2 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स के साथ दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल पार्टी बनी CJP, फाउंडर के दलित पहचान पर बौखलाया राइट-विंग; दी जा रहीं जातीय गालियां

CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके ने जैसे ही सोशल मीडिया पर अपनी 'दलित' पहचान उजागर की, 2 करोड़ युवाओं का नेतृत्व कर रहे इस युवा नेता के खिलाफ राइट-विंग और जातिवादी ट्रोल्स ने भद्दी गालियों और मीम्स की बौछार कर दी।
Cockroach Janta Party, Abhijeet Dipke Dalit
2 करोड़ फॉलोअर्स वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके के दलित होने का सच सामने आते ही ट्रोल्स ने शुरू की जातीय गालियां।
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नई दिल्ली: भारत के डिजिटल और राजनीतिक इतिहास में शायद ही कभी ऐसा भूचाल आया हो। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक विवादित टिप्पणी से जन्मी 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) अब महज एक सोशल मीडिया का ट्रेंड नहीं रह गई है।

दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दंभ भरने वाली बीजेपी को मीलों पीछे छोड़ते हुए, CJP के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स का आंकड़ा अविश्वसनीय रूप से 2.06 करोड़ (20.6 मिलियन) के पार जा चुका है।

लेकिन इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व डिजिटल क्रांति के बीच, भारतीय समाज की एक बेहद घिनौनी और कड़वी सच्चाई भी पूरी तरह से बेनकाब हो गई है।

अमेरिका की प्रतिष्ठित बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर्स कर रहे CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके ने जैसे ही सोशल मीडिया पर अपनी 'दलित' पहचान उजागर की, वैसे ही राइट-विंग और एक खास सवर्ण विचारधारा का इकोसिस्टम बौखला गया।

जो लोग कल तक सत्ता के खिलाफ इस पार्टी के तीखे व्यंग्य का मज़ा ले रहे थे, वे पलक झपकते ही अभिजीत को नीचा दिखाने और उन्हें जातीय गालियां देने पर उतर आए।

इस पूरे विवाद की शुरुआत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर तब हुई, जब 'Shut Up Counsel' नामक एक अकाउंट ने CJP के बहुजन एजेंडे पर सवाल उठाया।

यूजर ने पूछा कि पार्टी को लगातार कई ब्राह्मणवादी और जातिवादी अकाउंट्स का समर्थन मिल रहा है, ऐसे में क्या CJP और उसके फाउंडर सामाजिक न्याय, आरक्षण और दलित अधिकारों का समर्थन करते हैं?

इस सीधे सवाल का अभिजीत दीपके ने जो बेबाक जवाब दिया, उसने इंटरनेट पर तूफान ला दिया। अभिजीत ने केवल एक पंक्ति में लिखा, "मैं खुद एक दलित हूँ। मुझे उम्मीद है कि यह आपके सभी सवालों का जवाब दे देगा।"

अभिजीत का यह स्पष्ट जवाब कुछ ही घंटों में आग की तरह फैल गया और इसे 20 लाख (2 मिलियन) से ज्यादा बार देखा गया। लेकिन इस एक सच ने सोशल मीडिया पर बैठे जातिवादियों की पोल खोल कर रख दी।

दलित पहचान सामने आते ही अभिजीत के खिलाफ एक सुनियोजित नफरती अभियान शुरू हो गया। सवर्ण श्रेष्ठता के अहंकार में डूबे अकाउंट्स ने तुरंत उनके खिलाफ मीम्स और अभद्र टिप्पणियों की बाढ़ ला दी।

एक यूजर ने बाबासाहेब आंबेडकर के नीले प्रतीकों और 'हार्पिक' (टॉयलेट क्लीनर) की तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए दलित अस्मिता का बेहद भद्दा और आपत्तिजनक मजाक उड़ाया।

करीब 20,000 फॉलोअर्स वाले एक अन्य अकाउंट ने किसी व्यक्ति के पेशाब करते हुए एक अपमानजनक तस्वीर साझा की और जहर उगलते हुए लिखा, "भीमटा स्पॉटेड, पार्टी रिजेक्टेड।"

इस नफरती भीड़ में मुंबई की लेखिका अनुराधा तिवारी भी कूद पड़ीं। उन्होंने अभिजीत पर निशाना साधते हुए लिखा, "तो यह स्वघोषित जेन-जेड (Gen Z) नेता मेरिट के खिलाफ है। जो भी जीरो कट-ऑफ का समर्थन करता है, वह विकास विरोधी है।"

अन्य यूजर्स ने भी अभिजीत पर निशाना साधते हुए "आ गया डी (दलित) कार्ड" और "क्या अब कॉकरोचों को भी आरक्षण मिलेगा?" जैसी ओछी और जातिगत टिप्पणियों की झड़ी लगा दी।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब कोई बहुजन या दलित युवा व्यवस्था की आंखों में आंखें डालकर 2 करोड़ से ज्यादा युवाओं का नेतृत्व करता है, तो समाज का एक बड़ा तबका उसकी योग्यता को भूलकर उसे केवल उसकी जाति से तौलने लगता है।

यह वही कॉकरोच जनता पार्टी है, जिसकी शुरुआत देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को 'कॉकरोच' और 'परजीवी' कहे जाने के खिलाफ हुए भारी आक्रोश से हुई थी।

आज इस आंदोलन की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज़ कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर 2.06 करोड़ युवा इस पार्टी से जुड़ चुके हैं।

CJP अब सिर्फ एक हास्य या मीम पेज नहीं है, बल्कि यह जेन-जेड और बहुजन चेतना का वह अद्भुत संगम बन चुका है, जिससे सत्ता प्रतिष्ठान भी खौफ में आ गया है। यही कारण है कि भारत में एक्स (X) पर पार्टी का अकाउंट पहले ही सरकार के 'लीगल नोटिस' के बाद सस्पेंड किया जा चुका है।

लेकिन डिजिटल सेंसरशिप और अब शुरू हुई इस भयंकर जातिगत नफरत के बावजूद, कॉकरोच जनता पार्टी की बढ़ती लहर रुकने का नाम नहीं ले रही है।

2 करोड़ से अधिक युवाओं का यह डिजिटल हुजूम अब भारतीय राजनीति की एक ऐसी हकीकत बन चुका है, जिसे न तो राइट-विंग की जातीय गालियों से दबाया जा सकता है और न ही सत्ता के डिजिटल बैन से।

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