दलित मजदूर के बेटे ने की यूपीएससी परीक्षा पास, इन चुनौतियों और संघर्षों के बाद मिली सफलता...

दलित मजदूर के बेटे ने की यूपीएससी परीक्षा पास, इन चुनौतियों और संघर्षों के बाद मिली सफलता...
फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट
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उत्तर प्रदेश। सपने सभी देखते हैं परंतु उसको पूरा करने की काबिलीयत हर किसी में नहीं होती। सपने उन्हीं के पूरे होते हैं जो अपनी हिम्मत और मेहनत के बल पर अपनी मंजिल को पाने का हौसला रखते हैं। ऐसे ही एक युवक हैं मुक्‍तेंद्र कुमार जिन्होंने हाल ही में 23 मई को जारी यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा 2022 परिणाम में  819वीं रैंक हासिल की है। दलित परिवार से ताल्‍लुक रखने वाले मुक्‍तेंद्र कुमार के बारे में कहा जा रहा है कि रैंक के हिसाब से उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा में होना तय है।

द मूकनायक ने मुक्‍तेंद्र कुमार से उनकी सफलता के पीछे छिपे संघर्ष के बारे में बात की।  परिवार में उनके अलावा माता-पिता व दो भाई बहन है जिसमें मुक्‍तेंद्र दूसरे नंबर पर हैं। उनकी एक बड़ी बहन है, और वह प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका है। उनके भाई भी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। उनका गांव उत्तर प्रदेश के बिजनौर के नूरपुर शहर के पास सैदपुर में है।

फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

23 वर्षीय मुक्‍तेंद्र कुमार 3 साल से यूपीएससी की तैयारी कर रहे थे। अब उन्हें सफलता मिली है। अपनी इस सफलता पर बात करते हुए हमें बताते है कि "मैंने साढ़े तीन साल तक परीक्षा की तैयारी की। पिता सतीश कुमार मजदूर हैं। वे कभी-कभी कोल्हू में काम करते हैं, और ईंटों का परिवहन करते हैं, और मुफ्त मासिक सरकारी चावल और गेहूं से परिवार का भरण-पोषण होता है। और मेरी माता जी गृहिणी है। हमारे घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि मैं कोचिंग लेकर परीक्षा की तैयारी कर सकूं। ग्रेजुएशन के बाद ही मैंने तैयारी करना शुरू कर दिया था। मैं दिन में कई घंटे पढ़ता था, मैंने अपनी सेल्फ पढ़ाई से ही अपनी परीक्षा की तैयारी की थी।"

बिजली कटौती भी नहीं बन सकी रोड़ा

मुक्‍तेंद्र बताते हैं कि "हमारे गांव में लाइट आने का कोई समय नहीं है। कभी भी आ जाती है, और कभी भी चली जाती है। तो मुझे ज्यादातर लाइट के बिना ही पढ़ना पड़ता था। दिन में तो ठीक है। परंतु रात को लाइट के बिना पढ़ाई करना काफी मुश्किल हो जाता था, मैंने बैटरी चार्ज करने वाली लाइटें ले रखी थी। रात में उसी की रोशनी में घंटों तक पढ़ाई करता था।"

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फूले नहीं समा रहा पूरा गांव

मुक्‍तेंद्र बताते हैं कि घर वालों के अलावा और उनके गांव वालों ने बहुत साथ दिया। उन्होंने कहा कि "गांव के सभी लोग बहुत खुश हैं, और कहते हैं कि तुमने हमारा नाम रोशन किया है। मेरे घर के बाहर बधाई देने की लंबी लाइन लगी हुई है। गांव के लोग अपने बच्चों को मेरी तरह पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। पूरा गांव यही कह रहा है कि हम अपने बच्चों को मुक्‍तेंद्र जैसा ही पढ़ाना चाहते हैं। मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या होगी कि मेरा पूरा गांव मेरी इतनी तारीफ कर रहा है। मैं आगे चलकर बहुत कुछ करना चाहता हूं। मैं पिछड़ों और महिलाओं के उत्‍थान की दिशा में काम करना चाहता हूं। पहले मैं केवल एसएससी (कर्मचारी चयन आयोग) के बारे में जानता था। लेकिन जब मुझे यूपीएससी के बारे में पता चला तो मैंने इसे ही अपना लक्ष्य बना लिया।"

किताबें खरीदने को भी नहीं थे पैसे

मुक्तेंद्र की शैक्षिक यात्रा गाँव के सरकारी स्कूल में शुरू हुई, जहाँ उन्होंने कक्षा 8 तक पढ़ाई की। फिर उन्होंने विज्ञान स्नातक की डिग्री के लिए सैदपुर के लक्ष्य कॉलेज में दाखिला लेने से पहले उसी गाँव के एक अर्ध-निजी संस्थान में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की।

अपने कॉलेज के दूसरे वर्ष में, उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए एसएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि में पेट भर खाना भी मुश्किल था, ऐसे में मुक्तेंद्र को पता था कि यूपीएससी कोचिंग और किताबें खरीदना भी एक चुनौती होगी। वह बताते हैं कि “मैंने पहले सोचा कि मैं कम से कम किताबों के साथ पाठ्यक्रम को कैसे कवर कर सकता हूँ। मैंने कॉलेज से मिली 7,400 रुपये की छात्रवृत्ति से अपनी किताबें खरीदीं। मैं एक कोचिंग क्लास में शामिल होने के बजाय, अपनी तैयारी में मदद करने के लिए इंटरनेट, यूट्यूब और कोचिंग सेंटरों द्वारा दी जाने वाली मुफ्त परीक्षाओं पर निर्भर था।"

फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

परिवार ने दिया बढ़-चढ़कर साथ

मुक्तेंद्र ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को दिया है। वह बताते हैं कि "मुझे कभी घर नहीं छोड़ना पड़ा। अगर मुझे एक पेन की भी जरूरत होती, तो मेरी मां या बहन बाहर जाकर मेरे लिए सामान लातीं। मेरे पिता मुझे हमेशा प्रोत्साहित करते हैं। एक रात, बारिश हो रही थी और मैंने देखा कि मेरी माँ कच्चे छत से रिस रहे पानी को रोकने के लिए फर्श पर बर्तन रख रही थी, उस दिन मैंने फैसला किया कि मैं अपने घर की हालत बदल दूंगा।”

अगला लक्ष्य: आईएएस

मुक्तेंद्र बताते हैं कि, "मैं अभी संतुष्ट नहीं हूं। मेरा अगला उद्देश्य एक उच्च रैंक प्राप्त करना और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए अर्हता प्राप्त करना है। मैंने रैंक हासिल की है, इससे मुझे आईआरएस में पोस्टिंग मिल जाएगी, लेकिन मेरा अंतिम लक्ष्य आईएएस में शामिल होना है। अभी जो नतीजा आया है, उससे मैं बहुत खुश हूं, लेकिन मैं एक बार फिर अपने आईएएस अधिकारी बनने के लक्ष्य के लिए कोशिश कर रहा हूँ। मैंने प्रीलिम्स लिख लिया है और अब इंटरव्यू राउंड की तैयारी पर ध्यान दे रहा हूं।"

आगे वह बताते हैं कि, “जब मैंने अपनी मार्कशीट देखी तो मुझे महसूस हुआ कि कुछ ऐसी जगहें हैं जहाँ मैं बेहतर कर सकता हूँ, इसलिए इस प्रयास में उन्हें करने की कोशिश करूँगा। और मुझे यकीन है कि मैं निश्चित रूप से अपना लक्ष्य हासिल कर लूंगा। मुझे अभी भी अपने आत्मविश्वास पर काम करने की ज़रूरत है।"

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