के लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही सर्जरी की जा सकती है। फिलहाल ऐसी एक भी सर्जरी एम्स में नहीं की गई है। 

क्या है क्लीनिक का उद्देश्य? 

ट्रांसजेंडर क्लीनिक शुरू करने के पीछे मकसद यह है कि बिना किसी झिझक के ट्रांसजेंडर यहां इलाज कराने के लिए आ सकें। इसमें बच्चे, बड़े या बुजुर्ग सभी अपनी परेशानियों का गोपनीय तरीके से हल पा सकते हैं। यह क्लीनिक ट्रांसजेंडर आबादी और उनके परिवारों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सेवाएं दे रहा है और इसी मकसद से इसे संचालित किया जा रहा है। 

2- 8 प्रतिशत ऐसे ट्रांसजेंडर हैं, जो हेल्थ फैसिलिटी नहीं ले पाते। उनको फिजीकल के साथ मेंटल हेल्थ केयर की जरूरत होती है। ट्रांसजेंडर क्लिनिक के प्रभारी डॉ. रोशन सुतार ने बताया कि देश में सभी एम्स में सिर्फ भोपाल ने निदेशक  प्रोफेसर (डॉ.) अजय सिंह के निर्देशों से यह क्लिनिक शुरू हो पाया है। उन्होंने कहा ट्रांसजेंडर क्लिनिक का उद्देश्य है कि ऐसे लोग जो अपने शरीर से खुश नहीं हैं। वह लोग यहाँ अपनी समस्याओं का हल ले सकते हैं। क्लीनिक के प्राथमिक लाभार्थी जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर से पीड़ित लोग हैं। 

35 हजार की है संख्या 

मध्य प्रदेश में एक अनुमान के मुताबिक करीब 35 हजार ट्रांसजेंडर है। वहीं मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अक्टूबर 2023 में जारी मतदाता सूची में अन्य मतदाता (थर्ड जेंडर) एक हजार 373 हैं। जबकि ट्रांसजेंडर्स संख्या प्रदेश में 35 हजार से भी ज्यादा है। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल.
मध्य प्रदेश: तीन साल बाद भी सरकार नहीं कर सकी राज्य ट्रांसजेंडर्स बोर्ड का गठन!

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

Related Stories

No stories found.
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com