हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद नियम लागू, जानिए क्या है 'राजस्थान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पुनर्वास योजना 2024'?

राज्य में 29 साल बाद लागू हुआ कंटीजेंसी प्लान, फिर भी सरकार ने नियमों में छोड़ी कई खामियां. दलित अधिकार केन्द्र फिर से कोर्ट जाने की तैयारी में।
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीरफोटो साभार- इंटरनेट

जयपुर। राजस्थान हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आखिर राजस्थान सरकार ने 29 साल बाद अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, नियम 1995 के नियम 15 के तहत राजस्थान कंटीन्जेसी प्लान लागू कर दिया। राजस्थान सरकार ने एससी और एसटी वर्ग के पीड़ित, उनके आश्रितों के आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक पुनर्वास एवं गवाहों को तुरंत राहत उपलब्ध कराने के उद्धेश्य से "राजस्थान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पुनर्वास योजना 2024" अधिनियम का 19 फरवरी को गजट नोटिफिकेशन जारी किया गया है।

इस अधिनियम के लागू होने के बाद एससी, एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 यथा संशोधित अधिनियम, 2015 के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम 1995 यथा संशोधित नियम, 2016 के नियम 15 (1) के तहत एससी, एसटी वर्ग के पीड़ित, उनके आश्रितों को आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक पुनर्वास एवं गवाहों को तुरंत राहत मिल सकेगी। हालांकि, दलित अधिकार केन्द्र राजस्थान का कहना है कि राज्य सरकार ने कंटीन्जेसी प्लान तो लागू कर दिया, लेकिन कई खामियां भी छोड़ी हैं। कई प्रकार के अत्याचारों में स्पष्ट हवाला नहीं देने से संशय की स्थिति बनी है। इसे लेकर एक बार फिर वह न्यायालय में जाने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि इस कंटीन्जेसी प्लान का पूर्ण लाभ मिल सके।

गौरतलब है कि राज्य सरकार को 1995 में कंटीन्जेसी प्लान लागू करना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इसके बाद दलित अधिकार केंद्र (दलित मानवाधिकार केंद्र समिति) द्वारा वर्ष 2016 में उच्च न्यायालय में एक पीआईएल दाखिल की गई। जिस पर न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। नोटिस जारी होने के बाद राज्य के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने कमेटी गठित कर उक्त योजना का ड्राफ्ट वर्ष 2017 में बना दिया, लेकिन राज्य सरकार द्वारा उक्त योजना का गजट नोटिफिकेशन नहीं किया गया। इससे पीड़ित व उनके आश्रितों को लाभ मिल रहा था।

क्या है कंटीजेंसी प्लान?

"राजस्थान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पुनर्वास योजना 2024" में एससी, एसटी वर्ग के पीड़ित व्यक्तियों, परिजनों तथा आश्रितों को विभिन्न प्रकार के राहत, पुनर्वास एवं अधिकारों का वर्णन किया गया है। जिसमे निशुल्क गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय उपचार, पीड़ितों को खाद्यान्न सामग्री, बर्तन आदि, पुलिस सुरक्षा प्रदान करना, पीड़ित को निशुल्क भूमि आवंटन, आवासीय पट्टे, उनके गृह से पलायन करने पर उन्हें वापस पुनर्विस्थापन करना, बच्चों को आवासीय विद्यालय में स्नातक स्तर की नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना, स्थाई रोजगार देने हेतु दो लाख रुपए तक का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराना, उचित मूल्य की दुकान का आवंटन करना, कियोश्क/दुकानों का आवंटन करना, मृतकों के आश्रितों को प्रतिमाह रुपए 5000 मूल पेंशन के साथ राजकीय कर्मचारियों की तर्ज पर महंगाई भत्ता आधि सुविधाओं के साथ बढ़ाकर पेंशन देना आदि शामिल है।

कंटीन्जेंसीज प्लान में छोड़ दी कई खामियां

कंटीन्जेंसीज प्लान का गजट नोटिफिकेशन जारी होने के बाद दलित अधिकार केन्द्र ने इसका विश्लेषण किया है। इस दौरान कई खामियां सामने आई हैं। एडवोकेट चंदा लाल का कहना है कि आज्ञापरक आर्थिक मुआवजा उपलब्ध कराने सहित कई मुद्दों पर कंटीन्जेंसीज प्लान बना दिया गया, लेकिन सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के मामलों में पीड़ित आश्रितों को सरकारी नौकरी देने का नियम लागू नहीं किया गया। यह अभी कार्मिक विभाग के पास लंबित है। पलायन के मामले में चार्जशीट के बाद पुनर्वास की बात कही गई है। यदि चार्जशीट दाखिल होने में एक साल का समय लग गया तो क्या पीड़ित, आश्रित एक साल तक खुले आकाश तले रहेगा? इसे भी सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।

पेंशन को लेकर संशय

दलित अधिकार केन्द्र के निदेशक एडवोकेट सतीश कुमार कहते हैं कि, नियम 15(1) (ड) में हत्या या शतप्रतिशत अक्षमता के प्रकरण में पीड़ित, विधवा या अन्य आश्रितों को प्रति माह पांच हजार रुपए की मूल पेंशन के साथ राजकीय कर्मचारियों की भांति अनुज्ञेय महंगाई भत्ता देय होगा, लेकिन सरकार इस पर अमल नहीं कर रही है।

उन्होंने उदहारण देते हुए बताया कि, दौसा जिले में 2003-4 में भूमि विवाद को लकेर गिर्राज रैगर की हत्या हुई। सामाजिक न्याय विभाग ने कंटीन्जेसी प्लान के तहत मृतक की विधवा सजना को एक हजा रुपए मासिक पेंशन शुरू की। राजकीय सेवकों की तर्ज पर महंगाई भत्ते का लाभ देते हुए पेंशन नहीं बढ़ाई गई। विधवा पेंशन भी सरकार ने बंद कर दी।

इसी तरह हनुमानगढ़ जिले के भादरा उपखंड में प्रभु वाल्मीकि की जनू 2014 में हत्या हुई थी। सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद मृतक की आश्रित मां को 2017 में पांच हजार रुपए पेंशन देना शुरू किया। पेंशन बढ़ाने की बजाय घटा कर पेंशन 3500 रुपए कर दी। प्रभु की मां घरों में बर्तन साफ कर खर्च चलती हैं।

एडवोकेट सतीश कुमार कहते हैं कि, "जब विधायक व सांसद को हर बार निर्वाचित होने पर अलग-अलग की पेंशन दी जाती है तो, एससी, एसटी के पीड़ितों को दो अलग-अलग पेंशन देने में क्यों दिक्कत है। एससी, एसटी एक्ट के तहत बने नियम के तहत दे रहे हो। दूसरा आप विधवा या वृद्ध (राज्य व केन्द्र सरकार की योजना) की पात्रता पूरा करने पर दे रहे जो कि उनका हक है। यह एससी, एसटी वर्ग के साथ अन्याय है।"

यह भी बताई खामियां

दलित अधिकार केन्द्र के निदेशक एडवोकेट सतीश कुमार ने कहा कि, "नियमों में धारा 3 (1) (य ख), (किसी एससी एसटी के व्यक्ति पर जादू टोना करने या डायन होने होने का आरोप लगाकर प्रताड़ित करना) केवल इस धारा में आपने तत्काल नि:शुल्क चिकित्सा मुहैया कराने का हवाला दिया है। क्या अन्य अपराधों में पीड़ितों को चिकित्सा मुहैया नहीं कराओगे। शारीरिक रूप से जलाने या विस्फोट से संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर केवल तीन महीने की खाद्य सामग्री दी जाएगी। क्या चिकित्सा नहीं देंगे?"

"हत्या व पचास प्रतिशत अक्षमता पर बर्तन आदि के लिए एकमुश्त राशि व तीन महीने के लिए खाद्य सामग्री देने का प्रावधान शामिल किया गया है। राशि कितनी देंगे यह भी तय नहीं है। यह कौन तय करेगा? अम्ल फेंकने के प्रकरण में पीड़ित को 10 हजार रुपए की राशि दी जाएगी। जबकि राजस्थान पीड़ित प्रतिकार योजना में पीड़ित को पांच लाख रुपए देने का पहले से प्रावधान है। क्या सरकार एससी की महिला जली तो राजस्थान पीड़ित प्रतिकार योजना के लाभ से वंचित करना चाहती है? यह राशि पांच लाख की जाए।"

"संपत्ति के नुकसान की रिपोर्ट कौन बनाएगा? यात्रा भत्ता कौन देगा? पीड़ितों को अधिकारों की जानकारी कौन देगा? आरोप पत्र की प्रति संगठन को निशुल्क कौन देगा? संगठनों की भूमिका क्या होगी? अधिकारियों की भूमिका क्या होगी? कुछ भी स्पष्ट नहीं है। गजट में नियमों के प्रत्येक बिंदु को खोलना जरूरी है", सतीश कुमार ने कहा.

उन्होंने कहा कि हत्या, मृत्यू व सत प्रतिशत अक्षमता वाले प्रकरण में नियम 15(1) (ख) में रोजगार व पुनर्वास के लिए कृषि भूमि देने व भूखंड देने का प्रावधान है, लेकिन साथ में अधिकतम वार्षिक आय 60 हजार से अधिक नहीं होने की शर्त भी लगा दी है। आप ईडब्ल्यूएस के लिए न्यूनतम सालाना आय 8 लाख रुपए मान कर लाभान्वित कर रहे हो, और यहां एससी, एसटी वर्ग के हत्या मामले में पीड़िता आश्रितों के लिए केवल 60 हजार सालाना आय से अधिक होने पर लाभ से वंचित कर रहे हो। यह कैसा इंसाफ है?

दलित अधिकार केन्द्र निदेशक एडवोकेट सतीश कुमार ने द मूकनायक से बात करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के नोटिस के बाद कंटीन्जेसी प्लान लागू कर गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया, लेकिन इसमें कई खामियां छोड़ दी। इससे साफ होता है कि एससी, एसटी के मसलों को हल करने की राज्य सरकार की इच्छा शक्ति नहीं है। सरकार ने आधा अधूरा प्लान तैयार किया है। हम फिर से न्यायालय में जाएंगे।

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