रोजी-रोटी की तलाश ने छीना वजूद, दुबई की काल कोठरी में 'भारतीय' होने का सबूत खोज रहा तेलंगाना का दलित बेटा

18 साल पहले विदेश गया था मजदूर, अब पासपोर्ट और दस्तावेजों के अभाव में दुबई की जेल में काटने को मजबूर; दलित परिवार ने लगाई मदद की गुहार
Identity crisis leaves Telangana Dalit migrant languishing in UAE jail
पहचान के संकट में फंसा दलित मजदूर: 2 दशक, परदेस की जेल और वतन वापसी की अंतहीन लड़ाईफोटो साभार- तेलंगाना टुडे
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दुबई/हैदराबाद: विदेश में सुनहरे भविष्य का सपना लेकर गया एक इंसान, आज अपनी ही नागरिकता साबित करने के लिए जेल की सलाखों के पीछे संघर्ष कर रहा है। मामला तेलंगाना के एक दलित मजदूर का है, जो पिछले लगभग दो दशकों से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में फंसा हुआ है। अवैध रूप से रहने के कारण उसे जेल भेज दिया गया है, लेकिन विडंबना यह है कि उसके पास यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज नहीं बचा है कि वह एक भारतीय है। अब उनका परिवार उन्हें वापस लाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है।

क्या है पूरा मामला?

तेलंगाना के निर्मल जिले के सोन मंडल स्थित मधापुर गांव के रहने वाले 59 वर्षीय मंदुला राजन्ना साल 2007 में रोजी-रोटी की तलाश में UAE गए थे। वहां उन्होंने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करना शुरू किया। लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि महज एक साल बाद ही वह कंपनी से भाग निकले और तब से वहां अवैध निवासी के तौर पर रह रहे थे।

राजन्ना अनुसूचित जाति (SC) से आते हैं और पूर्ववर्ती आदिलाबाद जिले के एक सुदूर गांव से ताल्लुक रखते हैं। निरक्षर होने के कारण उनके पास कोई शैक्षणिक रिकॉर्ड नहीं है। आज 18 साल बाद, जब वह घर लौटना चाहते हैं, तो नागरिकता साबित करना उनके लिए पहाड़ जैसा काम हो गया है। न तो राजन्ना के पास और न ही उनके परिवार के पास उनके पासपोर्ट की कोई कॉपी मौजूद है। मतदाता सूची (Voter List) में भी उनका नाम नहीं है। जब वे 18 साल पहले भारत से निकले थे, तब आधार कार्ड अनिवार्य नहीं था, जिसके चलते उनका आधार भी नहीं बना।

दस्तावेजों का अभाव और सिस्टम की मार

राजन्ना के मुताबिक, जब वे 2007 में शारजाह पहुंचे थे, तो उस समय बायोमेट्रिक पंजीकरण नहीं हुआ था। उस दौर में नियोक्ता कंपनियां अक्सर मजदूरों के पासपोर्ट अपने पास रख लेती थीं, और राजन्ना के साथ भी यही हुआ। जिस कंपनी में वे काम करते थे, वह बाद में बंद हो गई और उनके पासपोर्ट का (असली या फोटोकॉपी) कोई नामोनिशान नहीं मिला।

कर्ज का बोझ और 'गोल्ड लोन' का जाल

राजन्ना के अवैध रूप से वहां रुकने के पीछे एक बड़ी वजह कर्ज का बोझ था। दो बच्चों के पिता राजन्ना ने तेलंगाना में प्रचलित 'गल्फ गोल्ड लोन सिस्टम' के तहत कर्ज लिया था। इस सिस्टम में लोग तोले में सोना उधार लेते हैं और ब्याज के रूप में अधिक वजन का सोना लौटाना पड़ता है। राजन्ना ने 4 तोला सोना उधार लिया था और उन्हें 6 तोला वापस करना था। रोजगार की समस्याओं के कारण वे समय पर कर्ज नहीं चुका पाए, इसलिए उन्होंने UAE सरकार द्वारा समय-समय पर घोषित माफी योजनाओं (Amnesty Schemes) का लाभ नहीं उठाया और वहां छिपकर काम करते रहे।

रेगिस्तान में कड़ी मेहनत और छोटे-मोटे काम करके उन्होंने अपना कर्ज तो चुका दिया। इस बीच उनके बच्चे, नीतीश और निखिता भी बड़े हो गए, लेकिन राजन्ना खुद कानून के शिकंजे में फंस गए।

सिर्फ एक पासबुक है सहारा

फिलहाल राजन्ना अवैध रूप से रहने के आरोप में जेल में हैं। भारतीय दूतावास के अधिकारी डिटेंशन सेंटर में उनसे मिलने गए थे, लेकिन उन्होंने रिहाई के लिए पासपोर्ट की कॉपी या नागरिकता का कोई अन्य प्रमाण मांगा, जिसे देने में राजन्ना असमर्थ रहे।

अब उनकी पत्नी लक्ष्मी ने मदद की गुहार लगाई है। उन्होंने हैदराबाद में मुख्यमंत्री के शिकायत प्रकोष्ठ (Grievances Cell) और निर्मल जिला कलेक्टर से संपर्क किया है, ताकि उनके पति की भारतीय नागरिकता साबित करने में मदद मिल सके। विडंबना यह है कि परिवार के पास सबूत के तौर पर राजन्ना के नाम की सिर्फ एक बैंक पासबुक (फोटो वाली) मौजूद है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गरीब मजदूर को वतन वापस लाने में कैसे मदद करता है।

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